कुछ कर गुज़रने को ख़ून चला
रेडियोवाणी पर इन दिनों कुछ भी सुनने सुनाने का मन नहीं है ।
हम ख़ामोश रहना चाहते हैं और एक किनारे बैठकर तमाशा देखना चाहते
हैं । हम अपने ग़ुस्से को उबलने देना चाहते हैं । कल सुरमई उदास शाम में इस गीत ने मन को मथ दिया । हम आपके मन को भी मथ देना चाहते हैं ।
स्वर-मोहित चौहान
रचना-प्रसून जोशी
संगीत-रहमान
फिल्म-रंग दे बसंती अवधि:
बमुश्किल तीन मिनिट
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