अहमदाबाद की यात्रा की वजह से रेडियोवाणी पर पिछले कई दिनों से कुछ जारी नहीं किया जा सका । अब गीतों का सिलसिला दोबारा शुरू किया जा रहा है । पिछले कुछ दिनों से मैं मन्ना दा के गीत सुन रहा हूं । शायद रेडियोवाणी पर पहले भी बताया है कि मन्ना दा को सुनने का शौक़ बचपन से ही लग गया था । वो पहले गायक थे जिनके गाने हम सभी मित्र ढूंढ ढूंढकर सुनते थे । और इसी खोज में मन्ना डे की गायी 'मधुशाला' हासिल हुई और बहुत आगे चलकर मिले मन्ना दा के गाये ग़ैर-फिल्मी गीत और ग़ज़लें । फिर मन्ना दा के गाए बांगला गीत भी मिले और एक पूरा ख़ज़ाना हमारे सामने आ गया ।
आज जो गीत रेडियोवाणी के ज़रिए आप तक पहुंचाया जा रहा है ये मन्ना दा का पहला हिट गीत था ।
आप जानते होंगे कि मन्ना डे का असली नाम था प्रबोधचंद्र डे । वो अपने ज़माने के प्रख्यात गायक के.सी.डे के भतीजे थे । सन 1940 में जब के.सी.डे बंबई आए तो मन्ना डे भी उनके साथ चले आये । और संगीतकार एच पी दास के सहायक बन गये । फिल्म 'रामराज्य' में उन्होंने अपना पहला गीत गाया और उसके बाद उन्हें लंबा स्ट्रगल करना पड़ा । उन्होंने वापस लौटने पर भी विचार किया । लेकिन इसी बीच उन्हें 'मशाल' फिल्म का ये गीत मिला ।
इस गाने से जुड़ी एक कथा सचिन देव बर्मन के बारे में भी है । सचिन देव बर्मन ने 'शिकारी' और 'आठ दिन' जैसी फिल्मों से अपनी संगीत यात्रा शुरू की थी । ये सन 1946 की बात है । इसके बाद उन्होंने 'दो भाई' फिल्म का बेहतरीन गीत ' मेरा सुंदर सपना बीत गया' भी दिया । जो गीता रॉय का पहला फिल्मी गाना था । लेकिन सचिन दा को कामयाबी नहीं मिल रही थी । निराश होकर सचिन देव बर्मन ने कोलकाता वापस लौटने का मन बना लिया था । उन दिनों सचिन देव बर्मन फिल्मिस्तान की फिल्म 'मशाल' में संगीत दे रहे थे । फिल्मिस्तान के पार्टनर अशोक कुमार सचिन देव बर्मन के क़द्रदान थे । उन्होंने सचिन दा को समझाया कि इस फिल्म का काम पूरा करके ही आगे के बारे में सोचें । सन 1950 की बात है ये । ख़ैर इस फिल्म के गाने 'ऊपर गगन विशाल' ने ना सिर्फ मन्ना डे की कि़स्मत बदल दी बल्कि सचिन देव बर्मन को भी मुंबई में स्थापित कर दिया ।
ये गीत कवि प्रदीप ने लिखा है । यू ट्यूब पर छानबीन करने से मुझे इसका वीडियो भी मिल गया है । तो चलिए सुनें 'ऊपर गगन विशाल' ।
ये गाना जैसे जैसे आगे बढ़ता है, इसके सुर ऊपर होते जाते हैं । ख़ासतौर पर इसका कोरस बड़ा ही विकल और उत्साहित करने वाला है ।
अहमदाबाद की यात्रा की वजह से रेडियोवाणी पर पिछले कई दिनों से कुछ जारी नहीं किया जा सका । अब गीतों का सिलसिला दोबारा शुरू किया जा रहा है । पिछले कुछ दिनों से मैं मन्ना दा के गीत सुन रहा हूं । शायद रेडियोवाणी पर पहले भी बताया है कि मन्ना दा को सुनने का शौक़ बचपन से ही लग गया था । वो पहले गायक थे जिनके गाने हम सभी मित्र ढूंढ ढूंढकर सुनते थे । और इसी खोज में मन्ना डे की गायी 'मधुशाला' हासिल हुई और बहुत आगे चलकर मिले मन्ना दा के गाये ग़ैर-फिल्मी गीत और ग़ज़लें । फिर मन्ना दा के गाए बांगला गीत भी मिले और एक पूरा ख़ज़ाना हमारे सामने आ गया ।
आज जो गीत रेडियोवाणी के ज़रिए आप तक पहुंचाया जा रहा है ये मन्ना दा का पहला हिट गीत था ।
आप जानते होंगे कि मन्ना डे का असली नाम था प्रबोधचंद्र डे । वो अपने ज़माने के प्रख्यात गायक के.सी.डे के भतीजे थे । सन 1940 में जब के.सी.डे बंबई आए तो मन्ना डे भी उनके साथ चले आये । और संगीतकार एच पी दास के सहायक बन गये । फिल्म 'रामराज्य' में उन्होंने अपना पहला गीत गाया और उसके बाद उन्हें लंबा स्ट्रगल करना पड़ा । उन्होंने वापस लौटने पर भी विचार किया । लेकिन इसी बीच उन्हें 'मशाल' फिल्म का ये गीत मिला ।
इस गाने से जुड़ी एक कथा सचिन देव बर्मन के बारे में भी है । सचिन देव बर्मन ने 'शिकारी' और 'आठ दिन' जैसी फिल्मों से अपनी संगीत यात्रा शुरू की थी । ये सन 1946 की बात है । इसके बाद उन्होंने 'दो भाई' फिल्म का बेहतरीन गीत ' मेरा सुंदर सपना बीत गया' भी दिया । जो गीता रॉय का पहला फिल्मी गाना था । लेकिन सचिन दा को कामयाबी नहीं मिल रही थी । निराश होकर सचिन देव बर्मन ने कोलकाता वापस लौटने का मन बना लिया था । उन दिनों सचिन देव बर्मन फिल्मिस्तान की फिल्म 'मशाल' में संगीत दे रहे थे । फिल्मिस्तान के पार्टनर अशोक कुमार सचिन देव बर्मन के क़द्रदान थे । उन्होंने सचिन दा को समझाया कि इस फिल्म का काम पूरा करके ही आगे के बारे में सोचें । सन 1950 की बात है ये । ख़ैर इस फिल्म के गाने 'ऊपर गगन विशाल' ने ना सिर्फ मन्ना डे की कि़स्मत बदल दी बल्कि सचिन देव बर्मन को भी मुंबई में स्थापित कर दिया ।
ये गीत कवि प्रदीप ने लिखा है । यू ट्यूब पर छानबीन करने से मुझे इसका वीडियो भी मिल गया है । तो चलिए सुनें 'ऊपर गगन विशाल' ।
ये गाना जैसे जैसे आगे बढ़ता है, इसके सुर ऊपर होते जाते हैं । ख़ासतौर पर इसका कोरस बड़ा ही विकल और उत्साहित करने वाला है ।
ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल बीच में धरती वाह मेरे मालिक तू ने किया कमाल को: अरे वाह मेरे मालिक क्या तेरी लीला तू ने किया कमाल म: ऊपर गगन विशाल म: एक फूँक से रच दिया तू ने सूरज अगन का गोला एक फूँक से रचा चन्द्रमा लाखों सितारों का टोला तू ने रच दिया पवन झखोला ये पानी और ये शोला ये बादल का उड़न खटोला जिसे देख हमारा मन डोला सोच सोच हम करें अचम्भा नज़र न आता एक भी खम्बा फिर भी ये आकाश खड़ा है हुए करोड़ो साल मालिक तू ने किया कमाल ऊपर गगन विशाल को: आ हा आ हा आ आ आ म: तू ने रचा एक अद्भुत् प्राणी जिसका नाम इनसान - २ इसकी नन्ही प्राण है लेकिन भरा हुआ तूफ़ान इस जग में इनसान के दिल को कौन सका पहचान इस में ही शैतान बसा है इस में ही भगवान बड़ा ग़ज़ब का है ये खिलौना - २ इसका नहीं मिसाल मालिक तू ने किया कमाल ... ऊपर गगन विशाल को: आ आ आ आ आ आ।।
85 बरस के देव आनंद इस साल पहली बार cannes film festival में जा रहे हैं । उनकी सदाबहार फिल्म 'गाईड' को इस साल कान्स फिल्म समारोह के 'क्लासिक्स-सेक्शन' के लिए चुना गया है । मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बार The Hindustan Times की रोशमिला भट्टाचार्य ने बाईस अप्रैल के अख़बार में फिल्म 'गाईड' के निर्माण से जुड़ी दिलचस्प बातें लिखी हैं । ये उन्हीं के लेख का हिंदी अनुवाद है ।
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने फिल्म गाईड से जुड़ी कुछ अनजान और दिलचस्प बातें बताईं थी । आईये रोशमिला के लेख का आगे का हिस्सा पढ़ा जाए ।
पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि किस तरह से वहीदा रहमान और राज खोसला की अनबन की वजह से देव साहब ने राज खोसला को गाईड का निर्देशन करने से हटा दिया और अपने बड़े भाई साहब यानी चेतन आनंद के पास गए । उनसे निवेदन किया कि वो 'गाईड' का निर्देशन करें । चेतन आनंद 'नीचा नगर' और 'अफसर' जैसी फिल्में बनाकर नाम कमा चुके थे । इस तरह फिल्म गाईड की शूटिंग का पहला शेड्यूल शुरू हुआ । इस दौरान सबकी समझ में आ गया कि हिंदी और अंग्रेज़ी में एक साथ शूटिंग करना बेहद सुस्त, बोझिल और उबाऊ हो रहा है । आपस में बहसबाज़ी और टकराव भी हो रहा है । इसलिए तय किया गया कि पहले अंग्रेज़ी संस्करण को फिल्मा लिया जाए फिर हिंदी की बारी आए । इस तरह डेनियलवस्की ने अंग्रेजी फिल्म 'गाईड' का निर्देशन संभाल लिया ।
चेतन आनंद अब अपनी युद्ध-फिल्म 'हक़ीक़त' के निर्माण में वयस्त हो गये । जिस समय गाईड की शूटिंग के लिए वो उदयपुर जाने की तैयारी कर रहे थे तभी खबर आई कि सेना ने हक़ीक़त की शूटिंग के लिए उन्हें लद्दाख़ आने की इजाज़त दे दी है । उन्हें फ़ौरन लद्दाख़ के लिए रवाना होना पड़ा । इस तरह एक बार फिर देव आनंद के सपनों की फिल्म 'गाईड' निर्देशक-विहीन हो गयी ।
मुसीबत में एक बार देव साहब ने अपने भाई का सहारा लिया । इस बार छोटे भाई विजय आनंद का । गोल्डी यानी विजय आनंद ने दो बार पहले भी गाईड के निर्देशन का प्रस्ताव ठुकरा दिया था । पर इस बार संकट था इसलिए वे राज़ी हो गए । पर इस शर्त पर कि गाईड को वो अपने अंदाज़ में बनाएंगे और देव साहब कोई दख़लअंदाज़ी नहीं करेंगे । उदयपुर जाकर शूटिंग करने से पहले गोल्डी ने पूरे 18 दिन खंडाला में बिताए और फिल्म 'गाईड' की स्क्रिप्ट को दुरूस्त किया । इस दौरान डैनियलवस्की भी मालगुड़ी से गाईड की शूटिंग करने उदयपुर आ गये थे । उनका मानना था कि सुनहरी रेत, ऊंट और रंग बिरंगी पोशाकों वाले स्थानीय लोग फिल्म को एक नया रंग देंगे । हालांकि विवाहेत्तर संबंधों वाले मुद्दे को 'तरल' करने या संभालने के लिए टैड डैनियलवस्की राज़ी नहीं थे । और गोल्डी को ये बात लगातार परेशान कर रही थी । गोल्डी का कहना था कि मैं अपनी फिल्म को इस तरह शुरू नहीं कर सकता कि रोज़ी और गाईड राजू अपनी मुलाक़ात के कुछ ही घंटों बाद सीधे बिस्तर पर नज़र आएं । भारतीय दर्शक इसे स्वीकार ही नहीं करेंगे और इस तरह देश की छबि भी विदेशों में ग़लत तरीक़े से पहुंचेगी ।
विजय आनंद ने 'गाईड' की स्क्रिप्ट को दोबारा लिखा और इसके लिए आर के नारायण के उपन्यास से एकदम अलग अंत तैयार किया । फिर गोल्डी ने इसकी शूटिंग महज़ अस्सी शिफ्टों में पूरी कर ली । इस तरह गाईड का हिंदी संस्करण टैड डैनियलवस्की वाले संस्करण से एकदम अलग बना । भारतीय संवेदनाओं और अंग्रेजी तकनीक से बनी ये फिल्म । डैनियलवस्की ने भारतीय संस्करण से कुछ सीन भी उठाए । पर गाईड का अंग्रेजी संस्करण survival ज्यादा समय तक थियेटरों में नहीं टिका । कहते हैं कि आर के नारायण ने पहले तो देव आनंद को फिल्म की प्रशंसा में खत लिखा पर बाद में सार्वजनिक तौर पर फिल्म को बहुत उधेड़ा । उनका कहना था कि ये 'मिसगाईडेड गाईड' है । अंग्रेज़ी संस्करण की नाकामी की वजह से कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर हिंदी संस्करण को हाथ नहीं लगा रहा था । आखिरकार नवकेतन के प्रोडक्शन कंट्रोलर यश जौहर को जिम्मेदारी दी गयी कि वो दिल्ली के डिस्ट्रीब्यूटर को चुपचाप फिल्म के कुछ गीत दिखाएं । ' पिया तोसे नैना लागे रे' देखते ही वितरक ने फिल्म खरीदने की घोषणा कर दी । इस तरह सन 1965 में मुंबई के मराठा मंदिर थियेटर में गाईड का प्रीमियर किया गया । हालांकि सुस्त शुरूआत हुई पर फिल्म वहां दस सप्ताह तक चली ।
पड़ोसी राज्य गुजरात में धीमी शुरूआत हुई । पर अचानक अकाल आ जाने से लोग गाईड राजू की ओर दौड़े । फिल्म में गाईड राजू अकाल खत्म करने के लिए बारह दिन का उपवास करता है और उसकी मौत के बाद बारिश आती है । गुजरात में पोस्टरों पर लिखा गया-- गाईड राजू बारिश के लिए प्रार्थना कर रहा है । और अहमदाबाद में फिल्म ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई ।
विदेशों में भी गोल्डी के निर्देशन की प्रशंसा हुई । हॉलीवुड के महान निर्माता निर्देशक हॉवर्ड हॉक्स ने गोल्डी को MGM स्टूडियो की एक फिल्म निर्देशित करने का प्रस्ताव रखा और पहले गोल्डी से कहा कि पहले वो एक ऑस्कर जीतकर लाएं । जी हां गाईड को सन 1966 में भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कार में भेजा गया था । हॉक्स के कहने पर बाईस रील की फिल्म को आधो घंटे कम किया गया था और इसमें अंग्रेजी सब टाइटल भी डाले गये थे । लेकिन इस साल नॉर्वे की एक फिल्म को ये पुरस्कार मिला ।
आज देव साहब इस फिल्म के प्रिंट को री-कलर करवा रहे हैं । और हो सकता है कि कांस फिल्म समारोह के बाद एक बार फिर भारत में इसे रिलीज़ किया जाए । वो कहते हैं ना कि क्लासिक फिल्में तो कभी भी देखी दिखाई जा सकती हैं । क्या आपने फिल्म 'गाईड' देखी है ।
ये था रोशमिला भट्टाचार्य का हिंदुस्तान टाइम्स में छपे लेख का अनुवाद । और अब गाईड का एक और गीत सुना जाए । गीत नहीं भजन । बल्कि कीर्तन । आपको याद है कि इसे फिल्म में कहां पर रखा गया था ।
85 बरस के देव आनंद इस साल पहली बार cannes film festival में जा रहे हैं । उनकी सदाबहार फिल्म 'गाईड' को इस साल कान्स फिल्म समारोह के 'क्लासिक्स-सेक्शन' के लिए चुना गया है । मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बार The Hindustan Times की रोशमिला भट्टाचार्य ने बाईस अप्रैल के अख़बार में फिल्म 'गाईड' के निर्माण से जुड़ी दिलचस्प बातें लिखी हैं । ये उन्हीं के लेख का हिंदी अनुवाद है ।
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने फिल्म गाईड से जुड़ी कुछ अनजान और दिलचस्प बातें बताईं थी । आईये रोशमिला के लेख का आगे का हिस्सा पढ़ा जाए ।
पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि किस तरह से वहीदा रहमान और राज खोसला की अनबन की वजह से देव साहब ने राज खोसला को गाईड का निर्देशन करने से हटा दिया और अपने बड़े भाई साहब यानी चेतन आनंद के पास गए । उनसे निवेदन किया कि वो 'गाईड' का निर्देशन करें । चेतन आनंद 'नीचा नगर' और 'अफसर' जैसी फिल्में बनाकर नाम कमा चुके थे । इस तरह फिल्म गाईड की शूटिंग का पहला शेड्यूल शुरू हुआ । इस दौरान सबकी समझ में आ गया कि हिंदी और अंग्रेज़ी में एक साथ शूटिंग करना बेहद सुस्त, बोझिल और उबाऊ हो रहा है । आपस में बहसबाज़ी और टकराव भी हो रहा है । इसलिए तय किया गया कि पहले अंग्रेज़ी संस्करण को फिल्मा लिया जाए फिर हिंदी की बारी आए । इस तरह डेनियलवस्की ने अंग्रेजी फिल्म 'गाईड' का निर्देशन संभाल लिया ।
चेतन आनंद अब अपनी युद्ध-फिल्म 'हक़ीक़त' के निर्माण में वयस्त हो गये । जिस समय गाईड की शूटिंग के लिए वो उदयपुर जाने की तैयारी कर रहे थे तभी खबर आई कि सेना ने हक़ीक़त की शूटिंग के लिए उन्हें लद्दाख़ आने की इजाज़त दे दी है । उन्हें फ़ौरन लद्दाख़ के लिए रवाना होना पड़ा । इस तरह एक बार फिर देव आनंद के सपनों की फिल्म 'गाईड' निर्देशक-विहीन हो गयी ।
मुसीबत में एक बार देव साहब ने अपने भाई का सहारा लिया । इस बार छोटे भाई विजय आनंद का । गोल्डी यानी विजय आनंद ने दो बार पहले भी गाईड के निर्देशन का प्रस्ताव ठुकरा दिया था । पर इस बार संकट था इसलिए वे राज़ी हो गए । पर इस शर्त पर कि गाईड को वो अपने अंदाज़ में बनाएंगे और देव साहब कोई दख़लअंदाज़ी नहीं करेंगे । उदयपुर जाकर शूटिंग करने से पहले गोल्डी ने पूरे 18 दिन खंडाला में बिताए और फिल्म 'गाईड' की स्क्रिप्ट को दुरूस्त किया । इस दौरान डैनियलवस्की भी मालगुड़ी से गाईड की शूटिंग करने उदयपुर आ गये थे । उनका मानना था कि सुनहरी रेत, ऊंट और रंग बिरंगी पोशाकों वाले स्थानीय लोग फिल्म को एक नया रंग देंगे । हालांकि विवाहेत्तर संबंधों वाले मुद्दे को 'तरल' करने या संभालने के लिए टैड डैनियलवस्की राज़ी नहीं थे । और गोल्डी को ये बात लगातार परेशान कर रही थी । गोल्डी का कहना था कि मैं अपनी फिल्म को इस तरह शुरू नहीं कर सकता कि रोज़ी और गाईड राजू अपनी मुलाक़ात के कुछ ही घंटों बाद सीधे बिस्तर पर नज़र आएं । भारतीय दर्शक इसे स्वीकार ही नहीं करेंगे और इस तरह देश की छबि भी विदेशों में ग़लत तरीक़े से पहुंचेगी ।
विजय आनंद ने 'गाईड' की स्क्रिप्ट को दोबारा लिखा और इसके लिए आर के नारायण के उपन्यास से एकदम अलग अंत तैयार किया । फिर गोल्डी ने इसकी शूटिंग महज़ अस्सी शिफ्टों में पूरी कर ली । इस तरह गाईड का हिंदी संस्करण टैड डैनियलवस्की वाले संस्करण से एकदम अलग बना । भारतीय संवेदनाओं और अंग्रेजी तकनीक से बनी ये फिल्म । डैनियलवस्की ने भारतीय संस्करण से कुछ सीन भी उठाए । पर गाईड का अंग्रेजी संस्करण survival ज्यादा समय तक थियेटरों में नहीं टिका । कहते हैं कि आर के नारायण ने पहले तो देव आनंद को फिल्म की प्रशंसा में खत लिखा पर बाद में सार्वजनिक तौर पर फिल्म को बहुत उधेड़ा । उनका कहना था कि ये 'मिसगाईडेड गाईड' है । अंग्रेज़ी संस्करण की नाकामी की वजह से कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर हिंदी संस्करण को हाथ नहीं लगा रहा था । आखिरकार नवकेतन के प्रोडक्शन कंट्रोलर यश जौहर को जिम्मेदारी दी गयी कि वो दिल्ली के डिस्ट्रीब्यूटर को चुपचाप फिल्म के कुछ गीत दिखाएं । ' पिया तोसे नैना लागे रे' देखते ही वितरक ने फिल्म खरीदने की घोषणा कर दी । इस तरह सन 1965 में मुंबई के मराठा मंदिर थियेटर में गाईड का प्रीमियर किया गया । हालांकि सुस्त शुरूआत हुई पर फिल्म वहां दस सप्ताह तक चली ।
पड़ोसी राज्य गुजरात में धीमी शुरूआत हुई । पर अचानक अकाल आ जाने से लोग गाईड राजू की ओर दौड़े । फिल्म में गाईड राजू अकाल खत्म करने के लिए बारह दिन का उपवास करता है और उसकी मौत के बाद बारिश आती है । गुजरात में पोस्टरों पर लिखा गया-- गाईड राजू बारिश के लिए प्रार्थना कर रहा है । और अहमदाबाद में फिल्म ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई ।
विदेशों में भी गोल्डी के निर्देशन की प्रशंसा हुई । हॉलीवुड के महान निर्माता निर्देशक हॉवर्ड हॉक्स ने गोल्डी को MGM स्टूडियो की एक फिल्म निर्देशित करने का प्रस्ताव रखा और पहले गोल्डी से कहा कि पहले वो एक ऑस्कर जीतकर लाएं । जी हां गाईड को सन 1966 में भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कार में भेजा गया था । हॉक्स के कहने पर बाईस रील की फिल्म को आधो घंटे कम किया गया था और इसमें अंग्रेजी सब टाइटल भी डाले गये थे । लेकिन इस साल नॉर्वे की एक फिल्म को ये पुरस्कार मिला ।
आज देव साहब इस फिल्म के प्रिंट को री-कलर करवा रहे हैं । और हो सकता है कि कांस फिल्म समारोह के बाद एक बार फिर भारत में इसे रिलीज़ किया जाए । वो कहते हैं ना कि क्लासिक फिल्में तो कभी भी देखी दिखाई जा सकती हैं । क्या आपने फिल्म 'गाईड' देखी है ।
ये था रोशमिला भट्टाचार्य का हिंदुस्तान टाइम्स में छपे लेख का अनुवाद । और अब गाईड का एक और गीत सुना जाए । गीत नहीं भजन । बल्कि कीर्तन । आपको याद है कि इसे फिल्म में कहां पर रखा गया था ।
85 बरस के देव आनंद इस साल पहली बार cannes film festival में जा रहे हैं । उनकी सदाबहार फिल्म 'गाईड' को इस साल कान्स फिल्म समारोह के 'क्लासिक्स-सेक्शन' के लिए चुना गया है । मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बार The Hindustan Times की रोशमिला भट्टाचार्य ने बाईस अप्रैल के अख़बार में फिल्म 'गाईड' के निर्माण से जुड़ी दिलचस्प बातें लिखी हैं । ये उन्हीं के लेख का हिंदी अनुवाद है ।
देव आनंद कहते हैं कि जब मैंने नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एक बक के साथ भारत और अमरीकी सहयोग से बनने वाली फिल्म 'गाईड' को घोषणा की तो लोगों ने कहा कि मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है । पर्ल एस बक ने फिल्म के अंग्रेज़ी संस्करण का प्रोडक्शन भी किया था और स्क्रिप्ट पर भी काम किया था । देव आनंद ने साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त आर. के. नारायण की पुस्तक 'गाईड' को चुना था और ये फिल्म संसार में बेहद चर्चा का विषय बन गया था । सभी का कहना था कि देव आनंद जैसे स्टार को एक ऐसे टूरिस्ट गाईड की भूमिका निभाने की क्या ज़रूरत है, जिसने अनैतिक संबंधों से लेकर धोखाधड़ी तक दुनिया भर के पाप किए हैं । और फिल्म के अंत में जाकर वो एक ठिकाने का काम करता है । इस पर देव आनंद का जवाब थ कि लीक से हटकर जीवन जीने के लिए व्यक्ति के भीतर एक पागलपन का तत्त्व होना ज़रूरी है । गाईड राजू में वही पागलपन मौजूद है । ( पर्ल एस बक की ये तस्वीर विकीपीडिया से साभार )
जब ये तय हो गया कि देव आनंद ही राजू का किरदार निभाएंगे तो तलाश शुरू हुई रोज़ी की । 'गाईड' के अंग्रेज़ी संस्करण के निर्देशन की जिम्मेदारी Tad danielwski को सौंपी गयी थी और उनका कहना था कि गाईड राजू की रोज़ी तो लीला नायडू ही हो सकती हैं । उन्होंने vogue पत्रिका में लीला नायडू को दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं के तौर पर देखा था । इस्माइल मर्चेन्ट की फिल्म The Householder भी टैड ने देख रखी थी और उनका मानना था कि लीला नायडू इस भूमिका के लिए परफेक्ट रहेंगी । लेकिन देवआनंद को लीला नायडू जम नहीं रही थीं । उनका कहना था कि रोज़ी एक लज्जावान भारतीय स्त्री नहीं थी । वो स्वतंत्र विचारों वाली, जुनूनी स्त्री थी और सबसे बड़ी बात वो एक नर्तकी थी । जबकि लीला नायडू नर्तकी नहीं थीं । फिर पद्मिनी के नाम पर विचार किया गया । फिर बारी आई वैजयंतीमाला की । लेकिन टैड इन नामों में से किसी पर भी सहमत नहीं हुए । फिर देव आनंद ने वहीदा रहमान के नाम का सुझाव दिया और Tad danielwski इससे सहमत हो गए । (लीला नायडू की तस्वीर इस वेबसाईट से साभार )
सवाल ये था कि क्या वहीदा रहमान एक शादीशुदा महिला का किरदार निभाने को राज़ी होंगी, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े साहस के साथ अपने वृद्ध और नपुंसक पति को छोड़कर एक युवा गाईड के साथ भाग निकलती है । पर वहीदा राज़ी हो गईं । जब फिल्म 'नीलकमल' के निर्देशक राम माहेश्वरी को वहीदा के इस 'खलनायिकानुमा' रोल की ख़बर मिली तो वो भड़क गए । उन्होंने वहीदा से कहा कि मेरी फिल्म और अपने कैरियर को तबाह मत करो । मेरी फिल्म में तुम सीता की भूमिका कर रही हो । लेकिन वहीदा रहमान ने तय कर लिया था । वो अपने आप को सती-सावित्री वाली भूमिका में बांधकर नहीं रखना चाहती थीं । वहीदा का कहना था कि जिंदगी में कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब कोई भी महिला रोज़ी की तरह फैसले करती है और बाद में रोज़ी की ही तरह अपने फैसले पर पछताती भी है । वहीदा रहमान को पूरा यक़ीन था कि वो दर्शकों से रोज़ी प्रति सहानुभूति जुटा लेंगी ।
लेकिन वहीदा रहमान के सामने एक और दिक्कत थी । जब उन्हें पता चला कि राज खोसला गाईड का निर्देशन करेंगे तो उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिये । दरअसल फिल्म 'सोलहवां सावन' के निर्माण के दौरान वहीदा और राज खोसला की अनबन हो गयी थी । और वहीदा ने तय किया था कि अब वो कभी राज खोसला के साथ काम नहीं करेंगी । देव आनंद को समझ में आ गया कि वहीदा रहमान की ख़ातिर उन्हें राज खोसला को हटाना होगा । बड़ी दिक्कत थी । जब राज खोसला को हटा दिया गया तो फिर सवाल उठा कि गाईड का निर्देशन कौन करे । और इस बार देव आनंद ने दरवाज़ा खटखटाया अपने बड़े भाई साहब चेतन आनंद का । जिन्होंने नवकेतन के पहली फिल्म 'अफसर' का निर्देशन किया था ।
फिल्म गाईड के निर्माण्ा से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातें कल ।
आर के नारायण की पुस्तक 'द गाईड' गूगलबुक्स पर यहां पढ़ें ।
जाने से पहले आपको फिल्म गाईड का सबसे कम चर्चित और मेरा पसंदीदा गीत सुनवाता जाऊं । इसे संगीतकार कुमार सचिन देव बर्मन ने स्वयं गाया है । रचना शैलेन्द्र की है । अपने संगीत और गायकी में ये गाना मुझे सर्वोत्कृष्ट लगता है । इस गाने में मुखड़े के बाद सितार, तबले और बांसुरी की तान सुनिए । और अपने मन के बयाबान में खो जाईये ।
इस गाने से पहले अपने मन की कुछ बातें कहना चाहता हूं । पिछली कुछ पोस्टों से बिना किसी योजना के ये हो गया है कि बंजारे मन के गाने रेडियोवाणी पर बजाए जा रहे हैं । संयोग देखिए कि गाइड पर इस पोस्ट को लिखते हुए मैंने सोचा नहीं था कि ये गाना लगाऊंगा । पर सच मानिए कि मेरे जैसे बंजारे मन वाले व्यक्ति के दिल के क़रीब ये गाना नहीं होगा तो भला और कौन सा होगा । इस गाने का एक एक शब्द दिल पर उतरता है । आप चाहे जिस भी परिस्थिति में हों, ये आपको अपने जीवन की कहानी लगेगी । इस गाने के ज़रिए मैं गीतकार शैलेन्द्र को सलाम भी कर रहा हूं ।
85 बरस के देव आनंद इस साल पहली बार cannes film festival में जा रहे हैं । उनकी सदाबहार फिल्म 'गाईड' को इस साल कान्स फिल्म समारोह के 'क्लासिक्स-सेक्शन' के लिए चुना गया है । मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बार The Hindustan Times की रोशमिला भट्टाचार्य ने बाईस अप्रैल के अख़बार में फिल्म 'गाईड' के निर्माण से जुड़ी दिलचस्प बातें लिखी हैं । ये उन्हीं के लेख का हिंदी अनुवाद है ।
देव आनंद कहते हैं कि जब मैंने नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एक बक के साथ भारत और अमरीकी सहयोग से बनने वाली फिल्म 'गाईड' को घोषणा की तो लोगों ने कहा कि मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है । पर्ल एस बक ने फिल्म के अंग्रेज़ी संस्करण का प्रोडक्शन भी किया था और स्क्रिप्ट पर भी काम किया था । देव आनंद ने साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त आर. के. नारायण की पुस्तक 'गाईड' को चुना था और ये फिल्म संसार में बेहद चर्चा का विषय बन गया था । सभी का कहना था कि देव आनंद जैसे स्टार को एक ऐसे टूरिस्ट गाईड की भूमिका निभाने की क्या ज़रूरत है, जिसने अनैतिक संबंधों से लेकर धोखाधड़ी तक दुनिया भर के पाप किए हैं । और फिल्म के अंत में जाकर वो एक ठिकाने का काम करता है । इस पर देव आनंद का जवाब थ कि लीक से हटकर जीवन जीने के लिए व्यक्ति के भीतर एक पागलपन का तत्त्व होना ज़रूरी है । गाईड राजू में वही पागलपन मौजूद है । ( पर्ल एस बक की ये तस्वीर विकीपीडिया से साभार )
जब ये तय हो गया कि देव आनंद ही राजू का किरदार निभाएंगे तो तलाश शुरू हुई रोज़ी की । 'गाईड' के अंग्रेज़ी संस्करण के निर्देशन की जिम्मेदारी Tad danielwski को सौंपी गयी थी और उनका कहना था कि गाईड राजू की रोज़ी तो लीला नायडू ही हो सकती हैं । उन्होंने vogue पत्रिका में लीला नायडू को दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं के तौर पर देखा था । इस्माइल मर्चेन्ट की फिल्म The Householder भी टैड ने देख रखी थी और उनका मानना था कि लीला नायडू इस भूमिका के लिए परफेक्ट रहेंगी । लेकिन देवआनंद को लीला नायडू जम नहीं रही थीं । उनका कहना था कि रोज़ी एक लज्जावान भारतीय स्त्री नहीं थी । वो स्वतंत्र विचारों वाली, जुनूनी स्त्री थी और सबसे बड़ी बात वो एक नर्तकी थी । जबकि लीला नायडू नर्तकी नहीं थीं । फिर पद्मिनी के नाम पर विचार किया गया । फिर बारी आई वैजयंतीमाला की । लेकिन टैड इन नामों में से किसी पर भी सहमत नहीं हुए । फिर देव आनंद ने वहीदा रहमान के नाम का सुझाव दिया और Tad danielwski इससे सहमत हो गए । (लीला नायडू की तस्वीर इस वेबसाईट से साभार )
सवाल ये था कि क्या वहीदा रहमान एक शादीशुदा महिला का किरदार निभाने को राज़ी होंगी, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े साहस के साथ अपने वृद्ध और नपुंसक पति को छोड़कर एक युवा गाईड के साथ भाग निकलती है । पर वहीदा राज़ी हो गईं । जब फिल्म 'नीलकमल' के निर्देशक राम माहेश्वरी को वहीदा के इस 'खलनायिकानुमा' रोल की ख़बर मिली तो वो भड़क गए । उन्होंने वहीदा से कहा कि मेरी फिल्म और अपने कैरियर को तबाह मत करो । मेरी फिल्म में तुम सीता की भूमिका कर रही हो । लेकिन वहीदा रहमान ने तय कर लिया था । वो अपने आप को सती-सावित्री वाली भूमिका में बांधकर नहीं रखना चाहती थीं । वहीदा का कहना था कि जिंदगी में कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब कोई भी महिला रोज़ी की तरह फैसले करती है और बाद में रोज़ी की ही तरह अपने फैसले पर पछताती भी है । वहीदा रहमान को पूरा यक़ीन था कि वो दर्शकों से रोज़ी प्रति सहानुभूति जुटा लेंगी ।
लेकिन वहीदा रहमान के सामने एक और दिक्कत थी । जब उन्हें पता चला कि राज खोसला गाईड का निर्देशन करेंगे तो उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिये । दरअसल फिल्म 'सोलहवां सावन' के निर्माण के दौरान वहीदा और राज खोसला की अनबन हो गयी थी । और वहीदा ने तय किया था कि अब वो कभी राज खोसला के साथ काम नहीं करेंगी । देव आनंद को समझ में आ गया कि वहीदा रहमान की ख़ातिर उन्हें राज खोसला को हटाना होगा । बड़ी दिक्कत थी । जब राज खोसला को हटा दिया गया तो फिर सवाल उठा कि गाईड का निर्देशन कौन करे । और इस बार देव आनंद ने दरवाज़ा खटखटाया अपने बड़े भाई साहब चेतन आनंद का । जिन्होंने नवकेतन के पहली फिल्म 'अफसर' का निर्देशन किया था ।
फिल्म गाईड के निर्माण्ा से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातें कल ।
आर के नारायण की पुस्तक 'द गाईड' गूगलबुक्स पर यहां पढ़ें ।
जाने से पहले आपको फिल्म गाईड का सबसे कम चर्चित और मेरा पसंदीदा गीत सुनवाता जाऊं । इसे संगीतकार कुमार सचिन देव बर्मन ने स्वयं गाया है । रचना शैलेन्द्र की है । अपने संगीत और गायकी में ये गाना मुझे सर्वोत्कृष्ट लगता है । इस गाने में मुखड़े के बाद सितार, तबले और बांसुरी की तान सुनिए । और अपने मन के बयाबान में खो जाईये ।
इस गाने से पहले अपने मन की कुछ बातें कहना चाहता हूं । पिछली कुछ पोस्टों से बिना किसी योजना के ये हो गया है कि बंजारे मन के गाने रेडियोवाणी पर बजाए जा रहे हैं । संयोग देखिए कि गाइड पर इस पोस्ट को लिखते हुए मैंने सोचा नहीं था कि ये गाना लगाऊंगा । पर सच मानिए कि मेरे जैसे बंजारे मन वाले व्यक्ति के दिल के क़रीब ये गाना नहीं होगा तो भला और कौन सा होगा । इस गाने का एक एक शब्द दिल पर उतरता है । आप चाहे जिस भी परिस्थिति में हों, ये आपको अपने जीवन की कहानी लगेगी । इस गाने के ज़रिए मैं गीतकार शैलेन्द्र को सलाम भी कर रहा हूं ।
मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि सचिन दा की आवाज़ में एक फकीराना स्पर्श है । दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं । बाज़ार से निकला हूं ख़रीददार नहीं हूं । कुछ इस तरह का फ़लसफ़ा लगता है । अफ़सोस की बात बस इतनी है कि सचिन दा ने बहुत ज्यादा गीत नहीं गाए, शायद इसका कारण ये रहा होगा कि सचिन दा की आवाज़ किसी भी नायक पर फिट नहीं बैठती थी, या इसे दूसरे तरीक़े से कहें तो ज्यादा मुनासिब होगा कि किसी भी नायक की शख्सियत ऐसी नहीं थी कि उसे परदे पर सचिन दा की आवाज़ मिल सके । फिर भी कई ऐसे नग़मे हैं जो सचिन दा की उपस्थिति का लगातार अहसास कराते रहते हैं । तो आज हम शुरू करते हैं इस नग्मे से ।
सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे ।।
होता तू पीपल मैं होती, अमरलता तेरी
तेरे गले माला बनके पड़ी मुस्काती रे ।।
सुन मेरे साथी रे ।।
जिया कहे तू सागर मैं होती तेरी नदिया
लहर बहर करती अपने पिया से मिल जाती रे
सुन मेरे साथी रे ।।
केवल दो अंतरों का गीत है । दो अंतरे क्या हैं, आप खुद ही पढ़ लीजिये केवल चार पंक्तियां हैं मूल रूप से । लेकिन कितना गहरा अर्थ समाहित किया है मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत में । इसे हम विशुद्ध भटियाली धुन कह सकते हैं । भटियाली संगीत में बांसुरी का बड़ा महत्त्व है । आप इस गाने को सुनिये और बांसुरी की तान के साथ खुद भी लहराईये । ये गाना तब हमारा साथ देता नज़र आता है जब जिंदगी में चीज़ें हमारे हाथ से छूट छूट जाती हैं । हम रेत की तरह उन्हें मुट्ठी में बंद करना चाहते हैं और वो सरक सरक पड़ती हैं । ये हमारी निराशाओं का गीत है ।
अगला गीत वो है जिसके बारे में चर्चा करने को हैदराबाद की अन्नपूर्णा जी ने भी कहा था, सन् 1971 में आई फिल्म अमर प्रेम का गीत ‘डोली में बिठाई के कहार’ ।
इस गाने में उस महिला की पीड़ा है, जिसका जीवन उजड़ गया है । आनंद बख्शी ने इस गाने को इतनी तल्लीनता और तन्मयता से लिखा है कि क्या कहें । फिल्म में ये गीत भी बैकग्राउंड गीत की तरह आता है । ‘मर के निकलना था घर से, जीते जी निकलना पड़ा’ और ‘जितने हैं आंसू मेरी अंखियों में इतना नदिया में नहीं रे नीर’ इन पंक्तियों से जैसे दर्द छलक छलक पड़ रहा है । इस गीत के लिए ऐसी आवाज़ की ज़रूरत थी, जिसमें दर्द का महासागर हो । यूं लगे जैसे कोई किसी ऊंचे से पहाड़ पर खड़े होकर ऊपर वाले तक अपनी दर्द भरी पुकार पहुंचा रहा है । और ये स्वर केवल बर्मन दादा की ही हो सकता था । इस गाने को तब सुनिए जब आप नितान्त अकेले हों और सुनते हुए अपनी आंखें बंद कर लीजिये, फिर देखिये कि किस तरह आपके अंतस में उतरेगा जज्बात का समंदर । दरअसल दर्द भरे इन चुनिन्दा गीतों के लिए बर्मन दा संगीत के देवपुरूष हैं । अफ़सोस बस इतना है कि ये गाने ना तो टी0वी0 पर आपको ज्यादा दिखाई देते हैं और ना ही रेडियो पर ज्यादा सुनाई देते हैं । यहां तक कि श्रोता इन गानों की फ़रमाईश भी नहीं करते । या तो इन्हें लोगों ने भुला दिया या फिर संगीत के क़द्रदान वर्ग तक ही ये सीमित रह गये । आज के ज्यादातर शोरगुल भरे संगीत में ये खामोश नग्मे सुकून का स्वर्ग बन गये हैं ।
मुझे आज की बिदा का मरके भी रहता इंतज़ार ।। मेरे साजन हैं ।।
मत खेल जल जायेगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की, चिर संगिनी हूं साजन की
मेरा खींचती हैं आंचल, मन मीत तेरी हर पुकार ।। मेरे साजन हैं ।।
शैलेन्द्र ने ये गीत लिखा था सन 1963 में आई फिल्म बंदिनी के लिये ।
इस गाने में भी वही विकलता, वही बेक़रारी है । कुछ छूट रहा है, तक़दीर पर अपना वश नहीं है और नायिका की मनोदशा को दर्शाने के लिए ये गीत फिल्म में रखा गया है । एक बात की ओर आपका ध्यान खींचना चाहूंगा । सचिन दा के जिन नग्मों की चर्चा आज हमने की उन तमाम गीतों में एक नारी के हृदय की पीड़ा, उसकी वेदना को उजागर किया गया है । ये सारे गीत बैकग्राउंड में आते हैं । नारी की पीड़ा और उसके जीवन की उलझन को दर्शाने के लिए ये गीत लता जी से भी गवाए जा सकते थे । या किसी और गायिका की आवाज़ भी ली जा सकती थी । पर ये फिल्म निर्देशकों की सूझबूझ और कलात्मकता ही थी कि उन्होंने सचिन दा की आवाज़ का सहारा लिया । बंबईया फिल्म के व्याकरण के हिसाब से देखें तो एक भी पक्ष इस आवाज़ का समर्थन करता नज़र नहीं आता । फिर भी ये गाने फिल्मों में आये । इन्होंने लोगों का ध्यान खींचा और कामयाबी हासिल की । तभी तो हम आज इतने सालों बाद भी इनका जिक्र कर रहे हैं । वो भी इतनी शिद्दत के साथ । पिछली पोस्ट पर किन्हीं अमिताभ जी ने टिप्पणी की थी कि इन गानों का वीडियो भी अगर दिखाऊं तो अच्छा होगा । उनसे निवेदन है कि वो वीडियो की लिंक भेज दें या टिप्पणी में इसी पोस्ट पर दिखा दें । जो वीडियो मुझे मिले वो यहां दिखाए जा रहे हैं ।
फिल्म बंदिनी का गीत ‘ओ रे मांझी’
फिल्म गाईड का गीत ‘ वहां कौन है तेरा’ Read more...
मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि सचिन दा की आवाज़ में एक फकीराना स्पर्श है । दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं । बाज़ार से निकला हूं ख़रीददार नहीं हूं । कुछ इस तरह का फ़लसफ़ा लगता है । अफ़सोस की बात बस इतनी है कि सचिन दा ने बहुत ज्यादा गीत नहीं गाए, शायद इसका कारण ये रहा होगा कि सचिन दा की आवाज़ किसी भी नायक पर फिट नहीं बैठती थी, या इसे दूसरे तरीक़े से कहें तो ज्यादा मुनासिब होगा कि किसी भी नायक की शख्सियत ऐसी नहीं थी कि उसे परदे पर सचिन दा की आवाज़ मिल सके । फिर भी कई ऐसे नग़मे हैं जो सचिन दा की उपस्थिति का लगातार अहसास कराते रहते हैं । तो आज हम शुरू करते हैं इस नग्मे से ।
सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे ।।
होता तू पीपल मैं होती, अमरलता तेरी
तेरे गले माला बनके पड़ी मुस्काती रे ।।
सुन मेरे साथी रे ।।
जिया कहे तू सागर मैं होती तेरी नदिया
लहर बहर करती अपने पिया से मिल जाती रे
सुन मेरे साथी रे ।।
केवल दो अंतरों का गीत है । दो अंतरे क्या हैं, आप खुद ही पढ़ लीजिये केवल चार पंक्तियां हैं मूल रूप से । लेकिन कितना गहरा अर्थ समाहित किया है मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत में । इसे हम विशुद्ध भटियाली धुन कह सकते हैं । भटियाली संगीत में बांसुरी का बड़ा महत्त्व है । आप इस गाने को सुनिये और बांसुरी की तान के साथ खुद भी लहराईये । ये गाना तब हमारा साथ देता नज़र आता है जब जिंदगी में चीज़ें हमारे हाथ से छूट छूट जाती हैं । हम रेत की तरह उन्हें मुट्ठी में बंद करना चाहते हैं और वो सरक सरक पड़ती हैं । ये हमारी निराशाओं का गीत है ।
अगला गीत वो है जिसके बारे में चर्चा करने को हैदराबाद की अन्नपूर्णा जी ने भी कहा था, सन् 1971 में आई फिल्म अमर प्रेम का गीत ‘डोली में बिठाई के कहार’ ।
इस गाने में उस महिला की पीड़ा है, जिसका जीवन उजड़ गया है । आनंद बख्शी ने इस गाने को इतनी तल्लीनता और तन्मयता से लिखा है कि क्या कहें । फिल्म में ये गीत भी बैकग्राउंड गीत की तरह आता है । ‘मर के निकलना था घर से, जीते जी निकलना पड़ा’ और ‘जितने हैं आंसू मेरी अंखियों में इतना नदिया में नहीं रे नीर’ इन पंक्तियों से जैसे दर्द छलक छलक पड़ रहा है । इस गीत के लिए ऐसी आवाज़ की ज़रूरत थी, जिसमें दर्द का महासागर हो । यूं लगे जैसे कोई किसी ऊंचे से पहाड़ पर खड़े होकर ऊपर वाले तक अपनी दर्द भरी पुकार पहुंचा रहा है । और ये स्वर केवल बर्मन दादा की ही हो सकता था । इस गाने को तब सुनिए जब आप नितान्त अकेले हों और सुनते हुए अपनी आंखें बंद कर लीजिये, फिर देखिये कि किस तरह आपके अंतस में उतरेगा जज्बात का समंदर । दरअसल दर्द भरे इन चुनिन्दा गीतों के लिए बर्मन दा संगीत के देवपुरूष हैं । अफ़सोस बस इतना है कि ये गाने ना तो टी0वी0 पर आपको ज्यादा दिखाई देते हैं और ना ही रेडियो पर ज्यादा सुनाई देते हैं । यहां तक कि श्रोता इन गानों की फ़रमाईश भी नहीं करते । या तो इन्हें लोगों ने भुला दिया या फिर संगीत के क़द्रदान वर्ग तक ही ये सीमित रह गये । आज के ज्यादातर शोरगुल भरे संगीत में ये खामोश नग्मे सुकून का स्वर्ग बन गये हैं ।
मुझे आज की बिदा का मरके भी रहता इंतज़ार ।। मेरे साजन हैं ।।
मत खेल जल जायेगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की, चिर संगिनी हूं साजन की
मेरा खींचती हैं आंचल, मन मीत तेरी हर पुकार ।। मेरे साजन हैं ।।
शैलेन्द्र ने ये गीत लिखा था सन 1963 में आई फिल्म बंदिनी के लिये ।
इस गाने में भी वही विकलता, वही बेक़रारी है । कुछ छूट रहा है, तक़दीर पर अपना वश नहीं है और नायिका की मनोदशा को दर्शाने के लिए ये गीत फिल्म में रखा गया है । एक बात की ओर आपका ध्यान खींचना चाहूंगा । सचिन दा के जिन नग्मों की चर्चा आज हमने की उन तमाम गीतों में एक नारी के हृदय की पीड़ा, उसकी वेदना को उजागर किया गया है । ये सारे गीत बैकग्राउंड में आते हैं । नारी की पीड़ा और उसके जीवन की उलझन को दर्शाने के लिए ये गीत लता जी से भी गवाए जा सकते थे । या किसी और गायिका की आवाज़ भी ली जा सकती थी । पर ये फिल्म निर्देशकों की सूझबूझ और कलात्मकता ही थी कि उन्होंने सचिन दा की आवाज़ का सहारा लिया । बंबईया फिल्म के व्याकरण के हिसाब से देखें तो एक भी पक्ष इस आवाज़ का समर्थन करता नज़र नहीं आता । फिर भी ये गाने फिल्मों में आये । इन्होंने लोगों का ध्यान खींचा और कामयाबी हासिल की । तभी तो हम आज इतने सालों बाद भी इनका जिक्र कर रहे हैं । वो भी इतनी शिद्दत के साथ । पिछली पोस्ट पर किन्हीं अमिताभ जी ने टिप्पणी की थी कि इन गानों का वीडियो भी अगर दिखाऊं तो अच्छा होगा । उनसे निवेदन है कि वो वीडियो की लिंक भेज दें या टिप्पणी में इसी पोस्ट पर दिखा दें । जो वीडियो मुझे मिले वो यहां दिखाए जा रहे हैं ।
फिल्म बंदिनी का गीत ‘ओ रे मांझी’
फिल्म गाईड का गीत ‘ वहां कौन है तेरा’ Read more...