आईये आज एक मांझी गीत सुनें
मुंबई में पिछले दस सालों से हूं, मराठी खूब समझ में आती है । थोड़ी थोड़ी बोल भी लेता हूं । मराठी संगीत खूब सुना है, पर केवल वही जो अच्छा लगा । जैसे कुछ लोकगीत, कुछ अभंग और ज्यादातर कोळी गीत । ये गीत सबसे पहले मैंने म.प्र. में अपने एक मराठी मित्र के घर पुराने ज़माने के रिकॉर्ड प्लेयर पर सुना था । फिर बरसों बाद विविध भारती में सुना । अब अकसर सुनता हूं ।
आपको बता दूं कि इसे सुनने के लिए मराठी का ज्ञान होना आवश्यक नहीं है । बल्कि कोई भी भाषा ना आती हो तो भी चलेगा । संगीत की यही ख़ासियत है कि वो अकसर भाषाओं के परे चले जाता है । हां ये अलग बात है कि अच्छे गीतों की कविता को समझे बिना हम गीत का रसास्वादन नहीं कर पाते । लेकिन ये तो मांझी गीत है और इसका मतलब समझना भी बहुत आसान है ।
मांझी गीतों के साथ बंगाल का नाम बिल्कुल चस्पां हो गया है । सचिन देव बर्मन ने हिंदी फिल्मों में कई मांझी गीत दिये और इन पर कभी अलग से इसी चिट्ठे पर बात होगी । बंगाल के कई बेहतरीन लोकगीत भी हैं । भटियाली परंपरा के । पर आज इस मराठी लोकगीत की तरंग में खो जाईये ज़रा ।
जब मैंने अपने इस लेख को छापा, तो इस मराठी गीत का अर्थ नहीं दिया था, अगले ही दिन अमेरिका से लावण्या जी ने इसका अर्थ इन पंक्तियों के साथ भेजा, जिसे यहां जोड़ा जा रहा है । उन्हें ये अर्थ किन्हीं सीताराम चंदावरकर ने बताया है । लावण्या जी के योगदान से अब इसे सुनने का मज़ा दोगुना हो जायेगा ।
इस गीत को कई कई बार सुना है -बेहद लुभावना है --प्रस्तुति के लिये शुक्रिया युनूस भाई साहब !
इसका भाव... ये रहा..~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लावण्या जीमराठी के इस प्रसिद्ध 'कोळीगीत' (मछुआरों का गीत) के लिए धन्यवाद! जो सदस्यमराठी से वाक़िफ़ नहीं हैं, उन के लिये इस गीत का सरल रूपान्तर करने की चेष्टा कीहै :
(पुरुष) चलाओ पतवार, रे मांझी, चलाओ पतवारमैं 'डोलकर'*,
डोलकर दरिया का राजा
पानी में है घर मेरा,
बंदर पर आता जाता ...मैं डोलकर
स्त्री) मांबाबू की मैं हूं छोरी लाडली
पीली चोली पहनी है अंजीरी साडी
बालों में डाला है फूला चंपा
खुशबू से हवा करती झकझोरी
नाक में नाज़ुक नथनी,
गले सोने के मणी
कोलीवाडे की मैं रानी
पुनमी रात में नाचती करती मज़ा
पुरुष) मैं डोलकर, डोलकर दरिया का राजा(
पुरुष) इस दरिया की प्रतिष्ठा है महान
कभी उठती हैं मौजें पहाड समान
कभी मिल जाता है नाव को आस्मान
स्त्री) बाट जोहता है जब प्यार
तब आती है दरिया में बाढ
पानी से भीगती है धरती
आएगा मिलने भ्रतार मेरा
पुरुष) मैं डोलकर, डोलकर दरिया का राजा
पुरुष) पूनम की रात पी रही चांदनी
देखो मच्छी भी चांदी की बनी
खुद ही मेरे जालों में आ गयी
ले जाऊंगा बाजार मछली ताज़ा
मैं डोलकर, डोलकर दरिया के राजा
*मछली पकडने के ज़हाज़ को मराठी में कहते हैं.
सस्नेह
सीताराम चंदावरकर
कल रेडियोवाणी पर आप सुन सकेंगे साहिर लुधियानवी के कुछ अशआर खुद उनकी आवाज़ में । बहुत दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स । मेरे मित्र शिरीष कोयल के सौजन्य से । Read more...
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