फिल्म 'छोटी सी बात' के गाने--पहला भाग: 'ना जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ'
पिछले कई दिनों से रेडियोवाणी पर खामोशी रही । पर अब दोबारा हम संगीत के इस सिलसिले को शुरू कर रहे हैं ।
बी.आर.चोपड़ा को लगा कि फिल्म-निर्माण की ये भी एक शैली हो सकती है । इसलिए उन्होंने 'छोटी सी बात' और 'पति पत्नी और वो' जैसी फिल्मों का निर्माण किया । ये दोनों ही छोटी फिल्में थीं और अपने तईं कामयाब भी रही थीं । फिल्म 'छोटी सी बात' के संगीतकार थे सलिल चौधरी । जिन्होंने बी.आर.फिल्म्स में सन 1961 में फिल्म 'क़ानून' और सन 1969 में 'इत्तेफाक' जैसी फिल्मों में संगीत दिया था । दिलचस्प बात ये है कि ये दोनों ही फिल्में गीतविहीन फिल्में थीं । और इसके बावजूद सलिल दा के पार्श्वसंगीत को सराहा गया था । मैंने हाल ही में 'क़ानून' की सी.डी.ख़रीदी है ताकि किसी दिन फुरसत से बैठकर इसे देखा जाये । बहरहाल आज तो हम बात कर रहे हैं फिल्म 'छोटी सी बात' के एक गाने की । योगेश ने इस गाने को कितनी खूबसूरती से लिखा है । मुझे तो इस गाने का मुखड़ा 'किसी के जाने के बाद करे फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात' एक मुहावरे जैसा ही लगता है ।
सलिल चौधरी ने इस छोटी सी फिल्म में भव्य संगीत दिया है । ये गाना सिम्फनी शैली के शानदार सिगनेचर म्यूजिक से शुरू होता है । और उसके बाद आती है लता जी की आवाज़ । गिटार के शानदार तरंगें सुनाई देती हैं नेपथ्य में । दिलचस्प बात ये है कि गाने के संगीत में एक जबर्दस्त रिदम है । एक रफ्तार है, तेज़ी है । जबकि लता जी की आवाज़ में एक ठहराव है, गहराई है मिठास है, तरंग है । कई ऐसे लोग हैं जिन्हें इस फिल्म के गीत ख़ास पसंद नहीं आए । पर पता नहीं क्या है इन गानों में कि बरसों बरस से ये गाने मेरे ज़ेहन में गूंज रहे हैं और कभी भी इनको सुनकर मन नहीं भरता । ना ही इस फिल्म को देखकर ही जी भरता है । बस यही कहना है कि इस गीत को खूब सुकून से सुनिए, ना सिर्फ बोलों को बल्कि गाने के संगीत संयोजन पर भी ध्यान दीजिये और बताईये कि एक महीने की ख़ामोशी को तोड़ने की 'रेडियोवाणी' की ये 'अदा' आपको कैसी लगी ।
ना जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद, छोटी छोटी सी बात ।।
वो अनजान पल, ढल गए कल,
आज वो रंग बदल बदल,मन को मचल मचल
आज वो रंग बदल बदल,मन को मचल मचल
रहे हैं छल वो अनजान पल ।
सजे बिना मेरे नयनों में टूटे रे हाय रे सपनों के महल ।।
ना जाने क्यों ।।
वही है डगर, वही है सफर
है नहीं, साथ मेरे मगर, अब मेरा हमसफर, इधर उधर ढूंढे नज़र
कहां गईं शामें मद भरी, वो मेरी, वो मेरे वो दिन गए किधर
ना जाने क्यों ।। दो अंतरों वाले इस गाने के लिए हम योगेश को भी नमन करते हैं । एक बेहतरीन गीतकार योगेश इन दिनों गोरेगांव में एक गुमनाम जीवन जी रहे हैं ।
इस गाने को 'यहां' यूट्यूब पर देखा जा सकता है ।
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