जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।
रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्वजीत, संध्या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।
मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की
अपनी तमन्ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं । मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्ती की खुश्बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।
कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।
जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा
कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे
रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे
सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए
....के तिनके सारे डाल से उड़ाए
सब रिश्ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा
बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।
जनम से बंजारा ।।
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