खेलें मसाने में होली दिगंबर: पंडित छन्नूलाल मिश्रा का दिव्य-स्वर
होली मुझे बेहद तरंगित और ललित पर्व लगता है । मुझे लगता है कि आधुनिक-जीवन के तनावों और दबावों से निपटने के लिए होली एक 'स्ट्रेस-बस्टर' की तरह है । जिसमें हम अपने भीतर जमा हो चुके 'संत्रास' को मौज-मस्ती के माध्यम से बाहर निकालकर बहुत हल्के हो जाते हैं । उम्मीद है कि आपकी ये होली ऐसी ही होगी ।
होली के इस मौक़े पर पंडित छन्नूलाल मिश्रा को सुनना अपने आप में एक दिव्य-अनुभव होता है । हालांकि आपको लग सकता है कि होली के इस शुभ मौक़े पर ये होली थोड़ी-सी अजीब और थोड़ी-सी भयानक है, जो भी है ये अपने आप में एक अद्भुत-होली है ।
कुल मिलाकर ये छह मिनिट अड़तालीस सेकेन्ड की रचना है । जो आपको एक पूरे जीवन-काल का आनंद देगी ।
बतलाईये आपकी होली कैसी है और छन्नूलाल जी को सुनना कैसा अनुभव रहा आपके लिए ।
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