दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के: फ़ैज़ की ग़ज़ल । उस्ताद बरकत अली ख़ां की आवाज़ । रेडियोवाणी की दूसरी सालगिरह पर विशेष ।
दो बरस पहले नौ अप्रैल को जब 'रेडियोवाणी' को बस यूं ही शुरू किया था, तो मन में ये भी साफ़ नहीं था कि इस ब्लॉग का स्वरूप क्या होगा । लेकिन किसी एक ख़ास 'तरंग' के तहत शुरू हुए 'रेडियोवाणी' का स्वरूप वक्त के साथ-साथ तय होता चला गया । पाठकों और मित्रों की बेबाक राय के आधार पर 'रेडियोवाणी' को विशुद्ध संगीत-ब्लॉग का रूप दे दिया गया और बाक़ी बातों के लिए 'तरंग' की शुरूआत की गई । इस दौरान एक सामूहिक रेडियो ब्लॉग 'रेडियोनामा' भी शुरू हुआ । रेडियोवाणी के इस दो साल के सफ़र ने कई मित्र और शुभचिंतक दिये । परिचय का दायरा बढ़ाया और पिछले कई बरसों से संगीत पर लगातार लिखने की ललक को भी पूरा किया है ।
विविध-भारती में काम करते हुए लगातार संगीत के बीच ही रहना होता है । और लगातार बदलते संगीत से वाकफियत भी बनी रहती है । विविध-भारती पर बोलना और गाने वग़ैरह सुनवाना मेरा पेशा है । जहां मुझे अपने श्रोताओं की पसंद का ध्यान रखकर प्रस्तुतियां देनी पड़ती हैं । संस्थान की सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है । लेकिन संगीत का समुद्र इतना अथाह है कि इतने ही काम से अपना मन नहीं भरता । इसलिए रेडियोवाणी पर कुछ अपने मन के और कुछ दूसरों के मन के अनमोल- मोती ढूंढकर लाना बहुत ही सुखदाई और सुकूनदेह होता है । रेडियोवाणी पर मैं ज्यादातर अपने मन का संगीत लेकर आता हूं । ये मेरे मन का रेडियो-स्टेशन है । और इसीलिए मुझे इससे बहुत प्रेम है ।
लगातार व्यस्त होती इस दुनिया में, टारगेट्स के पीछे भागते लोगों के बीच संगीत को मैंने बड़ी ताक़त से अपनी जगह बनाते हुए देखा है । चाहे बंबई की लोकल-ट्रेनों, बसों और सड़कों पर मोबाइल और आई-पॉड्स पर संगीत की तरंगों पर झूमते ( परेशानहाल, थके, उदास, निराश, खुश, जोशीले ) लोग हों या फिर ऑफिस में डेस्कटॉप पर काम के बीच मीडिया-प्लेयर पर अपने पसंदीदा गाने सुनते लोग, घरों की रसोई में फ्रिज के ऊपर या कहीं और बजता रेडियो एक गृहिणी के संगीत-प्रेम का प्रतीक होता है । संगीत ने लोगों को एक दूसरे के और क़रीब ला दिया है । 'रेडियोवाणी' का मक़सद जोड़ना
है । थोड़ी देर के लिए धूल उड़ाकर तमाशा देखना नहीं है ।
आज रेडियोवाणी की दूसरी सालगिरह पर आपको एक अनमोल चीज़
सुनवाने का मन है । उस्ताद बरकत अली ख़ां बड़े ग़ुलाम अली ख़ां साहब के भाई थे और जाने-माने गायक उस्ताद (छोटे) ग़ुलाम अली ख़ां साहब के गुरू । उनकी गायकी का एक अलग ही रंग है । ख़ूब सारी गरमी वाले इस मौसम में बरकत अली ख़ां साहब की आवाज़ आपके कलेजे को सुकून पहुंचाएगी । आज उनकी गाई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक ग़ज़ल सुनिए--
| दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के |
रेडियोवाणी के दो साल पूरे होने पर हम यहां आने वाले संगीत के सारे शैदाईयों का शुक्रिया अदा करते हैं ।
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