Showing posts with label सिनेमा. Show all posts
Showing posts with label सिनेमा. Show all posts

Monday, July 9, 2007

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’-तीसरी कड़ी, छोटी फिल्‍में बड़ी कामयाबी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



दिल्‍ली के पी.वी.आर. को सात जुलाई को दस साल पूरे हो चुके हैं । ये इस मायने में महत्‍त्‍वपूर्ण है कि ये मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक रहा है, मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने अब छोटे शहरों में अपने पैर पसारने आरंभ किये हैं । इस परिदृश्‍य पर ‘इंडियन-एक्‍सप्रेस’ ने अपनी श्रृंखला ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक’ में कई लोगों के विचार देने शुरू किये हैं । ये इस सीरीज़ की तीसरी और अंतिम-कड़ी है ।


फिल्‍म-समीक्षक शुभ्रा गुप्‍ता के विचार


बहुत बरस पहले की बात है, मैंने एक फिल्‍म-वितरक से पूछा, तो क्‍या आपकी फिल्‍म फ्लॉप हो गयी है । मुझे उस फिल्‍म का नाम तो याद नहीं आ रहा है, लेकिन इस फिल्‍म का काफी ऊंचा बजट और ज़बर्दस्‍त स्‍टार-कास्‍ट थी, फिल्‍म को काफी धीमी ओपनिंग मिली और फिर दूसरे हफ्ते तक वो ग़ायब भी हो गई । इस सवाल पर उसने मुझे अपने दफ्तर में बैठाया, जो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस में था, ये वो जगह है जहां दिल्‍ली के फिल्‍म-व्‍यवसाय से जुड़े लोगों के दफ्तर हैं । इसके बाद उसने मुझे कुछ बुनियादी-बातें समझाईं । उसका कहना था कि सारा खेल अंकगणित का है । अगर फिल्‍म काफी कम बजट पर बनाई जाये और वो बहुत पैसा कमा लेती है और उस फिल्‍म से भी आगे निकल जाती है जो बड़े पैसे और बड़ी स्‍टारकास्‍ट को लेकर बनाई गयी थी । और जिसका बॉक्‍स-ऑफिस पर प्रदर्शन ठीक-ठाक था । पर वो लागत और आय के दायरे को ठीक से पाट नहीं पाई ।

उस वितरक ने बताया कि मिथुन चक्रवर्ती की छोटी फिल्‍में इसी तरह की बड़ी हिट साबित होती हैं । मिथुन को लेकर तेज़ी से बनने वाली फिल्‍मों का बजट एक करोड़ के आसपास होता है । वो दक्षिण भारत की संघर्षरत लड़कियों को नायिका बना देते हैं और ऊटी में शूटिंग करते हैं जहां उनका अपना होटल है । ज़ाहिर है कि होटल का पैसा बच जाता है । ये उन फिल्‍मों की बात है, जिन्‍हें ‘बी-ग्रेड’ का माना जाता है, और उत्‍तरप्रदेश तथा बिहार में मिथुन को पसंद करने वाले लोग इन फिल्‍मों को देखते और पसंद करते हैं । ये फिल्‍में निर्माण के खर्च से थोड़ी सी ज्‍यादा क़ीमत पर वितरित की जाती हैं और थियेटर हाउस-फुल हो जाते हैं, इससे सबको मुनाफा होता है ।

मेरे लिए ये एकदम नई जानकारी थी । मुझे उस वितरक की बात से ये समझ में आया कि हिट होने के लिए फिल्‍मों का बड़े बजट का होना जरूरी नहीं है । और छोटे बजट वाली फिल्‍मों को ‘छोटा’ समझना भी एक बड़ी भूल है । आज यही बात मुंबईया फिल्‍म जगत में सच होती नज़र आ रही है । तमाम बड़े बजट की फिल्‍में धड़ाधड़ फ्लॉप होती जा रही हैं । और छोटे बजट की फिल्‍में मुनाफ़ा बटोर रही हैं । मिसाल के लिए आदित्‍य चोपड़ा की मल्‍टी-करोड़ मल्‍टी-स्‍टारर फिल्‍म ‘झूम बराबर झूम’ को ही लीजिये, तीसरे ही दिन इसका दम निकल गया । जबकि सुनील जोशी द्वारा निर्मित और सागर बेल्‍लारी द्वारा निर्देशित ‘भेजा फ्राई’ बनी चौवन लाख में और इसने कमाये बारह करोड़, और अभी भी कमाती चली जा रही है ।

यानी नया फॉर्मूला है---छोटा बजट, बड़ा कन्‍सेप्‍ट और बड़ी हिट ।


एक ज़माना था जब बॉलीवुड की फिल्‍में पूरे देश में हिट होती थीं । फिर 1985 से लेकर नब्‍बे के दशक के उत्‍तरार्द्ध तक वी.सी.आर की क्रांति ने फिल्‍मों को ज़बर्दस्‍त झटका दिया, फिर वी.सी.डी. आ गया । ठीक इसी दौर में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से एक नई क्रांति आई । तीन सौ सीटों वाले थियेटर को भरना हज़ार सीटों वाले थियेटर को भरने की तुलना में ज्‍यादा आसान था । और इसका असर फिल्‍मों के सब्‍जेक्‍ट पर भी पड़ा, जैसे ही फिल्‍म बनाने वालों को समझ में आया कि दर्शक ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-अनुभव’ के लिये तैयार हैं, नए विषयों पर फिल्‍में बनना शुरू हो गया । इससे फिल्‍मकारों और दर्शकों दोनों को चुनाव का मौका मिला, दोनों को एक नई तरह की आज़ादी मिली ।


पी.वी.आर. साकेत जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से भारतीय शहरों में फिल्‍में देखने की परंपरा में बड़ा बदलाव आया है । मल्‍टीप्‍लेक्‍स तेज़ी से बढ़ते चले जा रहे हैं । और इससे ये सुनिश्चित हो गया है कि अब बॉलीवुड में नई तरह की फिल्‍में ना सिर्फ बनेंगी, बल्कि अपना खर्च भी वसूल कर सकेंगी । भले इन फिल्‍मों में सितारे ना हों, लेकिन ये ऐसे कलाकार होंगे जो अपने रोल को बखूबी निभाना जानते हैं । ये ऐसी कहानियां होंगी जिनमें ग्‍लिसरीन से बहाये आंसू नहीं होंगे, जो शहरी दर्शकों को अपील करेंगी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से फिल्‍मों से गांव एकदम ग़ायब ही हो गया है, फिल्‍म इक़बाल में भले गांव था, ऐसा गांव जिसका एक अपाहिज युवक भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाता है ।

अब मल्‍टीप्‍लेक्‍स का कारवां छोटे शहरों की तरफ बढ़ चला है, ये ऐसे शहर हैं जहां एकल स्‍क्रीन वाली टॉकीज़ें ही नहीं चल रही हैं । सवाल ये है क्‍या दूसरे दर्जे के शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के फैलने से सिनेमा के विषयों में बदलाव आ सकेंगे ।


फिल्‍मों की असिस्‍टेन्‍ट ए‍डीटर हरप्रीत सिंह के विचार—


अवनी जोशी अपने आप को महिला आदित्‍य चोपड़ा समझती है, अरे नहीं वो आदित्‍य चोपड़ा की तरह फिल्‍में नहीं बनातीं, पर वो FDFS सिन्‍ड्रोम से ग्रस्‍त हैं । जानते हैं ये है क्‍या---अरे फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो सिन्‍ड्रोम । अवनी बचपन से ही ऐसी ही है । और ‘दिल वाले दुल्‍हनिया ले जायेंगे’ बनाने वाले आदित्‍य चोपड़ा की तरह वो भी ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ में नियमित रूप से जाती हैं । मुंबई से बाहर के लोगों को बता दें कि ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ बांद्रा मुंबई के जी-7 मल्‍टीप्‍लेक्‍स का हिस्‍सा हैं, एक ज़माने से हर शुक्रवार यहां जनता की भीड़ जमा होती रही है । पर जब से अवनी को अंधेरी में खुले मल्‍टीप्‍लेक्‍स फेम, फन और सिनेमैक्‍स का पता चला है, उसने गेटी गैलैक्‍सी में जाना बंद कर दिया है । आज अवनी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने और इसका सुख लेने की ज़बर्दस्‍त समर्थक हैं ।


हर शुक्रवार अवनी अपना एक गर्म जैकेट लेती हैं और फिल्‍म देखने जाती हैं, उनका कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स का ए.सी. जानलेवा ठंडा होता है । सिनेमैक्‍स में वो ‘रेड लाउंज’ की ही टिकिटें लेती हैं, क्‍योंकि यहां की ‘रिक्‍लाईनर सीटें’ लेट के सिनेमा देखने का अहसास कराती हैं । अवनी को लगता है मानो वो अपने लिविंग रूम में फिल्‍म देख रही है । उसके हाथ में पॉपर्कान और कोला भी होता है । उसका कहना है कि दिल्‍ली जैसी चाट भी उसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में मिल जाती हैं । पैसों वाली अवनी का कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सीटें इतनी आरामदायक हैं कि फिल्‍म बुरी भी हो तो उसके पूरे होने तक बैठा जा सकता है । आजकल बॉलीवुड में जिस तरह की बुरी फिल्‍में बन रही हैं उसमें अवनी का इस तरह पैसा खर्च करना बचपना लग सकता है । पर कम से कम अवनी ईमानदारी से सिनेमा देखने निकलती तो है ।

अवनी की तरह ही है अंगद और उसका परिवार, जिसकी रविवार की हर शाम मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखते बीतती है । ये लोग दोपहर को यहां आते हैं, फिल्‍म देखते हैं और फिर ‘फूड-कोर्ट’ में दावत उड़ाते हैं । क्‍योंकि यहां उन्‍हें खानेपीने की तमाम मनपसंद चीजें मिल जाती हैं । इन दो मिसालों से साबित होता है कि हमारे महानगरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍में देखना एक रवायत बनता जा रहा है । ये महज़ फिल्‍म देखना नहीं है बल्कि छुट्टी का एक यादगार दिन है । मॉल में सबके लिए कुछ ना कुछ है, बच्‍चों के लिए गेमिंग ज़ोन, बुक शॉप, गिफ्ट शॉप, फूड कोर्ट, शॉपिंग आरकेड और साथ में सिनेमाघर भी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के टिकिट थोड़े-से ज्‍यादा हैं, लेकिन मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सुविधाएं और आराम इसकी भरपाई कर देता है । अगर फिल्‍म अच्‍छी हो तो क़ीमत वसूल लगती है, अगर बुरी हो तो सुखद सीट पर आप समय तो काट ही सकते हैं । हां सर्दी से बचने के लिए जै‍केट ले जाना मत भूलियेगा ।


इस तीसरी कड़ी के साथ ही ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ नामक ये श्रृंखला खत्‍म होती है ।
तीनों लेख इंडियन एक्‍सप्रेस के मुंबई संस्‍करण से साभार ।

Read more...

अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’-तीसरी कड़ी, छोटी फिल्‍में बड़ी कामयाबी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



दिल्‍ली के पी.वी.आर. को सात जुलाई को दस साल पूरे हो चुके हैं । ये इस मायने में महत्‍त्‍वपूर्ण है कि ये मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक रहा है, मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने अब छोटे शहरों में अपने पैर पसारने आरंभ किये हैं । इस परिदृश्‍य पर ‘इंडियन-एक्‍सप्रेस’ ने अपनी श्रृंखला ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-दशक’ में कई लोगों के विचार देने शुरू किये हैं । ये इस सीरीज़ की तीसरी और अंतिम-कड़ी है ।


फिल्‍म-समीक्षक शुभ्रा गुप्‍ता के विचार


बहुत बरस पहले की बात है, मैंने एक फिल्‍म-वितरक से पूछा, तो क्‍या आपकी फिल्‍म फ्लॉप हो गयी है । मुझे उस फिल्‍म का नाम तो याद नहीं आ रहा है, लेकिन इस फिल्‍म का काफी ऊंचा बजट और ज़बर्दस्‍त स्‍टार-कास्‍ट थी, फिल्‍म को काफी धीमी ओपनिंग मिली और फिर दूसरे हफ्ते तक वो ग़ायब भी हो गई । इस सवाल पर उसने मुझे अपने दफ्तर में बैठाया, जो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस में था, ये वो जगह है जहां दिल्‍ली के फिल्‍म-व्‍यवसाय से जुड़े लोगों के दफ्तर हैं । इसके बाद उसने मुझे कुछ बुनियादी-बातें समझाईं । उसका कहना था कि सारा खेल अंकगणित का है । अगर फिल्‍म काफी कम बजट पर बनाई जाये और वो बहुत पैसा कमा लेती है और उस फिल्‍म से भी आगे निकल जाती है जो बड़े पैसे और बड़ी स्‍टारकास्‍ट को लेकर बनाई गयी थी । और जिसका बॉक्‍स-ऑफिस पर प्रदर्शन ठीक-ठाक था । पर वो लागत और आय के दायरे को ठीक से पाट नहीं पाई ।

उस वितरक ने बताया कि मिथुन चक्रवर्ती की छोटी फिल्‍में इसी तरह की बड़ी हिट साबित होती हैं । मिथुन को लेकर तेज़ी से बनने वाली फिल्‍मों का बजट एक करोड़ के आसपास होता है । वो दक्षिण भारत की संघर्षरत लड़कियों को नायिका बना देते हैं और ऊटी में शूटिंग करते हैं जहां उनका अपना होटल है । ज़ाहिर है कि होटल का पैसा बच जाता है । ये उन फिल्‍मों की बात है, जिन्‍हें ‘बी-ग्रेड’ का माना जाता है, और उत्‍तरप्रदेश तथा बिहार में मिथुन को पसंद करने वाले लोग इन फिल्‍मों को देखते और पसंद करते हैं । ये फिल्‍में निर्माण के खर्च से थोड़ी सी ज्‍यादा क़ीमत पर वितरित की जाती हैं और थियेटर हाउस-फुल हो जाते हैं, इससे सबको मुनाफा होता है ।

मेरे लिए ये एकदम नई जानकारी थी । मुझे उस वितरक की बात से ये समझ में आया कि हिट होने के लिए फिल्‍मों का बड़े बजट का होना जरूरी नहीं है । और छोटे बजट वाली फिल्‍मों को ‘छोटा’ समझना भी एक बड़ी भूल है । आज यही बात मुंबईया फिल्‍म जगत में सच होती नज़र आ रही है । तमाम बड़े बजट की फिल्‍में धड़ाधड़ फ्लॉप होती जा रही हैं । और छोटे बजट की फिल्‍में मुनाफ़ा बटोर रही हैं । मिसाल के लिए आदित्‍य चोपड़ा की मल्‍टी-करोड़ मल्‍टी-स्‍टारर फिल्‍म ‘झूम बराबर झूम’ को ही लीजिये, तीसरे ही दिन इसका दम निकल गया । जबकि सुनील जोशी द्वारा निर्मित और सागर बेल्‍लारी द्वारा निर्देशित ‘भेजा फ्राई’ बनी चौवन लाख में और इसने कमाये बारह करोड़, और अभी भी कमाती चली जा रही है ।

यानी नया फॉर्मूला है---छोटा बजट, बड़ा कन्‍सेप्‍ट और बड़ी हिट ।


एक ज़माना था जब बॉलीवुड की फिल्‍में पूरे देश में हिट होती थीं । फिर 1985 से लेकर नब्‍बे के दशक के उत्‍तरार्द्ध तक वी.सी.आर की क्रांति ने फिल्‍मों को ज़बर्दस्‍त झटका दिया, फिर वी.सी.डी. आ गया । ठीक इसी दौर में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से एक नई क्रांति आई । तीन सौ सीटों वाले थियेटर को भरना हज़ार सीटों वाले थियेटर को भरने की तुलना में ज्‍यादा आसान था । और इसका असर फिल्‍मों के सब्‍जेक्‍ट पर भी पड़ा, जैसे ही फिल्‍म बनाने वालों को समझ में आया कि दर्शक ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स-अनुभव’ के लिये तैयार हैं, नए विषयों पर फिल्‍में बनना शुरू हो गया । इससे फिल्‍मकारों और दर्शकों दोनों को चुनाव का मौका मिला, दोनों को एक नई तरह की आज़ादी मिली ।


पी.वी.आर. साकेत जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से भारतीय शहरों में फिल्‍में देखने की परंपरा में बड़ा बदलाव आया है । मल्‍टीप्‍लेक्‍स तेज़ी से बढ़ते चले जा रहे हैं । और इससे ये सुनिश्चित हो गया है कि अब बॉलीवुड में नई तरह की फिल्‍में ना सिर्फ बनेंगी, बल्कि अपना खर्च भी वसूल कर सकेंगी । भले इन फिल्‍मों में सितारे ना हों, लेकिन ये ऐसे कलाकार होंगे जो अपने रोल को बखूबी निभाना जानते हैं । ये ऐसी कहानियां होंगी जिनमें ग्‍लिसरीन से बहाये आंसू नहीं होंगे, जो शहरी दर्शकों को अपील करेंगी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से फिल्‍मों से गांव एकदम ग़ायब ही हो गया है, फिल्‍म इक़बाल में भले गांव था, ऐसा गांव जिसका एक अपाहिज युवक भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाता है ।

अब मल्‍टीप्‍लेक्‍स का कारवां छोटे शहरों की तरफ बढ़ चला है, ये ऐसे शहर हैं जहां एकल स्‍क्रीन वाली टॉकीज़ें ही नहीं चल रही हैं । सवाल ये है क्‍या दूसरे दर्जे के शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स के फैलने से सिनेमा के विषयों में बदलाव आ सकेंगे ।


फिल्‍मों की असिस्‍टेन्‍ट ए‍डीटर हरप्रीत सिंह के विचार—


अवनी जोशी अपने आप को महिला आदित्‍य चोपड़ा समझती है, अरे नहीं वो आदित्‍य चोपड़ा की तरह फिल्‍में नहीं बनातीं, पर वो FDFS सिन्‍ड्रोम से ग्रस्‍त हैं । जानते हैं ये है क्‍या---अरे फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो सिन्‍ड्रोम । अवनी बचपन से ही ऐसी ही है । और ‘दिल वाले दुल्‍हनिया ले जायेंगे’ बनाने वाले आदित्‍य चोपड़ा की तरह वो भी ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ में नियमित रूप से जाती हैं । मुंबई से बाहर के लोगों को बता दें कि ‘गेटी-गैलेक्‍सी’ बांद्रा मुंबई के जी-7 मल्‍टीप्‍लेक्‍स का हिस्‍सा हैं, एक ज़माने से हर शुक्रवार यहां जनता की भीड़ जमा होती रही है । पर जब से अवनी को अंधेरी में खुले मल्‍टीप्‍लेक्‍स फेम, फन और सिनेमैक्‍स का पता चला है, उसने गेटी गैलैक्‍सी में जाना बंद कर दिया है । आज अवनी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने और इसका सुख लेने की ज़बर्दस्‍त समर्थक हैं ।


हर शुक्रवार अवनी अपना एक गर्म जैकेट लेती हैं और फिल्‍म देखने जाती हैं, उनका कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स का ए.सी. जानलेवा ठंडा होता है । सिनेमैक्‍स में वो ‘रेड लाउंज’ की ही टिकिटें लेती हैं, क्‍योंकि यहां की ‘रिक्‍लाईनर सीटें’ लेट के सिनेमा देखने का अहसास कराती हैं । अवनी को लगता है मानो वो अपने लिविंग रूम में फिल्‍म देख रही है । उसके हाथ में पॉपर्कान और कोला भी होता है । उसका कहना है कि दिल्‍ली जैसी चाट भी उसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में मिल जाती हैं । पैसों वाली अवनी का कहना है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सीटें इतनी आरामदायक हैं कि फिल्‍म बुरी भी हो तो उसके पूरे होने तक बैठा जा सकता है । आजकल बॉलीवुड में जिस तरह की बुरी फिल्‍में बन रही हैं उसमें अवनी का इस तरह पैसा खर्च करना बचपना लग सकता है । पर कम से कम अवनी ईमानदारी से सिनेमा देखने निकलती तो है ।

अवनी की तरह ही है अंगद और उसका परिवार, जिसकी रविवार की हर शाम मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखते बीतती है । ये लोग दोपहर को यहां आते हैं, फिल्‍म देखते हैं और फिर ‘फूड-कोर्ट’ में दावत उड़ाते हैं । क्‍योंकि यहां उन्‍हें खानेपीने की तमाम मनपसंद चीजें मिल जाती हैं । इन दो मिसालों से साबित होता है कि हमारे महानगरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍में देखना एक रवायत बनता जा रहा है । ये महज़ फिल्‍म देखना नहीं है बल्कि छुट्टी का एक यादगार दिन है । मॉल में सबके लिए कुछ ना कुछ है, बच्‍चों के लिए गेमिंग ज़ोन, बुक शॉप, गिफ्ट शॉप, फूड कोर्ट, शॉपिंग आरकेड और साथ में सिनेमाघर भी । हालांकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के टिकिट थोड़े-से ज्‍यादा हैं, लेकिन मल्‍टीप्‍लेक्‍स की सुविधाएं और आराम इसकी भरपाई कर देता है । अगर फिल्‍म अच्‍छी हो तो क़ीमत वसूल लगती है, अगर बुरी हो तो सुखद सीट पर आप समय तो काट ही सकते हैं । हां सर्दी से बचने के लिए जै‍केट ले जाना मत भूलियेगा ।


इस तीसरी कड़ी के साथ ही ‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ नामक ये श्रृंखला खत्‍म होती है ।
तीनों लेख इंडियन एक्‍सप्रेस के मुंबई संस्‍करण से साभार ।

Read more...

अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

Friday, July 6, 2007

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने पूरे किये दस साल, इस दौरान सिनेमा का हुआ क्‍या हाल ।






सात जुलाई को भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स दिल्‍ली के PVR को खुले हुए दस साल पूरे हो जायेंगे । इसे इंडियन एक्‍सप्रेस ने ‘दि मल्‍टीप्‍लेक्‍स डेकेड’ यानी मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दशक का नाम दिया है । और एक लेखमाला आरंभ की है । जिसमें ये विमर्श किया जा रहा है कि क्‍या मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने हमारी फिल्‍मों को बदला है, अगर हां तो कैसे । इस लेखमाला का पहला अंक कल छपा था । उसी के मुख्‍य अनूदित अंश । कोशिश यही रहेगी कि इस लेखमाला के सारे लेख यहां प्रस्‍तुत किये जाएं ।

श्‍याम बेनेगल के विचार---


मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से पहले ज्‍यादातर सिनेमाघरों में आठ सौ से तेरह सौ सीटें हुआ करती थीं । फिल्‍मों का कमाया पैसा सब तक पहुंचे इसके लिये ज़रूरी हुआ करता था कि टॉकीज़ कम से कम अस्‍सी प्रतिशत भरे । क्‍योंकि जब टॉकीज़ इतना भरती थी तो प्रोड्यूसर को मुनाफा होना शुरू होता था । इससे कम पर वो नुकसान में ही रहता था । अस्‍सी के दशक के ज़माने में निर्माताओं के सामने ये बड़ी समस्‍या थी कि वो आखिर थियेटरों को भरें कैसे । जब टेलीविजन आया तो फिल्‍मों को और गहरा धक्‍का पहुंचा । टे‍लीविजन ने शहरी मध्‍य वर्ग को सिनेमाघरों से दूर कर दिया । अब सिनेमाघरों तक या तो कामकाजी वर्ग आता था या वो लोग जो टी.वी.खरीदने की ताकत नहीं रखते थे । ऐसे समय में फिल्‍में ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को बटोरने के मकसद से बनाईं जाने
लगीं ।

सत्‍तर के दशक की शुरूआत में कुछ फिल्‍मकारों ने मुहिम चलाई और एक सीमित वर्ग के लिए फिल्‍में बनानी शुरू कीं । ये फिल्‍में कामकाजी मध्‍यवर्ग और छोटे शहरों और क़स्‍बों के पढ़े लिखे वर्ग के लिए बनाई जा रही थीं । इसे तथाकथित रूप से वैकल्‍पक सिनेमा का नाम दिया गया । अस्‍सी के दशक में ऐसी फिल्‍में बड़ी मुसीबत में पड़
गयीं ।

सत्‍तर के दशक में जब वैकल्पिक सिनेमा का दौर आरंभ हुआ तो सिनेमा के सामने कोई प्रतियोगिता नहीं थी । वो क्‍लास और मास दोनों के लिए था । लेकिन जैसे ही टी.वी. सारे देश पर छाया, मध्‍यवर्ग ने सिनेमाघरों से मुंह मोड़ा और टी.वी. से नाता जोड़ा, तो इसका पहला असर इस वैकल्पिक सिनेमा पर ही पड़ा । और धीरे धीरे वो खत्‍म ही हो गया ।

नब्‍बे के दशक के मध्‍य से लेकर आखिर तक हॉलीवुड में भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति ला चुके थे । वहां पचास के दशक में ही टी.वी. उरूज पर पहुंच चुका था और सिनेमा को नुकसान उठाना पड़ा था । ऐसे में कम सीटों वाले मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से हॉलीवुड में तहलका मच गया । ऐसे थियेटरों को भरना ज़रा आसान काम होता था । फिर मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से दर्शकों को विकल्‍प मिला । बड़े थियेटरों के साथ दिक्‍कत ये थी कि या तो आप फिल्‍म देखिये या छोड़ दीजिये । कोई विकल्‍प नहीं था । सिनेमा से प्‍यार करने वाले हम लोग इसे छोड़ तो सकते नहीं थे, इसलिये जो कुछ परोसा जा रहा था, उसे ही सहते रहे और सिनेमा देखते रहे ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से सिनेकारों को अहसास हुआ कि जनता सिर्फ भीड़ नहीं है । बल्कि उसमें भी कई वर्ग हैं । और हर वर्ग एक अलग तरह का सिनेमा चाहता है । अब मुमकिन था कि इस तरह के वर्ग के लिए फिल्‍में बनाई जाएं । इसलिये जो धारा सत्‍तर के दशक में शुरू होकर अस्‍सी के दशक में खत्‍म हो गयी थी, वो नब्‍बे के उत्‍तरार्द्ध में फिर से चल पड़ी ।
अब सवाल ये है कि सत्‍तर के दशक के वैकल्पिक सिनेमा और आज की मल्‍टीप्‍लेक्‍स धारा की फिल्‍मों में फर्क क्‍या है । वैसे तो हर पीढ़ी की अपनी चिंताएं,कल्‍पनाएं और सरोकार होते हैं । लेकिन मुझे एक फर्क साफ दिख रहा है । आज की फिल्‍में पहले से ज्‍यादा निजी हैं, लेकिन उनमें सामाजिक या राजनीतिक सरोकारों की कमी नज़र आती
हैं ।

इस दौरान भारत में मध्‍यवर्ग तेज़ी से फैला है । मगर मुझे दुख इस बात का है कि ग्रामीण परिवेश हमारे नक्‍शे से गायब होता चला जा रहा है । और ये बात सिनेमा में भी झलकती है । आज की फिल्‍मों की बजाय सत्‍तर के दशक की फिल्‍मों में ग्रामीण भारत की झलक ज्‍यादा नजर आती थी । इक्‍कीसवीं सदी में ग्रामीण भारत लोगों की चेतना से गायब ही हो गया है ।

मध्‍यवर्ग की सारी चिंताएं और सरोकार केवल खुद को लेकर ही हैं । उनके शहर, उनकी नौकरियां, उनका जीवन बस । अगर कामयाबी के पैमाने पर देखें तो हमारा सिनेमा काफी आगे बढ़ा है, लेकिन विश्‍व स्‍तर पर हमारे सिनेमा की कोई उपस्थिति नहीं है । हम एक ऐसी दुनिया के बारे में सोच रहे हैं जो पश्चिमी यूरोप और अमरीका में तो मौजूद है, पर हमारे अपने देश में नहीं । दुख की बात है कि फिल्‍मकार भी भारत को अपनी महत्‍वाकांक्षाओं के चश्‍मे से ही देखते हैं, इसीलिये वो मुंबई को नहीं देखते, मुंबई में शंघाई को तलाशते हैं ।

युवा निर्देशक सागर बेल्‍लारी के विचार ।
( इनकी ताज़ा फिल्‍म ‘भेजा फ्राइ’ काफी चर्चित रही है )


मैंने ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स के लिये नहीं बनाई थी । लेकिन हुआ ये कि इसे पी.वी.आर. और एडलैब्‍स जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की श्रृंखलाओं ने वितरित किया, पर भले ही मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने इसे वितरित किया और जनता तक पहुंचाया, लेकिन मेरा मानना है कि फिल्‍म की कथावस्‍तु और उसका प्रभाव यहां ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण है ।

ये सच है कि एक स्‍क्रीन वाले थियेटर बड़े स्‍टारों की फिल्‍में दिखाते हैं, वहां हमारी फिल्‍में प्रदर्शित करने का खर्च जबर्दस्‍त होता है, ऐसे में मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने मेरे जैसे निर्देशकों के लिए नए मौक़े पैदा किये हैं । अगर पी.वी.आर. जैसा संस्‍थान इसे प्रदर्शित नहीं करता तो शायद मेरी फिल्‍म को इतनी कामयाबी भी हासिल नहीं होती । इससे एक बात साफ हुई है, एक ऐसा कमर्शियल मॉडल सामने आया है, जो हम जैसे निर्देशकों के कलात्‍मक-आग्रह को आर्थिक सफलता से जोड़ता है । पर मैं ये कह देना चाहता हूं कि मैंने अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स दर्शकों को ध्‍यान में रखकर नहीं बनाई थी बल्कि ‘हिंदी वर्ग’ को ध्‍यान में रखकर बनाई थी ।

हमारे देश में पहले भी छोटी फिल्‍में बनती रहीं हैं, जिन्‍हें वैकल्पिक सिनेमा का नाम दिया जाता रहा है । बासु चैटर्जी, सई परांजपे, ऋशिकेश मुखर्जी जैसे कई निर्देशक इस धारा से जुड़े रहे हैं । ‘भेजा फ्राई’ बनाते हुए मेरे मन में एक ही बात थी, और वो ये कि आज भी एक समझदार कॉमेडी (इंटेलीजेन्‍ट कॉमेडी) की ज़रूरत महसूस की जाती है । जनता खुद ऐसी फिल्‍में चाहती है, और जनता की इस मांग को पहले सई परांजपे ने चश्‍मे बद्दूर जैसी फिल्‍म बनाकर पूरा किया भी है । मैंने भेजा फ्राई बनाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है, रिवाईव किया है । हालांकि ये सच है कि जैसी तैयार ऑडियेन्‍स मुझे अपनी फिल्‍म के लिए मिली वो ‘चश्‍मेबद्दूर’ को नसीब नहीं हुई । पर ऐसा इसलिये हुआ कि आज बहुत बड़े बदलाव आ चुके हैं । आज लोग ज्‍यादा ट्रैवल करते हैं । उनके पास घर में डी.वी.डी.प्‍लेयर आ चुके हैं, और उस पर वो विश्‍व भर के सिनेमा को देख सकते हैं । दर्शकों की रूचि और उनकी मांग में भी बदलाव आया है । इसलिये नई और तरोताज़ा फिल्‍में बनाने की गुंजाईश बढ़ी है । लेकिन ये बता दूं कि इसकी वजह मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति नहीं है । बस मल्‍टीप्‍लेक्‍स इसे भुनाने की कोशिश भर कर रहे हैं ।

सवाल ये है कि क्‍या आज भारत में वाकई सिनेमा की एक ‘नई धारा’ चल पड़ी है । मेरा जवाब होगा---नहीं । ऐसा तो तब कहा जा सकता है जब कम से कम चार पांच ऐसे निर्देशक हों, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्‍व स्‍तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हों । जबकि हमारा मुख्‍य धारा का पेशेवर सिनेमा दुनिया के सरोकारों को ध्‍यान में रखकर बनाया ही नहीं जाता । मारे पास अच्‍छे निर्देशकों, निर्माताओं और सबसे ज्‍यादा अच्‍छी स्क्रिप्‍टों की भारी कमी है ।

अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ के लिए मैंने नये और गैर परंपरावादी अभिनेता जमा किये, पर इसके बावजूद ये फिल्‍म लो‍कप्रिय हुई । मैँने कम मशहूर कलाकारों को इसलिये लिया क्‍यों‍कि मैं स्‍टार्स को अफोर्ड ही नहीं कर सकता था । सवाल ये है कि अगर हमारे पास बजट अच्‍छा होता तो मैं क्‍या करता । मेरा जवाब है, मैं बेहतर कॉस्‍ट्यूम चुनता, बेहतर सेट लगाता । लेकिन शायद तब भी मैं बड़े स्‍टारों को नहीं लेता क्‍योंकि वो अपने साथ अपने तरह के दबाव और सीमाएं लेकर आते हैं । और नये ज़माने का फिल्‍मकार होने के नाते मुझे फायदा ये मिला है कि मैं स्‍टार्स के बिना भी काम कर सकता हूं । क्‍योंकि अब फोकस स्‍टारों पर नहीं बल्कि ‘कन्‍टेन्‍ट’ या कथावस्‍तु पर आ टिका है । और ये एक बहुत प्‍यारी सी तरक्‍की है ।

पर मैं फिर से ज़ोर देकर कहना चाहता हूं कि हमारे सिनेमा में कोई नई धारा नहीं आई है, हां उसका इंतज़ार हम सबको है । वो तब तक नहीं आयेगी जब तक हम लगातार आला दर्जे की फिल्‍में नहीं बनायेंगे ।


‘इंडियन एक्‍सप्रेस से साभार’
प्रयास यही रहेगा कि कल अगली कड़ी प्रस्‍तुत करूं ।





Read more...

अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

‘मल्‍टीप्‍लेक्‍स दशक’ भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने पूरे किये दस साल, इस दौरान सिनेमा का हुआ क्‍या हाल ।






सात जुलाई को भारत के पहले मल्‍टीप्‍लेक्‍स दिल्‍ली के PVR को खुले हुए दस साल पूरे हो जायेंगे । इसे इंडियन एक्‍सप्रेस ने ‘दि मल्‍टीप्‍लेक्‍स डेकेड’ यानी मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दशक का नाम दिया है । और एक लेखमाला आरंभ की है । जिसमें ये विमर्श किया जा रहा है कि क्‍या मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने हमारी फिल्‍मों को बदला है, अगर हां तो कैसे । इस लेखमाला का पहला अंक कल छपा था । उसी के मुख्‍य अनूदित अंश । कोशिश यही रहेगी कि इस लेखमाला के सारे लेख यहां प्रस्‍तुत किये जाएं ।

श्‍याम बेनेगल के विचार---


मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से पहले ज्‍यादातर सिनेमाघरों में आठ सौ से तेरह सौ सीटें हुआ करती थीं । फिल्‍मों का कमाया पैसा सब तक पहुंचे इसके लिये ज़रूरी हुआ करता था कि टॉकीज़ कम से कम अस्‍सी प्रतिशत भरे । क्‍योंकि जब टॉकीज़ इतना भरती थी तो प्रोड्यूसर को मुनाफा होना शुरू होता था । इससे कम पर वो नुकसान में ही रहता था । अस्‍सी के दशक के ज़माने में निर्माताओं के सामने ये बड़ी समस्‍या थी कि वो आखिर थियेटरों को भरें कैसे । जब टेलीविजन आया तो फिल्‍मों को और गहरा धक्‍का पहुंचा । टे‍लीविजन ने शहरी मध्‍य वर्ग को सिनेमाघरों से दूर कर दिया । अब सिनेमाघरों तक या तो कामकाजी वर्ग आता था या वो लोग जो टी.वी.खरीदने की ताकत नहीं रखते थे । ऐसे समय में फिल्‍में ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को बटोरने के मकसद से बनाईं जाने
लगीं ।

सत्‍तर के दशक की शुरूआत में कुछ फिल्‍मकारों ने मुहिम चलाई और एक सीमित वर्ग के लिए फिल्‍में बनानी शुरू कीं । ये फिल्‍में कामकाजी मध्‍यवर्ग और छोटे शहरों और क़स्‍बों के पढ़े लिखे वर्ग के लिए बनाई जा रही थीं । इसे तथाकथित रूप से वैकल्‍पक सिनेमा का नाम दिया गया । अस्‍सी के दशक में ऐसी फिल्‍में बड़ी मुसीबत में पड़
गयीं ।

सत्‍तर के दशक में जब वैकल्पिक सिनेमा का दौर आरंभ हुआ तो सिनेमा के सामने कोई प्रतियोगिता नहीं थी । वो क्‍लास और मास दोनों के लिए था । लेकिन जैसे ही टी.वी. सारे देश पर छाया, मध्‍यवर्ग ने सिनेमाघरों से मुंह मोड़ा और टी.वी. से नाता जोड़ा, तो इसका पहला असर इस वैकल्पिक सिनेमा पर ही पड़ा । और धीरे धीरे वो खत्‍म ही हो गया ।

नब्‍बे के दशक के मध्‍य से लेकर आखिर तक हॉलीवुड में भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति ला चुके थे । वहां पचास के दशक में ही टी.वी. उरूज पर पहुंच चुका था और सिनेमा को नुकसान उठाना पड़ा था । ऐसे में कम सीटों वाले मल्‍टीप्‍लेक्‍सों के आने से हॉलीवुड में तहलका मच गया । ऐसे थियेटरों को भरना ज़रा आसान काम होता था । फिर मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से दर्शकों को विकल्‍प मिला । बड़े थियेटरों के साथ दिक्‍कत ये थी कि या तो आप फिल्‍म देखिये या छोड़ दीजिये । कोई विकल्‍प नहीं था । सिनेमा से प्‍यार करने वाले हम लोग इसे छोड़ तो सकते नहीं थे, इसलिये जो कुछ परोसा जा रहा था, उसे ही सहते रहे और सिनेमा देखते रहे ।

मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने से सिनेकारों को अहसास हुआ कि जनता सिर्फ भीड़ नहीं है । बल्कि उसमें भी कई वर्ग हैं । और हर वर्ग एक अलग तरह का सिनेमा चाहता है । अब मुमकिन था कि इस तरह के वर्ग के लिए फिल्‍में बनाई जाएं । इसलिये जो धारा सत्‍तर के दशक में शुरू होकर अस्‍सी के दशक में खत्‍म हो गयी थी, वो नब्‍बे के उत्‍तरार्द्ध में फिर से चल पड़ी ।
अब सवाल ये है कि सत्‍तर के दशक के वैकल्पिक सिनेमा और आज की मल्‍टीप्‍लेक्‍स धारा की फिल्‍मों में फर्क क्‍या है । वैसे तो हर पीढ़ी की अपनी चिंताएं,कल्‍पनाएं और सरोकार होते हैं । लेकिन मुझे एक फर्क साफ दिख रहा है । आज की फिल्‍में पहले से ज्‍यादा निजी हैं, लेकिन उनमें सामाजिक या राजनीतिक सरोकारों की कमी नज़र आती
हैं ।

इस दौरान भारत में मध्‍यवर्ग तेज़ी से फैला है । मगर मुझे दुख इस बात का है कि ग्रामीण परिवेश हमारे नक्‍शे से गायब होता चला जा रहा है । और ये बात सिनेमा में भी झलकती है । आज की फिल्‍मों की बजाय सत्‍तर के दशक की फिल्‍मों में ग्रामीण भारत की झलक ज्‍यादा नजर आती थी । इक्‍कीसवीं सदी में ग्रामीण भारत लोगों की चेतना से गायब ही हो गया है ।

मध्‍यवर्ग की सारी चिंताएं और सरोकार केवल खुद को लेकर ही हैं । उनके शहर, उनकी नौकरियां, उनका जीवन बस । अगर कामयाबी के पैमाने पर देखें तो हमारा सिनेमा काफी आगे बढ़ा है, लेकिन विश्‍व स्‍तर पर हमारे सिनेमा की कोई उपस्थिति नहीं है । हम एक ऐसी दुनिया के बारे में सोच रहे हैं जो पश्चिमी यूरोप और अमरीका में तो मौजूद है, पर हमारे अपने देश में नहीं । दुख की बात है कि फिल्‍मकार भी भारत को अपनी महत्‍वाकांक्षाओं के चश्‍मे से ही देखते हैं, इसीलिये वो मुंबई को नहीं देखते, मुंबई में शंघाई को तलाशते हैं ।

युवा निर्देशक सागर बेल्‍लारी के विचार ।
( इनकी ताज़ा फिल्‍म ‘भेजा फ्राइ’ काफी चर्चित रही है )


मैंने ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स के लिये नहीं बनाई थी । लेकिन हुआ ये कि इसे पी.वी.आर. और एडलैब्‍स जैसे मल्‍टीप्‍लेक्‍सों की श्रृंखलाओं ने वितरित किया, पर भले ही मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने इसे वितरित किया और जनता तक पहुंचाया, लेकिन मेरा मानना है कि फिल्‍म की कथावस्‍तु और उसका प्रभाव यहां ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण है ।

ये सच है कि एक स्‍क्रीन वाले थियेटर बड़े स्‍टारों की फिल्‍में दिखाते हैं, वहां हमारी फिल्‍में प्रदर्शित करने का खर्च जबर्दस्‍त होता है, ऐसे में मल्‍टीप्‍लेक्‍सों ने मेरे जैसे निर्देशकों के लिए नए मौक़े पैदा किये हैं । अगर पी.वी.आर. जैसा संस्‍थान इसे प्रदर्शित नहीं करता तो शायद मेरी फिल्‍म को इतनी कामयाबी भी हासिल नहीं होती । इससे एक बात साफ हुई है, एक ऐसा कमर्शियल मॉडल सामने आया है, जो हम जैसे निर्देशकों के कलात्‍मक-आग्रह को आर्थिक सफलता से जोड़ता है । पर मैं ये कह देना चाहता हूं कि मैंने अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ मल्‍टीप्‍लेक्‍स दर्शकों को ध्‍यान में रखकर नहीं बनाई थी बल्कि ‘हिंदी वर्ग’ को ध्‍यान में रखकर बनाई थी ।

हमारे देश में पहले भी छोटी फिल्‍में बनती रहीं हैं, जिन्‍हें वैकल्पिक सिनेमा का नाम दिया जाता रहा है । बासु चैटर्जी, सई परांजपे, ऋशिकेश मुखर्जी जैसे कई निर्देशक इस धारा से जुड़े रहे हैं । ‘भेजा फ्राई’ बनाते हुए मेरे मन में एक ही बात थी, और वो ये कि आज भी एक समझदार कॉमेडी (इंटेलीजेन्‍ट कॉमेडी) की ज़रूरत महसूस की जाती है । जनता खुद ऐसी फिल्‍में चाहती है, और जनता की इस मांग को पहले सई परांजपे ने चश्‍मे बद्दूर जैसी फिल्‍म बनाकर पूरा किया भी है । मैंने भेजा फ्राई बनाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है, रिवाईव किया है । हालांकि ये सच है कि जैसी तैयार ऑडियेन्‍स मुझे अपनी फिल्‍म के लिए मिली वो ‘चश्‍मेबद्दूर’ को नसीब नहीं हुई । पर ऐसा इसलिये हुआ कि आज बहुत बड़े बदलाव आ चुके हैं । आज लोग ज्‍यादा ट्रैवल करते हैं । उनके पास घर में डी.वी.डी.प्‍लेयर आ चुके हैं, और उस पर वो विश्‍व भर के सिनेमा को देख सकते हैं । दर्शकों की रूचि और उनकी मांग में भी बदलाव आया है । इसलिये नई और तरोताज़ा फिल्‍में बनाने की गुंजाईश बढ़ी है । लेकिन ये बता दूं कि इसकी वजह मल्‍टीप्‍लेक्‍स क्रांति नहीं है । बस मल्‍टीप्‍लेक्‍स इसे भुनाने की कोशिश भर कर रहे हैं ।

सवाल ये है कि क्‍या आज भारत में वाकई सिनेमा की एक ‘नई धारा’ चल पड़ी है । मेरा जवाब होगा---नहीं । ऐसा तो तब कहा जा सकता है जब कम से कम चार पांच ऐसे निर्देशक हों, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्‍व स्‍तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हों । जबकि हमारा मुख्‍य धारा का पेशेवर सिनेमा दुनिया के सरोकारों को ध्‍यान में रखकर बनाया ही नहीं जाता । मारे पास अच्‍छे निर्देशकों, निर्माताओं और सबसे ज्‍यादा अच्‍छी स्क्रिप्‍टों की भारी कमी है ।

अपनी फिल्‍म ‘भेजा फ्राई’ के लिए मैंने नये और गैर परंपरावादी अभिनेता जमा किये, पर इसके बावजूद ये फिल्‍म लो‍कप्रिय हुई । मैँने कम मशहूर कलाकारों को इसलिये लिया क्‍यों‍कि मैं स्‍टार्स को अफोर्ड ही नहीं कर सकता था । सवाल ये है कि अगर हमारे पास बजट अच्‍छा होता तो मैं क्‍या करता । मेरा जवाब है, मैं बेहतर कॉस्‍ट्यूम चुनता, बेहतर सेट लगाता । लेकिन शायद तब भी मैं बड़े स्‍टारों को नहीं लेता क्‍योंकि वो अपने साथ अपने तरह के दबाव और सीमाएं लेकर आते हैं । और नये ज़माने का फिल्‍मकार होने के नाते मुझे फायदा ये मिला है कि मैं स्‍टार्स के बिना भी काम कर सकता हूं । क्‍योंकि अब फोकस स्‍टारों पर नहीं बल्कि ‘कन्‍टेन्‍ट’ या कथावस्‍तु पर आ टिका है । और ये एक बहुत प्‍यारी सी तरक्‍की है ।

पर मैं फिर से ज़ोर देकर कहना चाहता हूं कि हमारे सिनेमा में कोई नई धारा नहीं आई है, हां उसका इंतज़ार हम सबको है । वो तब तक नहीं आयेगी जब तक हम लगातार आला दर्जे की फिल्‍में नहीं बनायेंगे ।


‘इंडियन एक्‍सप्रेस से साभार’
प्रयास यही रहेगा कि कल अगली कड़ी प्रस्‍तुत करूं ।





Read more...

अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

Blog Archive

ब्‍लॉगवाणी

www.blogvani.com

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP