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Friday, April 18, 2008

जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्‍म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।

रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्‍म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्‍वजीत, संध्‍या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्‍हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।

मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की hemantapic2अपनी तमन्‍ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्‍वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं । मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्‍ती की खुश्‍बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्‍मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्‍नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।

कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्‍यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।

 जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा

कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।

जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे

रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे

सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा

बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा

बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।

सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए

....के तिनके सारे डाल से उड़ाए

सब रिश्‍ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा

बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।

जनम से बंजारा ।।

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अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

जनम जनम बंजारा हूं बंधू : फिल्‍म राहगीर, हेमंत कुमार की सौंधी आवाज़ ।

रेडियोवाणी पर गुलज़ार के गीतों की चर्चा अकसर ही हुई है । आज भी एक गुलज़ारी गीत की बात की जाए । फिल्‍म 'राहगीर' सन 1969 में आई थी । कलाकार थे-बिस्‍वजीत, संध्‍या राय, शशिकला, इफ्तेख़ार, कन्‍हैयालाल, निरूपा राय और असित सेन । मैंने ये फिल्‍म नहीं देखी । देखने का मौक़ा मिले या नहीं, पता नहीं । लेकिन ये गीत मैं बार-बार सुनता हूं ।

मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की hemantapic2अपनी तमन्‍ना की चर्चा हमेशा करता रहता हूं । जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई । ख़ैर...आपको नहीं लगता कि हम सब अपने मन के बंजारे हैं । मन की दुनिया में विचरण करते रहते हैं । ये हम बंजारों का गीत है । और हमारे मन के बेहद क़रीब है । पहले हेमंत दा की प्रतिभा को सलाम कीजिए । आप भी उनके मुरीद हैं तो इस पेज पर जाईये जहां से हमने ये तस्‍वीर साभार ली है । ये सुरताल डॉट कॉम की लिंक है । हेमंत दा के बारे में इस पेज पर भरपूर जानकारियां हैं । मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्‍ती की खुश्‍बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्‍मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्‍नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।

कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्‍यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।

 जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा

कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।

जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे

रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे

सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा

बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा

बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।

सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए

....के तिनके सारे डाल से उड़ाए

सब रिश्‍ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा

बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।

जनम से बंजारा ।।

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Saturday, March 8, 2008

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर-- हिप हिप हुर्रे फिल्‍म का गीत ।

कुछ गाने मन के भीतर कहीं अपनी जगह बना लेते हैं । फिर यादों की परतें चढ़ती जाती हैं और गाना कहीं भीतर दबकर रह जाता है । गाहे-बगाहे गाना इन निचली परतों के भीतर से झांककर अपनी मौजूदगी का अहसास करता रहता है...ऐसे ही एक गाने की याद किसी ने दिला दी है । मुझे याद है दूरदर्शन के ज़माने में मैंने प्रकाश झा की ये फिल्‍म बड़े ही चाव से देखी थी--'हिप हिप हुर्रे' । इस फिल्‍म में राजकिरण और दीप्‍ती नवल की जोड़ी थी । मुझे इस खेल-फिल्‍म के गाने बहुत पसंद आए थे । वक्‍त वक्‍त पर ये गीत मैं रेडियोवाणी पर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करूंगा ।

विविध भारती में आने के बाद मुझे प्रकाश झा से बातचीत का भी मौक़ा मिला और दीप्‍ती नवल से तो उनके अपने घर पर जाकर बातचीत की । दोनों ने इस फिल्‍म को बड़ी शिद्दत से याद किया । क्‍योंकि दोनों की ही जिंदगी में इस फिल्‍म के बड़ा महत्‍त्‍व रहा है । दोनों इस फिल्‍म के ज़रिए क़रीब आए थे । शादी के रास्‍ते पर चल पड़े थे ।

.... रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

विविध भारती में आने के बाद मुझे 'हिप हिप हुर्रे' के गाने तसल्‍ली से सुनने को मिले । और अब इंटरनेट पर ई स्निप्‍स से जुगाड़ कर ये गाने आप तक पहुंचाए जा रहे हैं Happy 

गुलज़ार के बोल हैं । और बहुत ख़ास हैं । संयोग देखिए कि रेडियोवाणी पर पिछली पोस्‍ट भी वनराज भाटिया के गाने की ही थी--जिसके बोल थे--'ये फासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' । और इसके फ़ौरन बाद मैं जिस गाने का जिक्र कर रहा हूं वो भी वनराज भाटिया ने ही स्‍वरबद्ध किया है । ये गुलज़ार का गीत है । ठेठ गुलज़ारी गीत । अपने व्‍याकरण और अपनी भावनाओं के लिहाज़ से अव्‍वल नंबर है ये गीत । आईये इसके संगीत की बात की जाए । येसुदास की आवाज़ है इस गाने में । यानी वनराज भाटिया, गुलज़ार और येसुदास की दुर्लभ तिकड़ी ।

vb gulzar ysd

येसुदास ने इस गाने को बहुत अंडरप्‍ले करते हुए गाया है, कोई कलाबाज़ी नहीं है । सुनने वालों को इंप्रेस करने की कोई कोशिश नहीं है । बस एक नर्म गाने को निभा ले जाने की कोशिश ज़रूर है । चूंकि गाना खेल-जीवन से जुड़ा है इसलिए रिदम फास्‍ट रखा गया है । ग्रुप वायलिन का बेहतरीन इस्‍तेमाल किया है वनराज भाटिया ने ।

.... इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।

आपको बता दें कि वनराज भाटिया ने बाक़ायदा वेस्‍टर्न क्‍लासिकल म्‍यूजिक की सालों-साल ट्रेनिंग की और फिलहारमोनिक ऑक्रेस्‍ट्रा में शामिल भी रहे हैं । भारतीय शास्‍त्रीय संगीत और वेस्‍टर्न क्‍लासिकल के ऐसे ज्ञाता कम ही होते हैं । वनराज भाटिया के पहले अगर ऐसा कोई ज़ोरदार नाम आता है तो वो हैं हमारे प्‍यारेलाल जी, लक्ष्‍मी-प्‍यारे की जोड़ी वाले । वो भी इस मामले में माहिर व्‍यक्ति हैं । बहरहाल...इतना तो तय है कि साढ़े तीन मिनिट के इस गाने को आप एक बार सुनकर संतुष्‍ट नहीं होंगे । बार बार सुनेंगे । मेरे ज़ेहन में तो पिछले तीन-चार दिनों से ये गीत लगातार गूंज रहा है । आप क्‍या कहते हैं । और हां इस प्‍लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्‍ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे । Happy

 

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा कहा उसे रोककर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी । आंख मिलाके बात कर ।।

रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है

मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है

मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

तेरे हज़ारों चेहरों इक चेहरा है मुझसे मिलता है

आंख का रंग मिलता है आवाज़ का अंग भी मिलता है

सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं, तू शाम मेरी मैं तेरी सहर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर ।।

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा उसे रोककर

मैंने कहा उसे रोककर ।।

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हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर-- हिप हिप हुर्रे फिल्‍म का गीत ।

कुछ गाने मन के भीतर कहीं अपनी जगह बना लेते हैं । फिर यादों की परतें चढ़ती जाती हैं और गाना कहीं भीतर दबकर रह जाता है । गाहे-बगाहे गाना इन निचली परतों के भीतर से झांककर अपनी मौजूदगी का अहसास करता रहता है...ऐसे ही एक गाने की याद किसी ने दिला दी है । मुझे याद है दूरदर्शन के ज़माने में मैंने प्रकाश झा की ये फिल्‍म बड़े ही चाव से देखी थी--'हिप हिप हुर्रे' । इस फिल्‍म में राजकिरण और दीप्‍ती नवल की जोड़ी थी । मुझे इस खेल-फिल्‍म के गाने बहुत पसंद आए थे । वक्‍त वक्‍त पर ये गीत मैं रेडियोवाणी पर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करूंगा ।

विविध भारती में आने के बाद मुझे प्रकाश झा से बातचीत का भी मौक़ा मिला और दीप्‍ती नवल से तो उनके अपने घर पर जाकर बातचीत की । दोनों ने इस फिल्‍म को बड़ी शिद्दत से याद किया । क्‍योंकि दोनों की ही जिंदगी में इस फिल्‍म के बड़ा महत्‍त्‍व रहा है । दोनों इस फिल्‍म के ज़रिए क़रीब आए थे । शादी के रास्‍ते पर चल पड़े थे ।

.... रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

विविध भारती में आने के बाद मुझे 'हिप हिप हुर्रे' के गाने तसल्‍ली से सुनने को मिले । और अब इंटरनेट पर ई स्निप्‍स से जुगाड़ कर ये गाने आप तक पहुंचाए जा रहे हैं Happy 

गुलज़ार के बोल हैं । और बहुत ख़ास हैं । संयोग देखिए कि रेडियोवाणी पर पिछली पोस्‍ट भी वनराज भाटिया के गाने की ही थी--जिसके बोल थे--'ये फासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' । और इसके फ़ौरन बाद मैं जिस गाने का जिक्र कर रहा हूं वो भी वनराज भाटिया ने ही स्‍वरबद्ध किया है । ये गुलज़ार का गीत है । ठेठ गुलज़ारी गीत । अपने व्‍याकरण और अपनी भावनाओं के लिहाज़ से अव्‍वल नंबर है ये गीत । आईये इसके संगीत की बात की जाए । येसुदास की आवाज़ है इस गाने में । यानी वनराज भाटिया, गुलज़ार और येसुदास की दुर्लभ तिकड़ी ।

vb gulzar ysd

येसुदास ने इस गाने को बहुत अंडरप्‍ले करते हुए गाया है, कोई कलाबाज़ी नहीं है । सुनने वालों को इंप्रेस करने की कोई कोशिश नहीं है । बस एक नर्म गाने को निभा ले जाने की कोशिश ज़रूर है । चूंकि गाना खेल-जीवन से जुड़ा है इसलिए रिदम फास्‍ट रखा गया है । ग्रुप वायलिन का बेहतरीन इस्‍तेमाल किया है वनराज भाटिया ने ।

.... इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।

आपको बता दें कि वनराज भाटिया ने बाक़ायदा वेस्‍टर्न क्‍लासिकल म्‍यूजिक की सालों-साल ट्रेनिंग की और फिलहारमोनिक ऑक्रेस्‍ट्रा में शामिल भी रहे हैं । भारतीय शास्‍त्रीय संगीत और वेस्‍टर्न क्‍लासिकल के ऐसे ज्ञाता कम ही होते हैं । वनराज भाटिया के पहले अगर ऐसा कोई ज़ोरदार नाम आता है तो वो हैं हमारे प्‍यारेलाल जी, लक्ष्‍मी-प्‍यारे की जोड़ी वाले । वो भी इस मामले में माहिर व्‍यक्ति हैं । बहरहाल...इतना तो तय है कि साढ़े तीन मिनिट के इस गाने को आप एक बार सुनकर संतुष्‍ट नहीं होंगे । बार बार सुनेंगे । मेरे ज़ेहन में तो पिछले तीन-चार दिनों से ये गीत लगातार गूंज रहा है । आप क्‍या कहते हैं । और हां इस प्‍लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्‍ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे । Happy

 

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा कहा उसे रोककर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी । आंख मिलाके बात कर ।।

रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है

मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है

मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।

तेरे हज़ारों चेहरों इक चेहरा है मुझसे मिलता है

आंख का रंग मिलता है आवाज़ का अंग भी मिलता है

सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं, तू शाम मेरी मैं तेरी सहर

हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिलाके बात कर ।।

एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा उसे रोककर

मैंने कहा उसे रोककर ।।

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Wednesday, January 16, 2008

रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले-फिर गुलज़ार

मैंने कई बार ये बात कही है कि कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जो बर्दाश्‍त से बाहर होती हैं, उन्‍हें आप देख ही नहीं सकते, लेकिन ऐसी ही कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जिनके कुछ गाने या हो सकता है कि जिनका एकाध गाना बहुत खूबसूरत बन पड़ता है । इसका मतलब साफ़ है कि गाने ज़्यादातर एक Independant entity की तरह होते हैं । उनका फिल्‍म से केवल विजुअल रिश्‍ता होता है, पर जब वो एक ऑडियो हैं, तो वो एक आज़ाद-ख्‍़याल की तरह होते हैं । और ये बहुत बढि़या-सी बात है ।

इसी वजह से हमें कुछ बेमिसाल गाने मिले हैं । आज मैं जो गीत लेकर आया हूं, उसकी फिल्‍म इतनी बुरी है कि किसी से बदला लेना हो तो इस फिल्‍म के साथ उसे कमरे में बंद कर दिया जाए । लेकिन दिलचस्‍प बात है कि इस फिल्‍म में गुलज़ार के गाने थे और आर डी बर्मन का संगीत । इस सबके बावजूद एक गाना ऐसा है जिसने फिल्‍म की सीमाओं को तोड़कर अपनी जगह बनाई । और गुलज़ार के अच्‍छे-प्‍यारे से गानों में ख़ुद को शामिल करवा लिया । मैं फिल्‍म 'जीवा' की बात कर रहा हूं । संजय दत्‍त और मंदाकिनी के अभिनय वाली इस फिल्‍म के निर्देशक राज एन सिप्‍पी थे । चलिए छोडि़ये इस फिल्‍म की बातें क्‍या करनी हैं । फिल्‍म संगीत के शौकीन इस गाने की फ़रमाईश करते हैं रेडियो पर । क्‍योंकि ये ज़्यादा बजता नहीं है । अगर आप कहीं बाज़ार जाकर किसी म्‍यूजिक शॉप में फिल्‍म जीवा का नाम लेंगे तो हो सकता है कि सेल्‍समैन आपको दूसरे ग्रह से आया हुआ प्राणी समझे । पर हम तो इस गाने के शैदाई हैं । वो इसलिए क्‍योंकि हम गुलज़ार के शैदाई हैं ।

बहुत अजीब-गीत है ये । जैसे गुलज़ार के ज़्यादातर गीत हुआ करते हैं । आप पढ़ेंगे तो पायेंगे कि कुल जमा तीन अंतरे हैं । संक्षिप्‍त से अंतरे । दो लाईनों वाले । लेकिन इस गाने की धुन और ऑरकेस्‍ट्रेशन कमाल है । मुझे रिदम का ये पैटर्न खासतौर पर पसंद है । पंचम ने अपने गानों में इस रिदम को काफी इस्‍तेमाल किया है । जैसे ही आप प्‍लेयर पर क्लिक करेंगे, आपको गाने का इंट्रो म्‍यूजिक एक दूसरी ही दुनिया में ले जाएगा । पता नहीं क्‍यों मन करता है कि ऐसे गानों को मिंट की गोली की तरह बस देर तक चूसते रहो, तन्‍हाई की महफि़ल सजाकर बैठे रहो और जब ये गाना हमसे बात करे तो कोई दूसरा कुछ ना बोले ।

एक और मज़ेदार बात । इस गाने में आशा भोसले के सहगायक हैं अमित कुमार । जो सिर्फ़ दो लाईनें गाने के लिए ही आते हैं । जब आशा जी इन पंक्तियों को गा लेती हैं--जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ...तो आते हैं अमित कुमार मुखड़ा गाने के लिए । और एक रिलीफ़ की तरह आती है उनकी आवाज़ । उनके हिस्‍से में गाने का आखि़री अंतरा ही आया है । बस....। पर अच्‍छा लगता है । 'बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है । गुलज़ार की कल्‍पनाओं की उड़ान भी बहुत ही आवारगी भरी है । अब बस यही कहना बाक़ी है कि अगर आपके जीवन में इन पंक्तियों को पढ़ने के साथ-साथ पूरे आठ मिनिट का समय हो तो इस गाने को सुनिएगा । थोड़ा-सा लंबा है ये गीत । सुनिए और बताईये क्‍या आपको भी ये उतना ही पसंद है जितना मुझे ।  

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रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले

रात भर काजल जले

आंख में जिस तरह ख्‍वाब का दिया जले ।।

जब से तुम्‍हारे नाम की मिसरी होंठ लगाई है

मीठा-सा ग़म है और मीठी-सी तनहाई है

रोज़-रोज़ आंखों तले ।।

छोटी-सी दिल की उलझन है ये सुलझा दो तुम

जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

आंखों पर कुछ ऐसे तुमने ज़ुल्‍फ़ गिरा दी है

बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

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रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले-फिर गुलज़ार

मैंने कई बार ये बात कही है कि कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जो बर्दाश्‍त से बाहर होती हैं, उन्‍हें आप देख ही नहीं सकते, लेकिन ऐसी ही कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं जिनके कुछ गाने या हो सकता है कि जिनका एकाध गाना बहुत खूबसूरत बन पड़ता है । इसका मतलब साफ़ है कि गाने ज़्यादातर एक Independant entity की तरह होते हैं । उनका फिल्‍म से केवल विजुअल रिश्‍ता होता है, पर जब वो एक ऑडियो हैं, तो वो एक आज़ाद-ख्‍़याल की तरह होते हैं । और ये बहुत बढि़या-सी बात है ।

इसी वजह से हमें कुछ बेमिसाल गाने मिले हैं । आज मैं जो गीत लेकर आया हूं, उसकी फिल्‍म इतनी बुरी है कि किसी से बदला लेना हो तो इस फिल्‍म के साथ उसे कमरे में बंद कर दिया जाए । लेकिन दिलचस्‍प बात है कि इस फिल्‍म में गुलज़ार के गाने थे और आर डी बर्मन का संगीत । इस सबके बावजूद एक गाना ऐसा है जिसने फिल्‍म की सीमाओं को तोड़कर अपनी जगह बनाई । और गुलज़ार के अच्‍छे-प्‍यारे से गानों में ख़ुद को शामिल करवा लिया । मैं फिल्‍म 'जीवा' की बात कर रहा हूं । संजय दत्‍त और मंदाकिनी के अभिनय वाली इस फिल्‍म के निर्देशक राज एन सिप्‍पी थे । चलिए छोडि़ये इस फिल्‍म की बातें क्‍या करनी हैं । फिल्‍म संगीत के शौकीन इस गाने की फ़रमाईश करते हैं रेडियो पर । क्‍योंकि ये ज़्यादा बजता नहीं है । अगर आप कहीं बाज़ार जाकर किसी म्‍यूजिक शॉप में फिल्‍म जीवा का नाम लेंगे तो हो सकता है कि सेल्‍समैन आपको दूसरे ग्रह से आया हुआ प्राणी समझे । पर हम तो इस गाने के शैदाई हैं । वो इसलिए क्‍योंकि हम गुलज़ार के शैदाई हैं ।

बहुत अजीब-गीत है ये । जैसे गुलज़ार के ज़्यादातर गीत हुआ करते हैं । आप पढ़ेंगे तो पायेंगे कि कुल जमा तीन अंतरे हैं । संक्षिप्‍त से अंतरे । दो लाईनों वाले । लेकिन इस गाने की धुन और ऑरकेस्‍ट्रेशन कमाल है । मुझे रिदम का ये पैटर्न खासतौर पर पसंद है । पंचम ने अपने गानों में इस रिदम को काफी इस्‍तेमाल किया है । जैसे ही आप प्‍लेयर पर क्लिक करेंगे, आपको गाने का इंट्रो म्‍यूजिक एक दूसरी ही दुनिया में ले जाएगा । पता नहीं क्‍यों मन करता है कि ऐसे गानों को मिंट की गोली की तरह बस देर तक चूसते रहो, तन्‍हाई की महफि़ल सजाकर बैठे रहो और जब ये गाना हमसे बात करे तो कोई दूसरा कुछ ना बोले ।

एक और मज़ेदार बात । इस गाने में आशा भोसले के सहगायक हैं अमित कुमार । जो सिर्फ़ दो लाईनें गाने के लिए ही आते हैं । जब आशा जी इन पंक्तियों को गा लेती हैं--जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ...तो आते हैं अमित कुमार मुखड़ा गाने के लिए । और एक रिलीफ़ की तरह आती है उनकी आवाज़ । उनके हिस्‍से में गाने का आखि़री अंतरा ही आया है । बस....। पर अच्‍छा लगता है । 'बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है । गुलज़ार की कल्‍पनाओं की उड़ान भी बहुत ही आवारगी भरी है । अब बस यही कहना बाक़ी है कि अगर आपके जीवन में इन पंक्तियों को पढ़ने के साथ-साथ पूरे आठ मिनिट का समय हो तो इस गाने को सुनिएगा । थोड़ा-सा लंबा है ये गीत । सुनिए और बताईये क्‍या आपको भी ये उतना ही पसंद है जितना मुझे ।  

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रोज़ रोज़ आंखों तले एक ही सपना चले

रात भर काजल जले

आंख में जिस तरह ख्‍वाब का दिया जले ।।

जब से तुम्‍हारे नाम की मिसरी होंठ लगाई है

मीठा-सा ग़म है और मीठी-सी तनहाई है

रोज़-रोज़ आंखों तले ।।

छोटी-सी दिल की उलझन है ये सुलझा दो तुम

जीना तो सीखा है मरके, मरना सिखा दो तुम ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

आंखों पर कुछ ऐसे तुमने ज़ुल्‍फ़ गिरा दी है

बेचारे से कुछ ख्‍़वाबों की नींद उड़ा दी है ।।

रोज़ रोज़ आंखों तले ।।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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