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Tuesday, April 15, 2008

उन्‍होंने शमशाद बेगम को मृत घोषित कर दिया, पर हम कहते हैं शमशाद आप आप हज़ार साल जिएं ।

मीडिया कई बार बड़ा अनर्थ कर देता है । ख़ासकर ऐसे युग में जब 'सबसे तेज़' और 'सबसे आगे' वाले नारे हमारे समय के सबसे गौरवशाली नारे बन चुके हैं, मीडिया इस क़दर हड़बड़ी और जल्‍दीबाज़ी में होता है कि उसे दो घड़ी बैठकर विवेकपूर्ण निर्णय करने की फुरसत नहीं होती । इसकी एक और मिसाल कल दिखाई पड़ी ।

कल मुंबई के नवभारत टाइम्‍स में ख़बर छपी कि शमशाद बेगम का जन्‍मदिन है आज । ये समाचार एजेन्‍सी 'भाषा' का भेजा गया आलेख था । जिसे मुंबई के नवभारत टाइम्‍स ने अपने दूसरे पन्‍ने पर सबसे ऊपर छापा । इस लेख में लिखा गया कि सन 1998 में शमशाद बेगम की मृत्‍यु हो गयी । वे चली गयीं लेकिन उनके गीत हैं जो हमें उनकी याद दिलाते हैं । इसी आलेख में

वो भावहीन चेहरा आ गया है जो कहता था कि उनकी यादों के दरीचे बंद हो गये हैं । जाम हो चुकी यादों की खिड़कियों को कोई ना छेड़े ।

एक वाक्‍य था 'शमशाद बेगम ने कई नट-गीत और भक्तिगीत' भी गाए ।

चूंकि मैं शमशाद बेगम का शैदाई हूं और इंटरनेट पर उन जुड़ी लगभग सारी संभव सामग्री छान चुका हूं इसलिए मुझे इस आलेख का सूत्र फौरन समझ में आ गया । ये लेख दरअसल शमशाद पर आसानी से उपलब्‍ध इंटरनेटीय सामग्री का अनुवाद करके तैयार किया गया था । और इस बात की तस्‍दीक करने की जरूरत नहीं समझी गयी कि उपलब्‍ध जानकारी में कितनी सत्‍यता है ।

पहले तो आपको बता दें कि शमशाद बेगम हैं और 'बाक़ायदा जीवित' हैं । कुछ समय पहले विविध भारती के लिए कमल शर्मा ने उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और कठिन बातचीत रिकॉर्ड की थी । और इन्‍हीं दिनों रेडियो सखी ममता सिंह ने टेलीफोन पर उनका एक लंबा इंटरव्‍यू रिकॉर्ड करवाया था और उनसे ना ना करते हुए भी काफी कुछ गवा लिया था । बेहद भोली, मासूम और प्‍यारी सी हैं शमशाद बेगम । सबसे बड़ी बात ये है कि वे मीडिया की चमक-दमक से दूर एक गुमनाम सी जिंदगी जी रही हैं । ये वो तस्‍वीर है जो मैंने अपनी इस पोस्‍ट पर चढ़ाई थी । इसे मैंने हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से स्‍कैन किया था ।

                        shamshad

दिक्‍कत ये है कि नवासी साल की उम्र में याददाश्‍त भी ज़रा दग़ा ही दे जाती है, यही उनके साथ भी हुआ है । इसलिए उनसे बातें करना कठिन होता है । वैसे भी एक उम्र के बाद बुजुर्ग 'डिस-ओरीयेन्‍टेड' हो जाते हैं । फिर उन्‍हें देखना ही मुमकिन होता है । उनके साथ यादों के दरीचों में झांकना काफी मुश्किल होता है । मैंने अपनी मां को अपने नाना की ज़ईफ़ी ( बुढ़ापे) में बड़ी तसल्‍ली से पुरानी बातें याद दिलाने की दुसाध्‍य कोशिश करते कई बार देखा है । और आज भी आंखों के सामने नानाजी का वो भावहीन चेहरा आ गया है जो कहता था कि उनकी यादों के दरीचे बंद हो गये हैं । जाम हो चुकी यादों की खिड़कियों को कोई ना छेड़े ।

बहरहाल मुझे नवभारत टाइम्‍स में छपे इस लेख को पढ़कर बहुत गुस्‍सा आया और उससे भी ज्‍यादा गुस्‍सा तब आया जब कल विविध भारती पर सखी सहेली की एक कैजुअल एनाउंसर उस लेख को रिफरेन्‍स बनाकर रेडियो पर शमशाद बेगम के बारे में कुछ बोलने वाली थी । ममता ने फोन करके पूछा कि कहीं वाक़ई शमशाद बेगम इस बीच गुमनामी से 'चली' तो नहीं गयीं । और मैंने समझाया कि भई वे हैं । और रेडियो पर उस कैजुएल अनाउंसर को इस तरह की हिमाकत करने से रोका जाए ।

अब ज़रा इसी लेख में ऊपर रेखांकित किये गये जुमले को पढिए । उन्‍होंने नटगीत और भक्तिगीत गाए । मैं आपको बता दूं कि किसी मशहूर साइट पर nat and devotional songs लिखा है । इसका अनुवाद किया गया 'नटगीत और भक्तिगीत' । अब बताईये कि ये नट गीत क्‍या होते हैं और मुझे गुस्‍सा क्‍यों ना आए । क्‍या हमें मीडिया को जवाबदेह नहीं बनाना चाहिए ।

संभवत: कल अख़बार के दफ्तर में मेरे जैसे लोगों के कई फोन गए होंगे इसलिए आज नवभारत टाइम्‍स मुंबई ने अपनी 'गिल्‍ट' को दूर करने के लिए पुन: एक आलेख छापा है जिसका शीर्षक रखा गया है  '89 की हुई शमशाद बेगम' । इसमें ये बात लिखी गयी है कि कई नामी समाचार ऐजेन्सियों और वेबसाईटों ने उन्‍हें मृत घोषित कर रखा गया है । जबकि वे जीवित हैं । बताइये इस बात पे हंसें या रोएं । ग़ालिब का शेर याद आता है--

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ना, ना होता मैं तो क्‍या होता ।।

अब शमशाद आपा का गाया एक गीत सुनवा दूं तो मुझे चैन आए । दरअसल शमशाद हमारे लोक संगीत और हमारी लोक संस्‍कृति की आवाज़ हैं । उनके गाने इसीलिए देर तक मन में गूंजते हैं । ये सन 1949 में आई फिल्‍म दुलारी का गीत है । जिसे शकील बदायूंनी ने लिखा था और नौशाद की तर्ज़ । इस गाने को आराम से आंखें बंद करके सुनिए । साज़ों और आवाज़ों की तरंगों को दिल में उतरने दीजिए और फिर बताईये कि कैसा लगा आपको । मेरे साथ कहिए शमशाद आपा आप हज़ार साल जिएं ।

चांदनी आई बनके प्‍यार ओ साजना

लागी मेरे दिल पर कटार ओ साजना ।।

जीवन में प्रीत ना हो ये भी है रीत कोई

देखो जी मेरे बिना, गाना ना गीत कोई

टूट ना जाएं दिल के तार ओ साजना ।। लागी मेरे ।।

बेदर्दी सैंयां मुझ दुखिया की लाज रहे

कहने की बात नहीं अब तुमसे कौन कहे

सुनलो मेरे दिल की पुकार ओ साजना ।। लागी मेरे ।।

अंखियां मिलाके ज़रा उल्‍फत का रंग भरो

मेरे बन जावोगे तुम इसका इक़रार करो

आता नहीं दिल बार बार ओ साजना ।। लागी मेरे ।

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उन्‍होंने शमशाद बेगम को मृत घोषित कर दिया, पर हम कहते हैं शमशाद आप आप हज़ार साल जिएं ।

मीडिया कई बार बड़ा अनर्थ कर देता है । ख़ासकर ऐसे युग में जब 'सबसे तेज़' और 'सबसे आगे' वाले नारे हमारे समय के सबसे गौरवशाली नारे बन चुके हैं, मीडिया इस क़दर हड़बड़ी और जल्‍दीबाज़ी में होता है कि उसे दो घड़ी बैठकर विवेकपूर्ण निर्णय करने की फुरसत नहीं होती । इसकी एक और मिसाल कल दिखाई पड़ी ।

कल मुंबई के नवभारत टाइम्‍स में ख़बर छपी कि शमशाद बेगम का जन्‍मदिन है आज । ये समाचार एजेन्‍सी 'भाषा' का भेजा गया आलेख था । जिसे मुंबई के नवभारत टाइम्‍स ने अपने दूसरे पन्‍ने पर सबसे ऊपर छापा । इस लेख में लिखा गया कि सन 1998 में शमशाद बेगम की मृत्‍यु हो गयी । वे चली गयीं लेकिन उनके गीत हैं जो हमें उनकी याद दिलाते हैं । इसी आलेख में

वो भावहीन चेहरा आ गया है जो कहता था कि उनकी यादों के दरीचे बंद हो गये हैं । जाम हो चुकी यादों की खिड़कियों को कोई ना छेड़े ।

एक वाक्‍य था 'शमशाद बेगम ने कई नट-गीत और भक्तिगीत' भी गाए ।

चूंकि मैं शमशाद बेगम का शैदाई हूं और इंटरनेट पर उन जुड़ी लगभग सारी संभव सामग्री छान चुका हूं इसलिए मुझे इस आलेख का सूत्र फौरन समझ में आ गया । ये लेख दरअसल शमशाद पर आसानी से उपलब्‍ध इंटरनेटीय सामग्री का अनुवाद करके तैयार किया गया था । और इस बात की तस्‍दीक करने की जरूरत नहीं समझी गयी कि उपलब्‍ध जानकारी में कितनी सत्‍यता है ।

पहले तो आपको बता दें कि शमशाद बेगम हैं और 'बाक़ायदा जीवित' हैं । कुछ समय पहले विविध भारती के लिए कमल शर्मा ने उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और कठिन बातचीत रिकॉर्ड की थी । और इन्‍हीं दिनों रेडियो सखी ममता सिंह ने टेलीफोन पर उनका एक लंबा इंटरव्‍यू रिकॉर्ड करवाया था और उनसे ना ना करते हुए भी काफी कुछ गवा लिया था । बेहद भोली, मासूम और प्‍यारी सी हैं शमशाद बेगम । सबसे बड़ी बात ये है कि वे मीडिया की चमक-दमक से दूर एक गुमनाम सी जिंदगी जी रही हैं । ये वो तस्‍वीर है जो मैंने अपनी इस पोस्‍ट पर चढ़ाई थी । इसे मैंने हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से स्‍कैन किया था ।

                        shamshad

दिक्‍कत ये है कि नवासी साल की उम्र में याददाश्‍त भी ज़रा दग़ा ही दे जाती है, यही उनके साथ भी हुआ है । इसलिए उनसे बातें करना कठिन होता है । वैसे भी एक उम्र के बाद बुजुर्ग 'डिस-ओरीयेन्‍टेड' हो जाते हैं । फिर उन्‍हें देखना ही मुमकिन होता है । उनके साथ यादों के दरीचों में झांकना काफी मुश्किल होता है । मैंने अपनी मां को अपने नाना की ज़ईफ़ी ( बुढ़ापे) में बड़ी तसल्‍ली से पुरानी बातें याद दिलाने की दुसाध्‍य कोशिश करते कई बार देखा है । और आज भी आंखों के सामने नानाजी का वो भावहीन चेहरा आ गया है जो कहता था कि उनकी यादों के दरीचे बंद हो गये हैं । जाम हो चुकी यादों की खिड़कियों को कोई ना छेड़े ।

बहरहाल मुझे नवभारत टाइम्‍स में छपे इस लेख को पढ़कर बहुत गुस्‍सा आया और उससे भी ज्‍यादा गुस्‍सा तब आया जब कल विविध भारती पर सखी सहेली की एक कैजुअल एनाउंसर उस लेख को रिफरेन्‍स बनाकर रेडियो पर शमशाद बेगम के बारे में कुछ बोलने वाली थी । ममता ने फोन करके पूछा कि कहीं वाक़ई शमशाद बेगम इस बीच गुमनामी से 'चली' तो नहीं गयीं । और मैंने समझाया कि भई वे हैं । और रेडियो पर उस कैजुएल अनाउंसर को इस तरह की हिमाकत करने से रोका जाए ।

अब ज़रा इसी लेख में ऊपर रेखांकित किये गये जुमले को पढिए । उन्‍होंने नटगीत और भक्तिगीत गाए । मैं आपको बता दूं कि किसी मशहूर साइट पर nat and devotional songs लिखा है । इसका अनुवाद किया गया 'नटगीत और भक्तिगीत' । अब बताईये कि ये नट गीत क्‍या होते हैं और मुझे गुस्‍सा क्‍यों ना आए । क्‍या हमें मीडिया को जवाबदेह नहीं बनाना चाहिए ।

संभवत: कल अख़बार के दफ्तर में मेरे जैसे लोगों के कई फोन गए होंगे इसलिए आज नवभारत टाइम्‍स मुंबई ने अपनी 'गिल्‍ट' को दूर करने के लिए पुन: एक आलेख छापा है जिसका शीर्षक रखा गया है  '89 की हुई शमशाद बेगम' । इसमें ये बात लिखी गयी है कि कई नामी समाचार ऐजेन्सियों और वेबसाईटों ने उन्‍हें मृत घोषित कर रखा गया है । जबकि वे जीवित हैं । बताइये इस बात पे हंसें या रोएं । ग़ालिब का शेर याद आता है--

ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ना, ना होता मैं तो क्‍या होता ।।

अब शमशाद आपा का गाया एक गीत सुनवा दूं तो मुझे चैन आए । दरअसल शमशाद हमारे लोक संगीत और हमारी लोक संस्‍कृति की आवाज़ हैं । उनके गाने इसीलिए देर तक मन में गूंजते हैं । ये सन 1949 में आई फिल्‍म दुलारी का गीत है । जिसे शकील बदायूंनी ने लिखा था और नौशाद की तर्ज़ । इस गाने को आराम से आंखें बंद करके सुनिए । साज़ों और आवाज़ों की तरंगों को दिल में उतरने दीजिए और फिर बताईये कि कैसा लगा आपको । मेरे साथ कहिए शमशाद आपा आप हज़ार साल जिएं ।

चांदनी आई बनके प्‍यार ओ साजना

लागी मेरे दिल पर कटार ओ साजना ।।

जीवन में प्रीत ना हो ये भी है रीत कोई

देखो जी मेरे बिना, गाना ना गीत कोई

टूट ना जाएं दिल के तार ओ साजना ।। लागी मेरे ।।

बेदर्दी सैंयां मुझ दुखिया की लाज रहे

कहने की बात नहीं अब तुमसे कौन कहे

सुनलो मेरे दिल की पुकार ओ साजना ।। लागी मेरे ।।

अंखियां मिलाके ज़रा उल्‍फत का रंग भरो

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आता नहीं दिल बार बार ओ साजना ।। लागी मेरे ।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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