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Friday, October 26, 2007

अज़ीम शायर साहिर लुधियानवी की याद को सलाम--ख़ुदाऐ बरतर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ा‍तिर ये जंग क्‍यों है ।

आज साहिर लुधियानवी की याद का दिन है ।
साहिर जिसकी शायरी में दुनिया की जुल्‍मतों के खिलाफ परचम लहराने का जुनून था ।
साहिर जो मुहब्‍बतों का शायर होने के साथ-साथ अपने सरोकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था ।

साहिर की शायरी हमारी जिंदगी की ज़रूरत है । बहुत आत्‍मलीन होते इस समाज की नींद तोड़ने का ज़रिया हैं अशआर ।
एक बीहड़ जिंदगी जीने और अपने दुखों पी लेने वाले साहिर के भीतर भयानक अकेलापन था - मुहब्‍बतों का शायर जिंदगी भर तन्‍हा रहा, रेडियोवाणी पर किसी दिन हम साहिर के उन अशआर का जिक्र करेंगे जिनमें टूटकर की जाने वाली मोहब्‍बत की झलक है । लेकिन आज साहिर की वो शायरी पेश है जिसमें आग है । जिसमें आंच है । जिसमें जुनून है ।

ये रही साहिर की नज्‍़म- फ़नकार
फ़नकार


मैंने जो गीत तेरे प्‍यार की ख़ातिर लिखे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं ।।
आज दुकान पे नीलाम उठेगा उनका
तू ने जिन गीतों पे रखी थी मुहब्‍बत की असास । *असास-नींव
आज चांदी के तराज़ू में तुलेगी हर चीज़
मेरे अफ़कार, मेरी शायरी मेरा अहसास । *अफ़कार-लेखनी
जो तेरे ज़ात से मंसूब थे उन गीतों को । *ज़ात-शख्सियत । मंसूब-जुड़े थे
मुफलिसी जिंस बनाने पे उतर आई है । * जिंस-बिकाऊ वस्‍तु ।
भूख तेरे रूख़े-रंगीन के फ़सानों के एवज़ । रूख़े-रंगीन--खूबसूरत गाल
चंद अशीयाय-ऐ-तमन्‍नाई है ।
देख इस अर्सागाह-ऐ-मेहनत-ओ-सरमाया में । * मेहनत और रईसी के जंग के मैदान में
मेरे नग़्मे भी मेरे पास नहीं रह सकते
तेरे जलवे किसी ज़रदार की मीरास सही । *ज़रदार-पैसे वाले । मीरास-ज़ायदाद ।
तेरे ख़ाके भी मेरे पास नहीं रह सकते । *ख़ाके-चित्र
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं ।


फिल्‍मी गीतों में साहिर लुधियानवी का योगदान ज़बर्दस्‍त रहा है । उन्‍होंने फिल्‍मी गीतों की रवायत को बदल कर रख दिया । ज़रा इस गाने पर ग़ौर कीजिए जो फिल्‍म ताजमहल के लिए लिखा गया था । इसे रोशन ने स्‍वरबद्ध किया है । ये फिल्‍मी गीत कम और इल्‍मी गीत ज्‍यादा लगता है । ये ख़ालिस शायरी है । मुझे लगता है कि आज की बारूदी दुनिया में उनका ये गीत पूरी तरह मौज़ूं है





खुदाऐ बरतर तेरी ज़मीं पर
ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्‍यों है
हर इक फतह-ओ- ज़फ़र के दामन पे
खूं-ऐ-इंसां के रंग क्‍यों है
ज़मीं भी तेरी, हैं हम भी तेरे,
ये मिल्कियत का सवाल क्‍या है
ये क़त्‍लो-खूं का रिवाज क्‍यों है
ये रस्‍मो-जंगो-जदाल क्‍या है
जिन्‍हें तलब है जहां भर की
उन्‍हीं का दिल इतना तंग क्‍यों है
ख़ुदाऐ बरतर ।।
ग़रीब मांओं, शरीफ़ बहनों को
अम्‍नो-इज्‍़ज्‍़ात की जिंदगी दे
जिन्‍हें अता की है तूने ताक़त
उन्‍हें हिदायत की रोशनी दे
सरों में खिब्रो-ग़रूर क्‍यों है
दिलों के शीशे पे जंग क्‍यों है
ख़ुदाऐ बरतर ।।
क़ज़ा के रास्‍ते पे जाने वालों को
बच के आने की राह देना
दिलों के गुलशन उजड़ ना जायें
मुहब्‍बतों को पनाह देना
जहां में जश्‍ने-वफ़ा के बदले
ये जश्‍ने-तीरो-तुफंग क्‍यों है ।
खुदाऐ बरतर ।।

कठिन शब्‍दों के अर्थ


ख़ुदा-ऐ-बरतर-सर्वशक्तिमान ईश्‍वर
फ़तह-ओ-ज़फ़र- विजय और जीत
मिल्कियत-जागीर
क़त्‍ल-ओ-खूं- हत्‍याएं और मारकाट
जंगो-जदाल- लड़ाईयां और युद्ध
तलब-प्‍यास
अम्‍नो-इज्‍जत-शांति और सम्‍मान
अता-वरदान
खिब्रो-गुरूर--घमंड
क़ज़ा-नसीब
जश्‍न-ऐ-तीरो-तुफंग-तीरों और बंदूकों का जश्‍न

Glossary:
Khudaa-e-bartar = O superior God, bartar means superior, high, excellent, used as an adjective here for God
fatah-o-zafar = victories and triumph
milkiyat = property, land, possession
qatl-o-KhuuN = murders and blood (basically both indicating and emphasising “Murders, riots”)
jaNg-o-jadaal = fights and battles
talab = thirst, need
amn-o-izzat = peace and respect
ataa = blessed (given by the grace of God, a blessing)
kibr-o-Gharoor = pride (kibr = pride, eminence, similar meanings for Gharoor as well)
qazaa = destiny, fate, divine decree
jashn-e-teer-o-tufaNg = celebrations with bows and guns

साहिर लुधियानवी की कुछ तस्‍वीरें




साहिर लुधियानवी का जिक्र रेडियोवाणी पर पहले भी हुआ है ये रही फेहरिस्‍त--
1. लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं
2.मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे
3. खुद साहिर की दुर्लभ आवाज़ में उनकी तीन नज़्में

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: sahir-ludhianvi, sahir-ludhiyanvi, 26-october, fankar, taj-mahal, tajmahal, khudae-bartar-teri-zameen-par, साहिर-लुधियानवी, फनकार, ताजमहल, खुदाए-बरतर, छब्‍बीस-अक्‍तूबर,


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अज़ीम शायर साहिर लुधियानवी की याद को सलाम--ख़ुदाऐ बरतर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ा‍तिर ये जंग क्‍यों है ।

आज साहिर लुधियानवी की याद का दिन है ।
साहिर जिसकी शायरी में दुनिया की जुल्‍मतों के खिलाफ परचम लहराने का जुनून था ।
साहिर जो मुहब्‍बतों का शायर होने के साथ-साथ अपने सरोकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था ।

साहिर की शायरी हमारी जिंदगी की ज़रूरत है । बहुत आत्‍मलीन होते इस समाज की नींद तोड़ने का ज़रिया हैं अशआर ।
एक बीहड़ जिंदगी जीने और अपने दुखों पी लेने वाले साहिर के भीतर भयानक अकेलापन था - मुहब्‍बतों का शायर जिंदगी भर तन्‍हा रहा, रेडियोवाणी पर किसी दिन हम साहिर के उन अशआर का जिक्र करेंगे जिनमें टूटकर की जाने वाली मोहब्‍बत की झलक है । लेकिन आज साहिर की वो शायरी पेश है जिसमें आग है । जिसमें आंच है । जिसमें जुनून है ।

ये रही साहिर की नज्‍़म- फ़नकार
फ़नकार


मैंने जो गीत तेरे प्‍यार की ख़ातिर लिखे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं ।।
आज दुकान पे नीलाम उठेगा उनका
तू ने जिन गीतों पे रखी थी मुहब्‍बत की असास । *असास-नींव
आज चांदी के तराज़ू में तुलेगी हर चीज़
मेरे अफ़कार, मेरी शायरी मेरा अहसास । *अफ़कार-लेखनी
जो तेरे ज़ात से मंसूब थे उन गीतों को । *ज़ात-शख्सियत । मंसूब-जुड़े थे
मुफलिसी जिंस बनाने पे उतर आई है । * जिंस-बिकाऊ वस्‍तु ।
भूख तेरे रूख़े-रंगीन के फ़सानों के एवज़ । रूख़े-रंगीन--खूबसूरत गाल
चंद अशीयाय-ऐ-तमन्‍नाई है ।
देख इस अर्सागाह-ऐ-मेहनत-ओ-सरमाया में । * मेहनत और रईसी के जंग के मैदान में
मेरे नग़्मे भी मेरे पास नहीं रह सकते
तेरे जलवे किसी ज़रदार की मीरास सही । *ज़रदार-पैसे वाले । मीरास-ज़ायदाद ।
तेरे ख़ाके भी मेरे पास नहीं रह सकते । *ख़ाके-चित्र
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं ।


फिल्‍मी गीतों में साहिर लुधियानवी का योगदान ज़बर्दस्‍त रहा है । उन्‍होंने फिल्‍मी गीतों की रवायत को बदल कर रख दिया । ज़रा इस गाने पर ग़ौर कीजिए जो फिल्‍म ताजमहल के लिए लिखा गया था । इसे रोशन ने स्‍वरबद्ध किया है । ये फिल्‍मी गीत कम और इल्‍मी गीत ज्‍यादा लगता है । ये ख़ालिस शायरी है । मुझे लगता है कि आज की बारूदी दुनिया में उनका ये गीत पूरी तरह मौज़ूं है





खुदाऐ बरतर तेरी ज़मीं पर
ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्‍यों है
हर इक फतह-ओ- ज़फ़र के दामन पे
खूं-ऐ-इंसां के रंग क्‍यों है
ज़मीं भी तेरी, हैं हम भी तेरे,
ये मिल्कियत का सवाल क्‍या है
ये क़त्‍लो-खूं का रिवाज क्‍यों है
ये रस्‍मो-जंगो-जदाल क्‍या है
जिन्‍हें तलब है जहां भर की
उन्‍हीं का दिल इतना तंग क्‍यों है
ख़ुदाऐ बरतर ।।
ग़रीब मांओं, शरीफ़ बहनों को
अम्‍नो-इज्‍़ज्‍़ात की जिंदगी दे
जिन्‍हें अता की है तूने ताक़त
उन्‍हें हिदायत की रोशनी दे
सरों में खिब्रो-ग़रूर क्‍यों है
दिलों के शीशे पे जंग क्‍यों है
ख़ुदाऐ बरतर ।।
क़ज़ा के रास्‍ते पे जाने वालों को
बच के आने की राह देना
दिलों के गुलशन उजड़ ना जायें
मुहब्‍बतों को पनाह देना
जहां में जश्‍ने-वफ़ा के बदले
ये जश्‍ने-तीरो-तुफंग क्‍यों है ।
खुदाऐ बरतर ।।

कठिन शब्‍दों के अर्थ


ख़ुदा-ऐ-बरतर-सर्वशक्तिमान ईश्‍वर
फ़तह-ओ-ज़फ़र- विजय और जीत
मिल्कियत-जागीर
क़त्‍ल-ओ-खूं- हत्‍याएं और मारकाट
जंगो-जदाल- लड़ाईयां और युद्ध
तलब-प्‍यास
अम्‍नो-इज्‍जत-शांति और सम्‍मान
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खिब्रो-गुरूर--घमंड
क़ज़ा-नसीब
जश्‍न-ऐ-तीरो-तुफंग-तीरों और बंदूकों का जश्‍न

Glossary:
Khudaa-e-bartar = O superior God, bartar means superior, high, excellent, used as an adjective here for God
fatah-o-zafar = victories and triumph
milkiyat = property, land, possession
qatl-o-KhuuN = murders and blood (basically both indicating and emphasising “Murders, riots”)
jaNg-o-jadaal = fights and battles
talab = thirst, need
amn-o-izzat = peace and respect
ataa = blessed (given by the grace of God, a blessing)
kibr-o-Gharoor = pride (kibr = pride, eminence, similar meanings for Gharoor as well)
qazaa = destiny, fate, divine decree
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साहिर लुधियानवी की कुछ तस्‍वीरें




साहिर लुधियानवी का जिक्र रेडियोवाणी पर पहले भी हुआ है ये रही फेहरिस्‍त--
1. लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं
2.मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे
3. खुद साहिर की दुर्लभ आवाज़ में उनकी तीन नज़्में

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Tuesday, October 9, 2007

लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं--साहिर का एक तल्‍ख़ नग्‍़मा



मुंबई में भी कंजंक्टिवाइटिस का प्रकोप फैला हुआ है और मैं भी इस प्रकोप से बच नहीं सका । कल आंख की गड़ती किरकिरी के बीच बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल से बातचीत हुई और उन्‍होंने याद दिलाया कि साहिर लुधियानवी की पुण्‍यतिथ‍ि आ रही है । फिर बातों ही बातों में उन्‍होंने बी आर चोपड़ा की फिल्‍म 'इंसाफ का तराज़ू' के एक गीत का जिक्र किया जिसके बोल हैं--लोग और को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं । बरसों बाद इस गाने की याद आई । शुक्रिया शिरीष भाई ।

मैंने शिरीष भाई से कहा कि इस गाने को तो जैसे जनता ने भुला ही दिया है । आमतौर पर भारत में थीमेटिक गीतों के साथ यही होता है । ये गीत नारी की चेतना को जगाने और दुनिया की ज़ुल्‍मतों का कच्‍चा चिट्ठा खोलने वाला तल्‍ख़ गीत है । रोमांस की चाशनी का स्‍वाद लेकर इठलाते हुए समाज को भला ये तल्‍ख़ी कैसे पसंद आयेगी । इसलिए शायद इस गाने को रेडियो स्‍टेशन तक नहीं बजाते । जबकि जिस समस्‍या पर ये फिल्‍म केंद्रित थी वो समस्‍या आज भी जस की तस बनी हुई है । और आज इस गीत की प्रासंगिकता और ज्‍यादा बढ़ गयी लगती है । इस गीत की एक एक पंक्ति कितनी मौज़ूं है, आप पढ़ेंगे तो अहसास होगा ।



साहिर लुधियानवी महज़ एक गीतकार नहीं थे । वो पहले शायर थे और बाद में गीतकार । इसीलिए उनके यहां शायरी की शख्सियत गीतों पर सदा हावी रही है और यहीं उनका मजरूह सुल्‍तानपुरी से विरोध रहा है । साहिर के बेहद इंटलेक्‍चुअल गीतों के बारे में मजरूह ने एक बार आमने-सामने कहा था--अमां हीरो है बग़ीचे का माली और तुम उससे ग़ज़ल कहलवा रहे हो, अरे भैया बग़ीचे के माली की पृष्‍ठभूमि तो देखो, उसकी भाषा को तो समझो, फिर कहो । बहरहाल । साहिर और मजरूह का ये रचनात्‍मक विरोध फिल्‍म-संसार में गीतों की रचना को लेकर हमेशा बने रहे संशय की मिसाल है । जावेद अख्‍तर जब 'एक लड़की को देखा' या अपने हिट गीतों में से कोई भी रचते हैं तो शाबाशी पाते हैं । और जब फिल्‍म के छर्रे टाईप हीरो के लिए 'दर्दे डिस्‍को' लिखते हैं तो लानतें-मलामतें पाते हैं । यही हाल गुलज़ार का रहा है । जब उन्‍होंने 'मेरा कुछ सामान' या 'तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी' लिखा तो उन्‍हें शाबाशी दी गयी । और कई लोगों ने 'बीड़ी' या फिर फिल्‍म 'जानेमन' के गीतों पर कड़ा एतराज़ जताया । यहां तक कि 'कजरा रे' पर भी । ख़ैर ये अलग से विचार विमर्श का मुद्दा है । और याद रहा तो जल्‍दी ही गीतकारों के रचनात्‍मक-शिखर और पेशेवर-गर्त में पहुंचने की कई मिसालें लेकर मैं अलग से हाजि़र होऊंगा ।

फिलहाल ये संजीदा गीत सुनिए । और बताईये कि कैसा लगा । इस गाने की एक एक पंक्ति तेज़ाबी है ।

लोग औरत को फकत जिस्‍म समझ लेते हैं ।
रूह भी होती है उसमें, ये कहां सोचते हैं
रूह क्‍या होती है इससे उन्‍हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तकाज़ों का कहा मानते हैं
रूह मर जाए तो हर जिस्‍म एक चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को समझते हैं ना पहचानते हैं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है कायम ये गुनाहों का रवां
लोग औरत की हरेक चीख़ को नग़्मा समझें
वो क़बीलों का ज़माना हो के शहरों का समां
लोग औरत को फक़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।



जब्र से नस्‍ल बढ़े ज़ुल्‍म से तन मेल करे
ये अमल हममें है बेइल्‍म परिंन्‍दो में नहीं
हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हमसा वहशी कोई जंगल की दरिंदों में नहीं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

एक मैं ही नहीं क्‍या जाने ये कितनी होंगी
जिनको अब आईना तकने से झिझक आती है
जिनके ख्‍वाबों में ना सेहरे हैं ना सिंदूर ना सेज
राख ही राख है जो ज़ेहन पे मंडलाती है
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

इक बुझी रूह, लुटे जिस्‍म के ढांचे में लिए
सोचती हूं कि कहां जाके मुकद्दर फोड़ूं
मैं ना जिंदा हूं कि मरने का सहारा ढूंढूं
और ना मुरदा हूं कि जीने के ग़मों से छूटूं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

कौन बतलाएगा मुझको किससे जाकर पूछूं
जिंदगी ज़हर के सांचों में ढलेगी कब तक
कब तलब आंख ना खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्‍म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।


इस गाने को आप यहां सुन सकते हैं ।


इस गाने को यहां देखा भी जा सकता है ।

Insaf Ka Tarazu - log aurat ko Video Clip


यहां दी गयी तस्‍वीर में कौन लोग हैं पहचाना क्‍या आपने ।
अगर नहीं तो पह‍चानिए--सबसे बांये शॉल ओढ़े हमारे किशोर दा हैं । फिर सदाबहार दे...व आनंद । फिर साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा ( जो सगे भाई जैसे दिख रहे हैं ) और सबसे दाहिनी तरफ हैं पंचम । मैंने याददाश्‍त पर बहुत ज़ोर डाला पर आज की सुबह तो याद नहीं आ रहा है कि कौन सी फिल्‍म रही होगी, जिसे यश चोपड़ा या देव आनंद ने बनाया और साहिर ने गाने लिखे और‍ किशोर दा ने गाया । हो सकता है कि ये देव साहब की उन फिल्‍मों में से एक हो जिसमें आर डी बर्मन का म्‍यूजिक हो । और यहां यश चोपड़ा और साहिर बस घूमते घूमते ही पहुंच गये हों ।


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित:
साहिर-लुधियानवी, लोग-औरत-को-फ़क़त-जिस्‍म-समझ-लेते-हैं, फिल्‍म-इंसाफ-का-तराज़ू, बी.-आर.-चोपड़ा, sahir-ludhiyanvi, log-aurat-ko-faqat-jism-samajh-lete-hain, film-insaf-ka-tarazu, insaf-ka-taraju, B.-R.-Chopra.,



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लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं--साहिर का एक तल्‍ख़ नग्‍़मा



मुंबई में भी कंजंक्टिवाइटिस का प्रकोप फैला हुआ है और मैं भी इस प्रकोप से बच नहीं सका । कल आंख की गड़ती किरकिरी के बीच बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल से बातचीत हुई और उन्‍होंने याद दिलाया कि साहिर लुधियानवी की पुण्‍यतिथ‍ि आ रही है । फिर बातों ही बातों में उन्‍होंने बी आर चोपड़ा की फिल्‍म 'इंसाफ का तराज़ू' के एक गीत का जिक्र किया जिसके बोल हैं--लोग और को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं । बरसों बाद इस गाने की याद आई । शुक्रिया शिरीष भाई ।

मैंने शिरीष भाई से कहा कि इस गाने को तो जैसे जनता ने भुला ही दिया है । आमतौर पर भारत में थीमेटिक गीतों के साथ यही होता है । ये गीत नारी की चेतना को जगाने और दुनिया की ज़ुल्‍मतों का कच्‍चा चिट्ठा खोलने वाला तल्‍ख़ गीत है । रोमांस की चाशनी का स्‍वाद लेकर इठलाते हुए समाज को भला ये तल्‍ख़ी कैसे पसंद आयेगी । इसलिए शायद इस गाने को रेडियो स्‍टेशन तक नहीं बजाते । जबकि जिस समस्‍या पर ये फिल्‍म केंद्रित थी वो समस्‍या आज भी जस की तस बनी हुई है । और आज इस गीत की प्रासंगिकता और ज्‍यादा बढ़ गयी लगती है । इस गीत की एक एक पंक्ति कितनी मौज़ूं है, आप पढ़ेंगे तो अहसास होगा ।



साहिर लुधियानवी महज़ एक गीतकार नहीं थे । वो पहले शायर थे और बाद में गीतकार । इसीलिए उनके यहां शायरी की शख्सियत गीतों पर सदा हावी रही है और यहीं उनका मजरूह सुल्‍तानपुरी से विरोध रहा है । साहिर के बेहद इंटलेक्‍चुअल गीतों के बारे में मजरूह ने एक बार आमने-सामने कहा था--अमां हीरो है बग़ीचे का माली और तुम उससे ग़ज़ल कहलवा रहे हो, अरे भैया बग़ीचे के माली की पृष्‍ठभूमि तो देखो, उसकी भाषा को तो समझो, फिर कहो । बहरहाल । साहिर और मजरूह का ये रचनात्‍मक विरोध फिल्‍म-संसार में गीतों की रचना को लेकर हमेशा बने रहे संशय की मिसाल है । जावेद अख्‍तर जब 'एक लड़की को देखा' या अपने हिट गीतों में से कोई भी रचते हैं तो शाबाशी पाते हैं । और जब फिल्‍म के छर्रे टाईप हीरो के लिए 'दर्दे डिस्‍को' लिखते हैं तो लानतें-मलामतें पाते हैं । यही हाल गुलज़ार का रहा है । जब उन्‍होंने 'मेरा कुछ सामान' या 'तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी' लिखा तो उन्‍हें शाबाशी दी गयी । और कई लोगों ने 'बीड़ी' या फिर फिल्‍म 'जानेमन' के गीतों पर कड़ा एतराज़ जताया । यहां तक कि 'कजरा रे' पर भी । ख़ैर ये अलग से विचार विमर्श का मुद्दा है । और याद रहा तो जल्‍दी ही गीतकारों के रचनात्‍मक-शिखर और पेशेवर-गर्त में पहुंचने की कई मिसालें लेकर मैं अलग से हाजि़र होऊंगा ।

फिलहाल ये संजीदा गीत सुनिए । और बताईये कि कैसा लगा । इस गाने की एक एक पंक्ति तेज़ाबी है ।

लोग औरत को फकत जिस्‍म समझ लेते हैं ।
रूह भी होती है उसमें, ये कहां सोचते हैं
रूह क्‍या होती है इससे उन्‍हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तकाज़ों का कहा मानते हैं
रूह मर जाए तो हर जिस्‍म एक चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को समझते हैं ना पहचानते हैं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है कायम ये गुनाहों का रवां
लोग औरत की हरेक चीख़ को नग़्मा समझें
वो क़बीलों का ज़माना हो के शहरों का समां
लोग औरत को फक़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।



जब्र से नस्‍ल बढ़े ज़ुल्‍म से तन मेल करे
ये अमल हममें है बेइल्‍म परिंन्‍दो में नहीं
हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हमसा वहशी कोई जंगल की दरिंदों में नहीं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

एक मैं ही नहीं क्‍या जाने ये कितनी होंगी
जिनको अब आईना तकने से झिझक आती है
जिनके ख्‍वाबों में ना सेहरे हैं ना सिंदूर ना सेज
राख ही राख है जो ज़ेहन पे मंडलाती है
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

इक बुझी रूह, लुटे जिस्‍म के ढांचे में लिए
सोचती हूं कि कहां जाके मुकद्दर फोड़ूं
मैं ना जिंदा हूं कि मरने का सहारा ढूंढूं
और ना मुरदा हूं कि जीने के ग़मों से छूटूं
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।

कौन बतलाएगा मुझको किससे जाकर पूछूं
जिंदगी ज़हर के सांचों में ढलेगी कब तक
कब तलब आंख ना खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्‍म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक
लोग औरत को फ़क़त जिस्‍म समझ लेते हैं ।।


इस गाने को आप यहां सुन सकते हैं ।


इस गाने को यहां देखा भी जा सकता है ।

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यहां दी गयी तस्‍वीर में कौन लोग हैं पहचाना क्‍या आपने ।
अगर नहीं तो पह‍चानिए--सबसे बांये शॉल ओढ़े हमारे किशोर दा हैं । फिर सदाबहार दे...व आनंद । फिर साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा ( जो सगे भाई जैसे दिख रहे हैं ) और सबसे दाहिनी तरफ हैं पंचम । मैंने याददाश्‍त पर बहुत ज़ोर डाला पर आज की सुबह तो याद नहीं आ रहा है कि कौन सी फिल्‍म रही होगी, जिसे यश चोपड़ा या देव आनंद ने बनाया और साहिर ने गाने लिखे और‍ किशोर दा ने गाया । हो सकता है कि ये देव साहब की उन फिल्‍मों में से एक हो जिसमें आर डी बर्मन का म्‍यूजिक हो । और यहां यश चोपड़ा और साहिर बस घूमते घूमते ही पहुंच गये हों ।


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित:
साहिर-लुधियानवी, लोग-औरत-को-फ़क़त-जिस्‍म-समझ-लेते-हैं, फिल्‍म-इंसाफ-का-तराज़ू, बी.-आर.-चोपड़ा, sahir-ludhiyanvi, log-aurat-ko-faqat-jism-samajh-lete-hain, film-insaf-ka-tarazu, insaf-ka-taraju, B.-R.-Chopra.,



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'B.R.Chopra'

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अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

Wednesday, July 18, 2007

ख़ुद साहिर लुधियानवी की दुर्लभ आवाज़ में उनकी तीन नज़्में

साहिर मेरे प्रिय शायर हैं और मेरे से भी ज्‍यादा साहिर प्रिय हैं बैंगलोर के मेरे मित्र शिरीष कोयल को । शिरीष और मैं कभी मिले नहीं, हमारी दोस्‍ती इसी चिट्ठे के ज़रिए हुई, और अब हम अकसर बातें करते हैं । आपको एक ख़ास बात बता दूं कि शिरीष भाई उन तमाम फिल्‍मों को जमा कर रहे हैं जिनमें साहिर लुधियानवी के गाने थे । कुछ महीनों पहले फ़ोन पर शिरीष ने मुझे साहिर की आवाज़ सुनवाई थी । फिर पिछले दिनों जब मैंने साहिर की नज़्म ‘ताजमहल’ अपने चिट्ठे पर पेश की तो उन्‍होंने कहा कि आपने बताया होता मैं अपने पास मौजूद साहिर के उनकी आवाज़ वाले सारे अशआर भेज देता । फिर उन्‍होंने भेजे भी । और आज मैं इन्‍हें आपके लिए पेश कर रहा हूं ।

नज़्म ‘ताजमहल’ पहले भी ‘रेडियोवाणी’ पर पेश की जा चुकी है, इसे आखिर में दोबारा सिर्फ़ इसलिये दिया जा रहा है, ताकि इस वक्‍त उपलब्‍ध साहिर की आवाज़ वाले उनके अशआर को सुनने का मुकम्‍मल अहसास हो सके ।


ये नज़्म है--‘खूबसूरत मोड़’






चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों

ना मैं तुमसे कोई उम्‍मीद रखूं दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लतअंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों में

ना ज़ाहिर हो तुम्‍हारी कश्‍मकश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों ।।

तुम्‍हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं

मेरे हमराह भी रूसवाईयां हैं मेरे माज़ी की................माज़ी—अतीत

तुम्‍हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
ताअर्रूफ़ रोग हो जाये तो इसको भूलना बेहतर
ताल्‍लुक बोझ बन जाये तो इसको तोड़ना अच्‍छा

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्‍छा ।

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों ।।

बी.आर.चोपड़ा ने इस नज़्म को सन 1963 में अपनी फिल्‍म ‘गुमराह’ में शामिल किया था, इसे रवि की तर्ज़ पर गाया था महेंद्र कपूर ने ।

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और आईये अब सुनें नज़्म ‘ताजमहल’





ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्‍फ़त ही सही
तुझको इस वादिये रंगीं से अकीदत ही सही
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्‍या मानी
सब्‍त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्‍या मानी
मेरे मेहबूब पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा तूने
सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है
कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं
क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं
दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं
मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी
जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील
उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील

ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे ।।

कुछ कठिन शब्‍दों के मायने


मज़हर-ऐ-उल्‍फत—प्रेम का प्रतिरूप
वादिए-रंगीं—रंगीन घाटी
बज्मे शाही—शाही महफिल
सब्‍त—अंकित,
सतवते-शाही— शाहाना शानो शौक़त
पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा—प्रेम के प्रदर्शन/विज्ञापन के पीछे
मक़ाबिर—मकबरे तारीक—अंधेरे सादिक़—सच्‍चे
तशहीर का सामान—विज्ञापन की सामग्री
हिसार—किले
मुतलक-उल-हुक्‍म—पूर्ण सत्‍ताधारी
अज़्मत—महानता
सुतूं—सुतून
दामने-देहर—संसार के दामन पर
अज़दाद—पुरखे
ख़ूं—खून
सन्‍नाई—कारीगरी
शक्‍ले-जमील—सुंदर रूप
बेनामो-नुमूद—गुमनाम
चमनज़ार—बाग़
मुनक़्क़श—नक्‍काशी


और इस नज़्म का उन्‍वान है ‘कभी-कभी’




कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है

कि जिंदगी तेरी जुल्‍फ़ों की नर्म छांव में गुज़रने पाती

तो शादाब हो भी सकती थी

ये तीरगी जो मेरे ज़ीस्‍त का मुक़द्दर है,

तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब ना था कि मैं बेगाना-ए-अलम होकर,

तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता

तेरा गुदाज़ बदन, तेरी नीमबाज़ आंखें,

इन्‍हीं हसीन फ़ज़ाओं में मैं हो रहता ।

पुकारतीं मुझे जब तल्खियां ज़माने की,

तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता

हयात चीख़ती फिरती बरहना-सर और मैँ,

घनेरी ज़ुल्‍फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो ना सका,

मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्‍तजू भी नहीं

गुज़र रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे,

इसे किसी सहारे की आरज़ू भी नहीं ।

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूं गले

गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगुज़रों से

मुहीब साये मेरी सिम्‍त बढ़ते आते हैं

हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ार-ज़ारों से

ना कोई जादा ना मंजिल ना रोशनी का सुराग़

भटक रही है ख़लाओं में जिंदगी मेरी

इन्‍हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर

मैं जानता हूं मेरी हमनफ़स मगर यूं ही

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है ।।



इस नज्म में आये कुछ कठिन उर्दू शब्‍दों के मायने


शादाब—ताज़ा,खुशनुमा

तीरगी—अंधेरा

ज़ीस्‍त—जिंदगी

बेगाना-ए-इल्‍म—ज्ञान से बेख़बर

जमाल—खूबसूरती

रानाईयों—चमक दमक

गुदाज़—नर्म, तंदुरूस्‍त

नीमबाज़—अधसोई

तल्खियां—कड़वापन, तीखापन

हलावत—स्‍वादिष्‍ट, अच्‍छा

हयात—जिंदगी

बरहना—खुला हुआ, नंगा

घनेरी—घनी

जुस्‍तजू—उम्‍मीद, तलाश

मुहीब—डरावना

सिम्‍त—तरफ, दिशा में

पुर हौल—डरावना

ख़ार—कांटे

ज़ारों—अफ़सोस, शोक

ख़ला—ख़ालीपन, निर्वात

हमनफ़स—हमसफर, दोस्‍त


एक बार फिर हम भाई शिरीष कोयल के आभारी हैं कि इन्‍होंने ये नज़्में साहिर की आवाज़ में हम तक पहुंचाईं । साहिर की आवाज़ में इन तीनों नज़्मों को सुनना सुकून का एक मुकम्‍मल अहसास कराता है । मेरा तो आज का दिन बन गया......और आपका ?

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अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

ख़ुद साहिर लुधियानवी की दुर्लभ आवाज़ में उनकी तीन नज़्में

साहिर मेरे प्रिय शायर हैं और मेरे से भी ज्‍यादा साहिर प्रिय हैं बैंगलोर के मेरे मित्र शिरीष कोयल को । शिरीष और मैं कभी मिले नहीं, हमारी दोस्‍ती इसी चिट्ठे के ज़रिए हुई, और अब हम अकसर बातें करते हैं । आपको एक ख़ास बात बता दूं कि शिरीष भाई उन तमाम फिल्‍मों को जमा कर रहे हैं जिनमें साहिर लुधियानवी के गाने थे । कुछ महीनों पहले फ़ोन पर शिरीष ने मुझे साहिर की आवाज़ सुनवाई थी । फिर पिछले दिनों जब मैंने साहिर की नज़्म ‘ताजमहल’ अपने चिट्ठे पर पेश की तो उन्‍होंने कहा कि आपने बताया होता मैं अपने पास मौजूद साहिर के उनकी आवाज़ वाले सारे अशआर भेज देता । फिर उन्‍होंने भेजे भी । और आज मैं इन्‍हें आपके लिए पेश कर रहा हूं ।

नज़्म ‘ताजमहल’ पहले भी ‘रेडियोवाणी’ पर पेश की जा चुकी है, इसे आखिर में दोबारा सिर्फ़ इसलिये दिया जा रहा है, ताकि इस वक्‍त उपलब्‍ध साहिर की आवाज़ वाले उनके अशआर को सुनने का मुकम्‍मल अहसास हो सके ।


ये नज़्म है--‘खूबसूरत मोड़’






चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों

ना मैं तुमसे कोई उम्‍मीद रखूं दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लतअंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों में

ना ज़ाहिर हो तुम्‍हारी कश्‍मकश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों ।।

तुम्‍हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं

मेरे हमराह भी रूसवाईयां हैं मेरे माज़ी की................माज़ी—अतीत

तुम्‍हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
ताअर्रूफ़ रोग हो जाये तो इसको भूलना बेहतर
ताल्‍लुक बोझ बन जाये तो इसको तोड़ना अच्‍छा

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्‍छा ।

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों ।।

बी.आर.चोपड़ा ने इस नज़्म को सन 1963 में अपनी फिल्‍म ‘गुमराह’ में शामिल किया था, इसे रवि की तर्ज़ पर गाया था महेंद्र कपूर ने ।

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और आईये अब सुनें नज़्म ‘ताजमहल’





ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्‍फ़त ही सही
तुझको इस वादिये रंगीं से अकीदत ही सही
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्‍या मानी
सब्‍त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्‍या मानी
मेरे मेहबूब पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा तूने
सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है
कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं
क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं
दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं
मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी
जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील
उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील

ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे ।।

कुछ कठिन शब्‍दों के मायने


मज़हर-ऐ-उल्‍फत—प्रेम का प्रतिरूप
वादिए-रंगीं—रंगीन घाटी
बज्मे शाही—शाही महफिल
सब्‍त—अंकित,
सतवते-शाही— शाहाना शानो शौक़त
पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा—प्रेम के प्रदर्शन/विज्ञापन के पीछे
मक़ाबिर—मकबरे तारीक—अंधेरे सादिक़—सच्‍चे
तशहीर का सामान—विज्ञापन की सामग्री
हिसार—किले
मुतलक-उल-हुक्‍म—पूर्ण सत्‍ताधारी
अज़्मत—महानता
सुतूं—सुतून
दामने-देहर—संसार के दामन पर
अज़दाद—पुरखे
ख़ूं—खून
सन्‍नाई—कारीगरी
शक्‍ले-जमील—सुंदर रूप
बेनामो-नुमूद—गुमनाम
चमनज़ार—बाग़
मुनक़्क़श—नक्‍काशी


और इस नज़्म का उन्‍वान है ‘कभी-कभी’




कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है

कि जिंदगी तेरी जुल्‍फ़ों की नर्म छांव में गुज़रने पाती

तो शादाब हो भी सकती थी

ये तीरगी जो मेरे ज़ीस्‍त का मुक़द्दर है,

तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब ना था कि मैं बेगाना-ए-अलम होकर,

तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता

तेरा गुदाज़ बदन, तेरी नीमबाज़ आंखें,

इन्‍हीं हसीन फ़ज़ाओं में मैं हो रहता ।

पुकारतीं मुझे जब तल्खियां ज़माने की,

तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता

हयात चीख़ती फिरती बरहना-सर और मैँ,

घनेरी ज़ुल्‍फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो ना सका,

मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है

कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्‍तजू भी नहीं

गुज़र रही है कुछ इस तरह जिंदगी जैसे,

इसे किसी सहारे की आरज़ू भी नहीं ।

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूं गले

गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगुज़रों से

मुहीब साये मेरी सिम्‍त बढ़ते आते हैं

हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ार-ज़ारों से

ना कोई जादा ना मंजिल ना रोशनी का सुराग़

भटक रही है ख़लाओं में जिंदगी मेरी

इन्‍हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर

मैं जानता हूं मेरी हमनफ़स मगर यूं ही

कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है ।।



इस नज्म में आये कुछ कठिन उर्दू शब्‍दों के मायने


शादाब—ताज़ा,खुशनुमा

तीरगी—अंधेरा

ज़ीस्‍त—जिंदगी

बेगाना-ए-इल्‍म—ज्ञान से बेख़बर

जमाल—खूबसूरती

रानाईयों—चमक दमक

गुदाज़—नर्म, तंदुरूस्‍त

नीमबाज़—अधसोई

तल्खियां—कड़वापन, तीखापन

हलावत—स्‍वादिष्‍ट, अच्‍छा

हयात—जिंदगी

बरहना—खुला हुआ, नंगा

घनेरी—घनी

जुस्‍तजू—उम्‍मीद, तलाश

मुहीब—डरावना

सिम्‍त—तरफ, दिशा में

पुर हौल—डरावना

ख़ार—कांटे

ज़ारों—अफ़सोस, शोक

ख़ला—ख़ालीपन, निर्वात

हमनफ़स—हमसफर, दोस्‍त


एक बार फिर हम भाई शिरीष कोयल के आभारी हैं कि इन्‍होंने ये नज़्में साहिर की आवाज़ में हम तक पहुंचाईं । साहिर की आवाज़ में इन तीनों नज़्मों को सुनना सुकून का एक मुकम्‍मल अहसास कराता है । मेरा तो आज का दिन बन गया......और आपका ?

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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