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Sunday, March 29, 2009

गंगा रेती पे बंगला छबा मोरे राजा--गिरिजा देवी की आवाज़

हम शास्‍त्रीय-संगीत के 'ज्ञाता' नहीं है, रेडियो में हम 'कानसेन' और 'तानसेन' के मुहावरे कहते रहे हैं । अगर इस 'तकनीकी' शब्दावली में कहें तो अपन 'कानसेन' की श्रेणी में आते हैं । स्‍कूल के ज़माने में गिटार सीखने का जो सपना था, वो अभी तक ‘to do’ लिस्‍ट में अंकित है और मुल्‍तवी होता रहा
है । हां कभी-कभी B.X.FURTADO & SONS जैसी दुकानों के सामने से निकलें तो बड़ी तमन्‍ना से गिब्‍सन के 'स्‍पेनिश गिटार' को निहार कर ख़ुश हो लेते हैं । एकाध बार भीतर जाकर 'इन्‍स्‍ट्रूमेन्‍ट्स' को हाथ में लेकर आज़मा लेते हैं और चले आते हैं । दरअसल अपने जेब में समय के 'पर्स' में केवल थोड़ी बहुत 'चिल्‍लर' ही है फिलहाल, ज़्यादा कुछ है नहीं ।

बहरहाल...ये कमी हम संगीत सुनकर पूरी करते हैं । रेडियोवाणी पर कभी-कभार शास्‍त्रीय रचनाएं 'चढ़ाई' जाती रही हैं । पर अब संभवत: ये सिलसिलाgirija-devi नियमित होगा । दरअसल पिछले दिनों ममता इलाहाबाद और शास्‍त्रीय संगीत की अपनी तालीम को याद करते हुए गुनगुना रही थीं--'गंगा रेती पे बंगला छबाय दियो रे'  । और तभी हमें याद आया कि ये रचना संभवत: गिरिजा देवी ने गाई है । इंटरनेटी-यायावरी में ये रचना मिल भी गई और आज हम आपको विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में वही दादरा सुनवा रहे हैं । गिरिजा देवी अस्‍सी बरस की हैं और उनका स्‍वर हमें स्‍थान, काल और आयामों की सीमाओं से परे किसी और ही 'तल' पर ले जाता है । विदुषी गिरिजा देवी की गाई कई ऐसी रचनाएं हैं जिन्‍होंने हमारे ख़ाली-ख़ाली दिनों को रोशन किया है । तो विदुषी गिरिजा देवी की गाई इस रचना को सुनने के साथ-साथ एक फिल्‍मी-गीत सुनिए, जो संभवत: इसी दादरे से प्रेरित है ।  

गंगा-रेती में बंगला छबा मोरी राजा आवै लहर जमुने की ।  
कोई अच्‍छा-सा खिड़की क
टा मोरे राजा, आवै लहर जुमने की ।।
खिड़की कटाया, मोरे मन भाया
कोई छोटी-सी बगिया लगा मोरे राजा आवै महक फूलों की ।।

इसी तरह का गीत फिल्‍म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में आया था । इसे भी सुनिए ।

फिल्‍म-मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)
गीत:शकील बदायूंनी / संगीत:नौशाद/ आवाज़:सुधा मल्‍होत्रा 
बोल अक्षरमाला से साभार

हो ओ गंगा की रेती पे
गंगा की रेती पे बंगला छवाय दे
सैंया तेरी ख़ैर होगी, बलमा तेरी ख़ैर हो
खिरकी की ओर कोई बगिया लगाय दे
फूलों की सैर होगी, बलमा तेरी ख़ैर हो
ओ ओ नैनों से नैन मिले
बातें हो प्यार की
पायल के साथ बजे बंसी बहार की
इक तुम हो इक मैं कोई न और हो
सैंया तेरी ख़ैर होगी बलमा तेरी ख़ैर हो
गंगा की रेती पे बंगला छवाय दे
सैंया तेरी ख़ैर होगी बलमा तेरी ख़ैर हो

ये गीत यूट्यूब पर देखिए

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गंगा रेती पे बंगला छबा मोरे राजा--गिरिजा देवी की आवाज़

हम शास्‍त्रीय-संगीत के 'ज्ञाता' नहीं है, रेडियो में हम 'कानसेन' और 'तानसेन' के मुहावरे कहते रहे हैं । अगर इस 'तकनीकी' शब्दावली में कहें तो अपन 'कानसेन' की श्रेणी में आते हैं । स्‍कूल के ज़माने में गिटार सीखने का जो सपना था, वो अभी तक ‘to do’ लिस्‍ट में अंकित है और मुल्‍तवी होता रहा
है । हां कभी-कभी B.X.FURTADO & SONS जैसी दुकानों के सामने से निकलें तो बड़ी तमन्‍ना से गिब्‍सन के 'स्‍पेनिश गिटार' को निहार कर ख़ुश हो लेते हैं । एकाध बार भीतर जाकर 'इन्‍स्‍ट्रूमेन्‍ट्स' को हाथ में लेकर आज़मा लेते हैं और चले आते हैं । दरअसल अपने जेब में समय के 'पर्स' में केवल थोड़ी बहुत 'चिल्‍लर' ही है फिलहाल, ज़्यादा कुछ है नहीं ।

बहरहाल...ये कमी हम संगीत सुनकर पूरी करते हैं । रेडियोवाणी पर कभी-कभार शास्‍त्रीय रचनाएं 'चढ़ाई' जाती रही हैं । पर अब संभवत: ये सिलसिलाgirija-devi नियमित होगा । दरअसल पिछले दिनों ममता इलाहाबाद और शास्‍त्रीय संगीत की अपनी तालीम को याद करते हुए गुनगुना रही थीं--'गंगा रेती पे बंगला छबाय दियो रे'  । और तभी हमें याद आया कि ये रचना संभवत: गिरिजा देवी ने गाई है । इंटरनेटी-यायावरी में ये रचना मिल भी गई और आज हम आपको विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में वही दादरा सुनवा रहे हैं । गिरिजा देवी अस्‍सी बरस की हैं और उनका स्‍वर हमें स्‍थान, काल और आयामों की सीमाओं से परे किसी और ही 'तल' पर ले जाता है । विदुषी गिरिजा देवी की गाई कई ऐसी रचनाएं हैं जिन्‍होंने हमारे ख़ाली-ख़ाली दिनों को रोशन किया है । तो विदुषी गिरिजा देवी की गाई इस रचना को सुनने के साथ-साथ एक फिल्‍मी-गीत सुनिए, जो संभवत: इसी दादरे से प्रेरित है ।  

गंगा-रेती में बंगला छबा मोरी राजा आवै लहर जमुने की ।  
कोई अच्‍छा-सा खिड़की क
टा मोरे राजा, आवै लहर जुमने की ।।
खिड़की कटाया, मोरे मन भाया
कोई छोटी-सी बगिया लगा मोरे राजा आवै महक फूलों की ।।

इसी तरह का गीत फिल्‍म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में आया था । इसे भी सुनिए ।

फिल्‍म-मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)
गीत:शकील बदायूंनी / संगीत:नौशाद/ आवाज़:सुधा मल्‍होत्रा 
बोल अक्षरमाला से साभार

हो ओ गंगा की रेती पे
गंगा की रेती पे बंगला छवाय दे
सैंया तेरी ख़ैर होगी, बलमा तेरी ख़ैर हो
खिरकी की ओर कोई बगिया लगाय दे
फूलों की सैर होगी, बलमा तेरी ख़ैर हो
ओ ओ नैनों से नैन मिले
बातें हो प्यार की
पायल के साथ बजे बंसी बहार की
इक तुम हो इक मैं कोई न और हो
सैंया तेरी ख़ैर होगी बलमा तेरी ख़ैर हो
गंगा की रेती पे बंगला छवाय दे
सैंया तेरी ख़ैर होगी बलमा तेरी ख़ैर हो

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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