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Monday, February 11, 2008

रेडियोवाणी पर वसंतोत्‍सव--वसंत की कुछ कविताएं और फिल्‍म आलाप का गीत-माता सरस्‍वती शारदे

लगभग आठ दिन की यात्रा के बाद मैं फिर से हाजि़र हूं । शायद आपमें से कुछ को पता ना हो, दरअसल विविध भारती अपने इस स्‍वर्ण जयंती वर्ष में कई बड़े आयोजन कर रही है । इस महीने हमने भारत पाकिस्‍तान की सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवानों के बीच जाकर एक संगीत संध्‍या का आयोजन किया और साथ में कई दिन उनके बीच रहकर उनसे बातें की । उनकी रिकॉर्डिंग्‍स कीं । जैसलमेर से आगे रामगढ़ में रहना और फिर बी.एस.एफ. के कारवां के साथ एकदम भारत-पाक सीमा के कंटीले तारों तक जाना और बबलियांवालां की उस बॉर्डर पोस्‍ट को देखना बेहद रोमांच, गर्व, देशभक्ति और चिंता का अहसास करा गया । ये अहसास बार बार होता रहा कि क्‍या दो सगे मुल्‍कों के बीच ऐसे कंटीले तार अच्‍छे लगते हैं । दोनों तरफ़ से तनी हुई बंदूकें । चलिए छोडि़ए । इस यात्रा का सचित्र-ब्‍यौरा जल्‍दी ही तरंग पर शुरू किया जायेगा ।

आज वसंत पंचमी है । रेडियोवाणी पर ये पहली वसंत-पंचमी है । जब मैं सरस्‍वती शिशु मंदिर भोपाल में पढ़ता था तो वसंतोत्‍सव मनाया जाता था । और हम सब 'वर दे वीणावादिनी वर दे' गाते थे । फिर बालसभा होती और सब बच्‍चे अपनी अपनी प्रस्‍तुतियां देते । शायद वहीं से मेरे भीतर 'बोलने' की दुनिया में जाने के संस्‍कार बन गये होंगे ।

वसंत पंचमी साहित्‍य और संगीत का पर्व होना चाहिए । पर क्‍या हमारे शहरों में उतनी शिद्दत से वसंतोत्‍सव मनाया जाता है । क्‍या संगीत-संध्‍याओं का आयोजन वसंत के बहाने हो रहा है । क्‍या वसंत के बहाने काव्‍योत्‍सव हो रहे हैं । ये सब सोचने की बातें हैं । शायद बाज़ार को वसंत में उतना potential नजर नहीं आया है । जितना करवा चौथ या रक्षा बंधन में नजर आता है । वसंत पंचमी पर कोशिश कीजिए कि एक केसरिया रूमाल ही रख लें । अपनी पत्‍नी या बहन को केसरिया वस्‍त्र भेंट कर दें । सरस्‍वती वंदना कर लें । या फिर कम से कम कुछ अच्‍छी कविताएं पढ़ लें । कुछ अच्‍छा संगीत सुन लें । कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है ।

पहले ज़रा सरस्‍वती वंदना सुन ली जाये फिल्‍म आलाप से । संगीत है जयदेव का ।

 

 

और ये रहीं वसंत की कुछ कविताएं । जो हमने कविता कोश से ली हैं ।

 

सूर्यकांत त्रिपाठी की रची सरस्‍वती वंदना

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

 

सूर्यकांत त्रिपाठी की कविता--वसंत आया

सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,

स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।

सुमित्रानंदन पंत की कविता--वसंत

चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह, मग़, वन में आया वसंत
सुलगा फागुन का सूनापन
सौन्दर्य शिखाओं में अनंत

सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह

पल्लव पल्लव में नवल रूधिर
पत्रों में मांसल रंग खिला
आया नीली पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब से गाल लजा
आया पंखड़ियों को काले-
पीले धब्बों से सहज सजा

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न
अलि के अंतर में प्रणय गान
लेकर आया प्रेमी वसंत
आकुल जड़-चेतन स्नेह प्राण

 

अज्ञेय की कविता--वसंत आ गया

मलयज का झोंका बुला गया
खेलते से स्पर्श से
रोम रोम को कंपा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली
सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली
नीम के भी बौर में मिठास देख
हँस उठी है कचनार की कली
टेसुओं की आरती सजा के
बन गयी वधू वनस्थली

स्नेह भरे बादलों से
व्योम छा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

चेत उठी ढीली देह में लहू की धार
बेंध गयी मानस को दूर की पुकार
गूंज उठा दिग दिगन्त
चीन्ह के दुरन्त वह स्वर बार
"सुनो सखि! सुनो बन्धु!
प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार!"

आज मधुदूत निज
गीत गा गया
जागो जागो
जागो सखि वसन्त आ गया, जागो!

 

उदय प्रकाश की कविता--वसंत

रेल गाड़ी आती है

और बिना रुके

चली जाती है ।

जंगल में

पलाश का एक गार्ड

लाल झंडियाँ

दिखाता रह जाता है.

मुझे महादेवी वर्मा की कविता याद आ रही है--धीरे धीरे क्षितिज पर उतर, आ वसंत रजनी । शायद किसी पुरानी डायरी में उतारी रखी है । मिल गयी तो जल्‍दी ही आप तक पहुंचाऊंगा ।

कैसा लगा आपको रेडियोवाणी का वसंतोत्‍सव

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रेडियोवाणी पर वसंतोत्‍सव--वसंत की कुछ कविताएं और फिल्‍म आलाप का गीत-माता सरस्‍वती शारदे

लगभग आठ दिन की यात्रा के बाद मैं फिर से हाजि़र हूं । शायद आपमें से कुछ को पता ना हो, दरअसल विविध भारती अपने इस स्‍वर्ण जयंती वर्ष में कई बड़े आयोजन कर रही है । इस महीने हमने भारत पाकिस्‍तान की सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवानों के बीच जाकर एक संगीत संध्‍या का आयोजन किया और साथ में कई दिन उनके बीच रहकर उनसे बातें की । उनकी रिकॉर्डिंग्‍स कीं । जैसलमेर से आगे रामगढ़ में रहना और फिर बी.एस.एफ. के कारवां के साथ एकदम भारत-पाक सीमा के कंटीले तारों तक जाना और बबलियांवालां की उस बॉर्डर पोस्‍ट को देखना बेहद रोमांच, गर्व, देशभक्ति और चिंता का अहसास करा गया । ये अहसास बार बार होता रहा कि क्‍या दो सगे मुल्‍कों के बीच ऐसे कंटीले तार अच्‍छे लगते हैं । दोनों तरफ़ से तनी हुई बंदूकें । चलिए छोडि़ए । इस यात्रा का सचित्र-ब्‍यौरा जल्‍दी ही तरंग पर शुरू किया जायेगा ।

आज वसंत पंचमी है । रेडियोवाणी पर ये पहली वसंत-पंचमी है । जब मैं सरस्‍वती शिशु मंदिर भोपाल में पढ़ता था तो वसंतोत्‍सव मनाया जाता था । और हम सब 'वर दे वीणावादिनी वर दे' गाते थे । फिर बालसभा होती और सब बच्‍चे अपनी अपनी प्रस्‍तुतियां देते । शायद वहीं से मेरे भीतर 'बोलने' की दुनिया में जाने के संस्‍कार बन गये होंगे ।

वसंत पंचमी साहित्‍य और संगीत का पर्व होना चाहिए । पर क्‍या हमारे शहरों में उतनी शिद्दत से वसंतोत्‍सव मनाया जाता है । क्‍या संगीत-संध्‍याओं का आयोजन वसंत के बहाने हो रहा है । क्‍या वसंत के बहाने काव्‍योत्‍सव हो रहे हैं । ये सब सोचने की बातें हैं । शायद बाज़ार को वसंत में उतना potential नजर नहीं आया है । जितना करवा चौथ या रक्षा बंधन में नजर आता है । वसंत पंचमी पर कोशिश कीजिए कि एक केसरिया रूमाल ही रख लें । अपनी पत्‍नी या बहन को केसरिया वस्‍त्र भेंट कर दें । सरस्‍वती वंदना कर लें । या फिर कम से कम कुछ अच्‍छी कविताएं पढ़ लें । कुछ अच्‍छा संगीत सुन लें । कहीं और जाने की ज़रूरत नहीं है ।

पहले ज़रा सरस्‍वती वंदना सुन ली जाये फिल्‍म आलाप से । संगीत है जयदेव का ।

 

 

और ये रहीं वसंत की कुछ कविताएं । जो हमने कविता कोश से ली हैं ।

 

सूर्यकांत त्रिपाठी की रची सरस्‍वती वंदना

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

 

सूर्यकांत त्रिपाठी की कविता--वसंत आया

सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,

स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।

सुमित्रानंदन पंत की कविता--वसंत

चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह, मग़, वन में आया वसंत
सुलगा फागुन का सूनापन
सौन्दर्य शिखाओं में अनंत

सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर उर में मधुर दाह
आया वसंत, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह

पल्लव पल्लव में नवल रूधिर
पत्रों में मांसल रंग खिला
आया नीली पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब से गाल लजा
आया पंखड़ियों को काले-
पीले धब्बों से सहज सजा

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न
अलि के अंतर में प्रणय गान
लेकर आया प्रेमी वसंत
आकुल जड़-चेतन स्नेह प्राण

 

अज्ञेय की कविता--वसंत आ गया

मलयज का झोंका बुला गया
खेलते से स्पर्श से
रोम रोम को कंपा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली
सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली
नीम के भी बौर में मिठास देख
हँस उठी है कचनार की कली
टेसुओं की आरती सजा के
बन गयी वधू वनस्थली

स्नेह भरे बादलों से
व्योम छा गया
जागो जागो
जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो

चेत उठी ढीली देह में लहू की धार
बेंध गयी मानस को दूर की पुकार
गूंज उठा दिग दिगन्त
चीन्ह के दुरन्त वह स्वर बार
"सुनो सखि! सुनो बन्धु!
प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार!"

आज मधुदूत निज
गीत गा गया
जागो जागो
जागो सखि वसन्त आ गया, जागो!

 

उदय प्रकाश की कविता--वसंत

रेल गाड़ी आती है

और बिना रुके

चली जाती है ।

जंगल में

पलाश का एक गार्ड

लाल झंडियाँ

दिखाता रह जाता है.

मुझे महादेवी वर्मा की कविता याद आ रही है--धीरे धीरे क्षितिज पर उतर, आ वसंत रजनी । शायद किसी पुरानी डायरी में उतारी रखी है । मिल गयी तो जल्‍दी ही आप तक पहुंचाऊंगा ।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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