आज है 'रेडियोवाणी' की पहली सालगिरह
आज रेडियोवाणी की पहली सालगिरह है । मुझे यकीन ही नहीं होता कि ब्लॉगिंग की दुनिया में मुझे एक साल पूरा हो गया । कैसे ये एक साल बीत गया पता ही नहीं चला ।
ये सच है कि ब्लॉगिंग की दुनिया में मैं अचानक ही चला आया था । दरअसल इंटरनेट पर हिंदी में लिखने की तकनीक तो बाद में पता चली । पहले किसी दिन मैं मरफ़ी के नियमों के बारे में कुछ खोजबीन कर रहा था । तभी रवि रतलामी के ब्लॉग का पता चला । इस तरह रवि रतलामी घोषित रूप से हमारे ब्लॉगिंग-गुरू हैं । अगर किसी को लगता है कि ब्लॉगिंग की दुनिया मं हमें लाने की ग़लती किसने की तो वो श्री रवि रतलामी से संपर्क करे ।
खै़र, उसके बाद एक-एक करके कैलिडोस्कोप की तरह ब्लॉगिंग की दुनिया हमारे सामने अपने विविध रूपों में खुलती चली गयी । रवि भाई के अलावा जिस ब्लॉग पर शुरूआती दौर में नज़र पड़ी थी वो मनीष कुमार का ब्लॉग था । गीतकार सईद क़ादरी के इंटरव्यू के लिए मैं रिसर्च कर रहा था और मनीष की किसी पोस्ट पर जा पहुंचा था । इस तरह मनीष के ब्लॉग की कुछ दिनों तक छानबीन चलती रही और टिप्पणीबाज़ी भी चलती रही । फिर जल्दी ही इंडिक आई एम ई डाउनलोड किया और इंटरनेट पर हिंदी में लिखने का एक ज़रिया हाथ लग गया ।
दरअसल अप्रैल में 'रेडियोवाणी' की शुरूआत ये सोचकर की गयी थी कि इस ब्लॉग पर फिल्मों, विज्ञापनों, संगीत और अन्य तमाम मुद्दों पर लिखा जायेगा । लेकिन धीरे-धीरे हुआ ये कि आप सभी के अनुरोध पर रेडियोवाणी को संगीत के लिए ही समर्पित कर देना पड़ा । अब बाक़ी बातें कहां पर की जाएं । जब ये सवाल उठा तो मैंने अपने पिछले जन्मदिन पर अपना नया ब्लॉग शुरू किया 'तरंग'- जिसकी टैग लाइन है--मेरे मन की तरंग । लेकिन रेडियोवाणी और तरंग के बीच एक अहम घटना और हुई है पिछले एक साल की चिट्ठाकारी में । एक दिन मैं भाई अफलातून और भाई सागर नाहर से
अलग अलग चैट कर रहा था । तभी बातों बातों में 'रेडियोनामा' शुरू करने का आयडिया निकल कर आया । और जल्दी ही रेडियोनामा ने आकार लिया और ग्यारह सितंबर को भाई अफलातून ने रेडियोनामा की पहली पोस्ट लिखी रेडियो आशिक़ भगवान काका । पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है रेडियोनामा की शुरूआत ब्लॉगिंग की मेरी यात्रा का एक अहम क़दम रहा है । रेडियो की दुनिया पर सार्थक बातचीत और विमर्श करने का एक जरूरी मंच बना है रेडियोनामा । आज रेडियोनामा पर कितने सारे लोग लिख रहे हैं और रेडियो की दुनिया के कितने कितने पहलू सामने आ रहे हैं । रेडियोनामा को लेकर अभी कितनी ही योजनाएं हैं जिन्हें मूर्त रूप दिया जाना है ।
ब्लॉगिंग की एक साल की यात्रा ने कई मित्र बनाए हैं । कई लोगों से जुड़वाया है । हैदराबाद के भाई सागर नाहर हमारे अभिन्न मित्र हैं । रेडियोनामा के प्रबंधन का काम सागर भाई परदे के पीछे रहकर बड़ी तन्मयता और जिम्मेदारी से कर रहे हैं । रवि रतलामी हमारे ब्लॉग-गुरू हैं । तकनीकी दिक्कतें होने पर मैं इन दोनों को सबसे पहले परेशान करता हूं ।
बाक़ी तमाम ऐसे मित्र हैं जिन सबके नाम देने पर ये पोस्ट बेहद लंबी हो सकती है । मुझे उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगे । ब्लॉगिंग की दुनिया अभी भी मित्रों की तादाद में इज़ाफ़ा करवाती जा रही है । और ये बेहद खुशगवार अहसास है । सभी मित्रों का धन्यवाद जिन्होंने अपनी टिप्पणियों और मेलों के ज़रिए हौसला बढ़ाया, ग़लतियां सुधारीं और फ़रमाईशें भी कीं । ये ज़रूर है कि इस एक वर्ष में कुछ बार अपनी आवाज़ में पॉडकास्टिंग की । पर ज्यादा नहीं कर पाया । उम्मीद है कि इस साल रेडियोवाणी और रेडियोनामा पर अपनी आवाज़ वाले ज्यादा पॉडकास्ट कर पाऊंगा ।
रेडियोवाणी की पहली सालगिरह पर एक ऐसा गीत जो कई दिनों से मन में गूंज रहा है ।
सुरमई शाम इस तरह आए, सांस लेते हैं जिस तरह साए ।
कोई आहट नहीं बदन की कहीं, फिर भी लगता है तू यहीं है कहीं ।
वक्त जाता सुनाई देता है, तेरा साया दिखाई देता है ।
जैसे खुश्बू नज़र से छू जाए, सांस लेते हैं जिस तरह साए ।
सुरमई शाम ।। ।
दिन का जो भी पहर गुज़रता है, एक अहसान सा उतरता है
वक्त के पांव देखता हूं मैं, रोज़ ये छांव देखता हूं मैं ।
आए जैसे कोई ख़्याल आए, सांस लेते हैं जिस तरह साए ।
सुरमई शाम ।।
Surmai Shaam
मैं हमेशा कहता हूं कि गाने जिंदगी में अतीत के किसी रिफरेन्स-पॉइंट की तरह होते हैं । इस गाने ने मुझे जिंदगी के बीते हुए कुछ वर्षों की याद दिला दी । लता जी द्वारा निर्मित फिल्म 'लेकिन' का संगीत जारी हुआ था और हमारे शहर में कैसेट पहुंचते ही हम फौरन ख़रीद लाए थे । उसके बाद दिन दिन भर बार बार इस फिल्म के गीत बजने लगे । पता नहीं क्यों तमाम गीतों के बीच इस गीत ने मेरे मन में ख़ास जगह बनाई ।
हृदयनाथ मंगेशकर का संगीत, गुलज़ार के बोल और मेरे प्रिय गायकों में से एक सुरेश वाडकर की आवाज़ । सब कुछ बेमिसाल है इस गाने में । इस गाने को ध्यान से सुनें तो आप महसूस करेंगे कि गाने का इंट्रो और इंटल्यूड सभी पश्चिमी वाद्यों पर बजे हैं ।
....वक्त जाता सुनाई देता है, तेरा साया दिखाई देता है । जैसे खुश्बू नज़र से छू जाए । सांस लेते हैं जिस तरह साए
लेकिन जैसे ही सुरेश वाडकर गाते हैं, आपके केवल तबला सुनाई देता है । भारतीय शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी संगीत का बेहतरीन संयोजन है इस गाने में । सुरेश वाडकर की ख़ासियत ये है कि वो ज्यादा कलाबाज़ी नहीं करते । उनकी सहज शास्त्रीयता ही उन्हें महान गायक बनाती है । इस गाने में उनकी सूक्ष्म-हरकतें और नाज़ुक भाव ग़ौर करने लायक़ हैं । ये गाना आपको अपने साथ बहाकर ले जाता है । आपको अपनी परेशानियों से काटकर एक सुखद छांव देता है ।जब घर से निकलकर विविध-भारती में काम करने मुंबई आया था तो मरीन-ड्राइव पर अरब सागर की लहरों को देखता अकेला, या कभी कभी अपने अज़ीज़ दोस्त और 'रूमी' सुनील के साथ बैठा शामें बिताया करता था । शुरूआत में मुंबई हताश भी करती है, झटके भी देती है और इम्तिहान भी लेती है । ऐसे कठिन दौर में समंदर के किनारे ये गाना बार-बार याद आता था, उसी समंदर के किनारे बैठकर हमने प्रेम की, घर की विकल याद की, ज़माने की जुल्मतों की कुछ कविताएं लिखी थीं और उसी समंदर के किनारे बैठकर बहुत सारे सपने देखे थे, जिनमें से कुछ पूरे हुए और बहुत की ताबीर बाक़ी है ।
रेडियोवाणी की पहली सालगिरह पर ये गाना सुनवाकर मैं अपने अतीत के उन दिनों को सलाम कर रहा हूं । एक महत्त्वपूर्ण दिन और उस पर एक अहम गीत का साथ । कल रेडियोवाणी पर मैं आपको बताऊंगा साल भर की कुछ महत्त्वपूर्ण पोस्टों के बारे में । तब तक आप सोचिए कि ये सब गाने नहीं होते तो दुनिया कितनी सूनी होती, जिंदगी कितनी बेमानी होती । ये गाने हैं तो ' वक्त के पांव देखता हूं मैं---रोज़ ये छांव देखता हूं मैं ।'
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