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Tuesday, August 21, 2007

शहनाई के शहंशाह बिस्मिल्ला ह खां के बिना एक साल


आज उस्‍ताद बिस्‍मिल्‍लाह ख़ान की बरसी है । पहली बरसी ।
शहनाई की स्‍वरलहरी पर अगर कोई चेहरा याद आता है तो वो बिस्‍मिल्‍लाह ख़ां का ही रहा है । मैंने जब से होश संभाला उन्‍हें बस उसी बनारसी अदा में देखा । सिर पर टोपी, पान से लाल हुए होंठ, चेहरे पर मुस्‍कान और बातों में वही बनारसी ठसक और पिनक । कब क्‍या और कितना तुर्श बोल दें कुछ नहीं पता ।



करीब दो साल पहले डॉ. शोमा घोष के बुलावे पर वो मुंबई के नेहरू सेन्‍टर में आए थे। वे शोमा घोष के गुरू पिता थे । बिस्‍मिल्‍लाह खां ने शोमा घोष के साथ अलबम भी तैयार किया और मंच पर प्रस्तुतियां भी कीं ।


बिस्मिल्‍लाह खां की शहनाई लाल किले की प्राचीर से हमेशा सुनाई देती रही । चाहे पंद्रह अगस्‍त हो या छब्‍बीस जनवरी । अब ये चिरंतन सत्‍य बन गया है कि कुछ शुभ हो, सुंदर हो तो शहनाई बजेगी और अगर शहनाई बजेगी तो वो बिस्मिल्‍लाह ख़ां की ही होगी । ठेठ बनारसी रंग में रंगे बिस्मिल्‍लाह ख़ा साहब ने सारी दुनिया को दिखा दिया कि धार्मिक-कट्टरता के बाहर निकलकर कुछ मुस्लिम कलाकारों ने किस तरह संगीत को अपना धर्म बनाया । काशी के घाटों पर बड़ी तन्‍मयता से शहनाई बजाने वाले बिस्मिल्‍लाह ख़ां पंजवक्‍ता नमाज़ी रहे । लेकिन धर्म को लेकर उनके मन में कोई रूकावट या हिचक नहीं थी । जब वो मूड में होते तो महादेव के भजन गुनगुनाते और ऐसी आवाज़ कि सुनकर लगे जन्‍म सफल हो गया है ।


मुंबई में पत्रकारों ने जब उनसे असुविधाजनक सवाल पूछे तो उन्‍होंने वो ख़बर ली थी कि पूछिये मत । उन्‍होंने वो मिसालें दीं और वो प्रसंग छेड़े के सिर्फ छेड़ने के लिए सवाल पूछने वाले एकदम सहम गये थे । बिस्मिल्‍लाह ख़ां ने शहनाई को शादी की महफिलों से निकालकर शास्‍त्रीय-संगीत की महफिल में सजा दिया । उन्‍होंने जीवन भर संगीत को ही जिया । तमाम तरह के विवादों और झंझटों के बावजूद बिस्मिल्‍लाह ख़ां शहनाई के शहंशाह हैं । और इस संक्षिप्‍त पोस्‍ट के ज़रिए रेडियोवाणी और संगीत के तमाम कद्रदान उन्‍हें श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं ।

आईये सुनें बिस्मिल्‍लाह ख़ां साहब का शहनाई वादन—
ये है उनकी बजाई कजरी--

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ये है एक पहाड़ी धुन--



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बिस्मिल्‍लाह ख़ां साहब ने शहनाई पर भांगड़ा तक बजाया है सुनिए—

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यहां सुनिए शादी की शहनाई—



उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां और उ.अमीर खां साहब फिल्म गूंज उठी शहनाई ।



रागमाला फिल्‍म गूंज उठी शहनाई--






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आज उस्‍ताद बिस्‍मिल्‍लाह ख़ान की बरसी है । पहली बरसी ।
शहनाई की स्‍वरलहरी पर अगर कोई चेहरा याद आता है तो वो बिस्‍मिल्‍लाह ख़ां का ही रहा है । मैंने जब से होश संभाला उन्‍हें बस उसी बनारसी अदा में देखा । सिर पर टोपी, पान से लाल हुए होंठ, चेहरे पर मुस्‍कान और बातों में वही बनारसी ठसक और पिनक । कब क्‍या और कितना तुर्श बोल दें कुछ नहीं पता ।



करीब दो साल पहले डॉ. शोमा घोष के बुलावे पर वो मुंबई के नेहरू सेन्‍टर में आए थे। वे शोमा घोष के गुरू पिता थे । बिस्‍मिल्‍लाह खां ने शोमा घोष के साथ अलबम भी तैयार किया और मंच पर प्रस्तुतियां भी कीं ।


बिस्मिल्‍लाह खां की शहनाई लाल किले की प्राचीर से हमेशा सुनाई देती रही । चाहे पंद्रह अगस्‍त हो या छब्‍बीस जनवरी । अब ये चिरंतन सत्‍य बन गया है कि कुछ शुभ हो, सुंदर हो तो शहनाई बजेगी और अगर शहनाई बजेगी तो वो बिस्मिल्‍लाह ख़ां की ही होगी । ठेठ बनारसी रंग में रंगे बिस्मिल्‍लाह ख़ा साहब ने सारी दुनिया को दिखा दिया कि धार्मिक-कट्टरता के बाहर निकलकर कुछ मुस्लिम कलाकारों ने किस तरह संगीत को अपना धर्म बनाया । काशी के घाटों पर बड़ी तन्‍मयता से शहनाई बजाने वाले बिस्मिल्‍लाह ख़ां पंजवक्‍ता नमाज़ी रहे । लेकिन धर्म को लेकर उनके मन में कोई रूकावट या हिचक नहीं थी । जब वो मूड में होते तो महादेव के भजन गुनगुनाते और ऐसी आवाज़ कि सुनकर लगे जन्‍म सफल हो गया है ।


मुंबई में पत्रकारों ने जब उनसे असुविधाजनक सवाल पूछे तो उन्‍होंने वो ख़बर ली थी कि पूछिये मत । उन्‍होंने वो मिसालें दीं और वो प्रसंग छेड़े के सिर्फ छेड़ने के लिए सवाल पूछने वाले एकदम सहम गये थे । बिस्मिल्‍लाह ख़ां ने शहनाई को शादी की महफिलों से निकालकर शास्‍त्रीय-संगीत की महफिल में सजा दिया । उन्‍होंने जीवन भर संगीत को ही जिया । तमाम तरह के विवादों और झंझटों के बावजूद बिस्मिल्‍लाह ख़ां शहनाई के शहंशाह हैं । और इस संक्षिप्‍त पोस्‍ट के ज़रिए रेडियोवाणी और संगीत के तमाम कद्रदान उन्‍हें श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं ।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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