रेडियोवाणी पर मेरी ओर से आप सभी को होली की शुभकामनाएं । होली पर मैं आपको कोई ऐसा गीत नहीं सुनवाना चाहता था जो दिन भर कहीं और से आपको सुनाई देता रहे । संयोग देखिए कि अलग तरह के गीतों के लिए पिछले कुछ महीनों से रेडियोवाणी पर हमें बार बार वनराज भाटिया की ओर लौटना पड़ रहा है । इस बार फिर वनराज भाटिया के संगीत की शरण में जाकर रेडियोवाणी आपके लिए गुलाल भेज रहा है ।
ये सरदारी बेगम फिल्म का गीत है । जो सन 1996 में आई थी । दरअसल ये श्याम बेनेगल की एक फिल्म-त्रयी यानी triology का हिस्सा है । मम्मो, सरदारी बेगम और ज़ुबेदा ये तीनों इस फिल्म-त्रयी का हिस्सा हैं । जिन्हें विख्यात फिल्म-समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद ने लिखा था ।
.... की जो उन्होंने अगर जोरा-जोरी छीनी पिचकारी बैंया मरोरी गारी मैंने रखी हैं रटके ।।
दिलचस्प बात ये है कि इन तीनों फिल्मों में कुछ दृश्य और स्थितियां एक जैसी हैं । अगर आपने ये तीनों फिल्में नहीं देखी हैं या देखी भी हैं तो भी एक बार फिर से देखिए और एक के बाद एक देखिए । बहरहाल एक बार फिर चलते हैं होली गीत की ओर । सरदारी बेगम के गीत लिखे थे जावेद अख़्तर ने । इस गाने को फिल्म में होली-गीत के तौर पर नहीं फिल्माया गया । बल्कि सरदारी बेगम इसे मंच पर गाती हैं ।
इस गाने के दो संस्करण हैं । एक आशा भोसले वाला और दूसरा आरती अंकलीकर वाला । मुझे दूसरा संस्करण ज्यादा पसंद है इसलिए होली के मौक़े पर आईये इस गाने के ज़रिए रसवर्षा में सराबोर हो जाया जाए ।
रेडियोवाणी पर मेरी ओर से आप सभी को होली की शुभकामनाएं । होली पर मैं आपको कोई ऐसा गीत नहीं सुनवाना चाहता था जो दिन भर कहीं और से आपको सुनाई देता रहे । संयोग देखिए कि अलग तरह के गीतों के लिए पिछले कुछ महीनों से रेडियोवाणी पर हमें बार बार वनराज भाटिया की ओर लौटना पड़ रहा है । इस बार फिर वनराज भाटिया के संगीत की शरण में जाकर रेडियोवाणी आपके लिए गुलाल भेज रहा है ।
ये सरदारी बेगम फिल्म का गीत है । जो सन 1996 में आई थी । दरअसल ये श्याम बेनेगल की एक फिल्म-त्रयी यानी triology का हिस्सा है । मम्मो, सरदारी बेगम और ज़ुबेदा ये तीनों इस फिल्म-त्रयी का हिस्सा हैं । जिन्हें विख्यात फिल्म-समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद ने लिखा था ।
.... की जो उन्होंने अगर जोरा-जोरी छीनी पिचकारी बैंया मरोरी गारी मैंने रखी हैं रटके ।।
दिलचस्प बात ये है कि इन तीनों फिल्मों में कुछ दृश्य और स्थितियां एक जैसी हैं । अगर आपने ये तीनों फिल्में नहीं देखी हैं या देखी भी हैं तो भी एक बार फिर से देखिए और एक के बाद एक देखिए । बहरहाल एक बार फिर चलते हैं होली गीत की ओर । सरदारी बेगम के गीत लिखे थे जावेद अख़्तर ने । इस गाने को फिल्म में होली-गीत के तौर पर नहीं फिल्माया गया । बल्कि सरदारी बेगम इसे मंच पर गाती हैं ।
इस गाने के दो संस्करण हैं । एक आशा भोसले वाला और दूसरा आरती अंकलीकर वाला । मुझे दूसरा संस्करण ज्यादा पसंद है इसलिए होली के मौक़े पर आईये इस गाने के ज़रिए रसवर्षा में सराबोर हो जाया जाए ।
कुछ गाने मन के भीतर कहीं अपनी जगह बना लेते हैं । फिर यादों की परतें चढ़ती जाती हैं और गाना कहीं भीतर दबकर रह जाता है । गाहे-बगाहे गाना इन निचली परतों के भीतर से झांककर अपनी मौजूदगी का अहसास करता रहता है...ऐसे ही एक गाने की याद किसी ने दिला दी है । मुझे याद है दूरदर्शन के ज़माने में मैंने प्रकाश झा की ये फिल्म बड़े ही चाव से देखी थी--'हिप हिप हुर्रे' । इस फिल्म में राजकिरण और दीप्ती नवल की जोड़ी थी । मुझे इस खेल-फिल्म के गाने बहुत पसंद आए थे । वक्त वक्त पर ये गीत मैं रेडियोवाणी पर प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा ।
विविध भारती में आने के बाद मुझे प्रकाश झा से बातचीत का भी मौक़ा मिला और दीप्ती नवल से तो उनके अपने घर पर जाकर बातचीत की । दोनों ने इस फिल्म को बड़ी शिद्दत से याद किया । क्योंकि दोनों की ही जिंदगी में इस फिल्म के बड़ा महत्त्व रहा है । दोनों इस फिल्म के ज़रिए क़रीब आए थे । शादी के रास्ते पर चल पड़े थे ।
.... रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।
विविध भारती में आने के बाद मुझे 'हिप हिप हुर्रे' के गाने तसल्ली से सुनने को मिले । और अब इंटरनेट पर ई स्निप्स से जुगाड़ कर ये गाने आप तक पहुंचाए जा रहे हैं
गुलज़ार के बोल हैं । और बहुत ख़ास हैं । संयोग देखिए कि रेडियोवाणी पर पिछली पोस्ट भी वनराज भाटिया के गाने की ही थी--जिसके बोल थे--'ये फासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' । और इसके फ़ौरन बाद मैं जिस गाने का जिक्र कर रहा हूं वो भी वनराज भाटिया ने ही स्वरबद्ध किया है । ये गुलज़ार का गीत है । ठेठ गुलज़ारी गीत । अपने व्याकरण और अपनी भावनाओं के लिहाज़ से अव्वल नंबर है ये गीत । आईये इसके संगीत की बात की जाए । येसुदास की आवाज़ है इस गाने में । यानी वनराज भाटिया, गुलज़ार और येसुदास की दुर्लभ तिकड़ी ।
येसुदास ने इस गाने को बहुत अंडरप्ले करते हुए गाया है, कोई कलाबाज़ी नहीं है । सुनने वालों को इंप्रेस करने की कोई कोशिश नहीं है । बस एक नर्म गाने को निभा ले जाने की कोशिश ज़रूर है । चूंकि गाना खेल-जीवन से जुड़ा है इसलिए रिदम फास्ट रखा गया है । ग्रुप वायलिन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है वनराज भाटिया ने ।
.... इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।
आपको बता दें कि वनराज भाटिया ने बाक़ायदा वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की सालों-साल ट्रेनिंग की और फिलहारमोनिक ऑक्रेस्ट्रा में शामिल भी रहे हैं । भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न क्लासिकल के ऐसे ज्ञाता कम ही होते हैं । वनराज भाटिया के पहले अगर ऐसा कोई ज़ोरदार नाम आता है तो वो हैं हमारे प्यारेलाल जी, लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी वाले । वो भी इस मामले में माहिर व्यक्ति हैं । बहरहाल...इतना तो तय है कि साढ़े तीन मिनिट के इस गाने को आप एक बार सुनकर संतुष्ट नहीं होंगे । बार बार सुनेंगे । मेरे ज़ेहन में तो पिछले तीन-चार दिनों से ये गीत लगातार गूंज रहा है । आप क्या कहते हैं । और हां इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।
एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा कहा उसे रोककर
हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी । आंख मिलाके बात कर ।।
रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है
मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है
मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र
हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।
तेरे हज़ारों चेहरों इक चेहरा है मुझसे मिलता है
आंख का रंग मिलता है आवाज़ का अंग भी मिलता है
सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं, तू शाम मेरी मैं तेरी सहर
कुछ गाने मन के भीतर कहीं अपनी जगह बना लेते हैं । फिर यादों की परतें चढ़ती जाती हैं और गाना कहीं भीतर दबकर रह जाता है । गाहे-बगाहे गाना इन निचली परतों के भीतर से झांककर अपनी मौजूदगी का अहसास करता रहता है...ऐसे ही एक गाने की याद किसी ने दिला दी है । मुझे याद है दूरदर्शन के ज़माने में मैंने प्रकाश झा की ये फिल्म बड़े ही चाव से देखी थी--'हिप हिप हुर्रे' । इस फिल्म में राजकिरण और दीप्ती नवल की जोड़ी थी । मुझे इस खेल-फिल्म के गाने बहुत पसंद आए थे । वक्त वक्त पर ये गीत मैं रेडियोवाणी पर प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा ।
विविध भारती में आने के बाद मुझे प्रकाश झा से बातचीत का भी मौक़ा मिला और दीप्ती नवल से तो उनके अपने घर पर जाकर बातचीत की । दोनों ने इस फिल्म को बड़ी शिद्दत से याद किया । क्योंकि दोनों की ही जिंदगी में इस फिल्म के बड़ा महत्त्व रहा है । दोनों इस फिल्म के ज़रिए क़रीब आए थे । शादी के रास्ते पर चल पड़े थे ।
.... रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।
विविध भारती में आने के बाद मुझे 'हिप हिप हुर्रे' के गाने तसल्ली से सुनने को मिले । और अब इंटरनेट पर ई स्निप्स से जुगाड़ कर ये गाने आप तक पहुंचाए जा रहे हैं
गुलज़ार के बोल हैं । और बहुत ख़ास हैं । संयोग देखिए कि रेडियोवाणी पर पिछली पोस्ट भी वनराज भाटिया के गाने की ही थी--जिसके बोल थे--'ये फासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' । और इसके फ़ौरन बाद मैं जिस गाने का जिक्र कर रहा हूं वो भी वनराज भाटिया ने ही स्वरबद्ध किया है । ये गुलज़ार का गीत है । ठेठ गुलज़ारी गीत । अपने व्याकरण और अपनी भावनाओं के लिहाज़ से अव्वल नंबर है ये गीत । आईये इसके संगीत की बात की जाए । येसुदास की आवाज़ है इस गाने में । यानी वनराज भाटिया, गुलज़ार और येसुदास की दुर्लभ तिकड़ी ।
येसुदास ने इस गाने को बहुत अंडरप्ले करते हुए गाया है, कोई कलाबाज़ी नहीं है । सुनने वालों को इंप्रेस करने की कोई कोशिश नहीं है । बस एक नर्म गाने को निभा ले जाने की कोशिश ज़रूर है । चूंकि गाना खेल-जीवन से जुड़ा है इसलिए रिदम फास्ट रखा गया है । ग्रुप वायलिन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है वनराज भाटिया ने ।
.... इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।
आपको बता दें कि वनराज भाटिया ने बाक़ायदा वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की सालों-साल ट्रेनिंग की और फिलहारमोनिक ऑक्रेस्ट्रा में शामिल भी रहे हैं । भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न क्लासिकल के ऐसे ज्ञाता कम ही होते हैं । वनराज भाटिया के पहले अगर ऐसा कोई ज़ोरदार नाम आता है तो वो हैं हमारे प्यारेलाल जी, लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी वाले । वो भी इस मामले में माहिर व्यक्ति हैं । बहरहाल...इतना तो तय है कि साढ़े तीन मिनिट के इस गाने को आप एक बार सुनकर संतुष्ट नहीं होंगे । बार बार सुनेंगे । मेरे ज़ेहन में तो पिछले तीन-चार दिनों से ये गीत लगातार गूंज रहा है । आप क्या कहते हैं । और हां इस प्लेयर के बारे में भी राय दीजिएगा । इंटरनेट आर्काइव पर मिल गया और स्ट्रीमिंग में तेज़ तो लग ही रहा है । मुद्दा ये भी है कि संभवत: इस पर राईट क्लिक करके आप गाने को डाउनलोड कर सकेंगे ।
एक सुबह एक मोड़ पर मैंने कहा कहा उसे रोककर
हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी । आंख मिलाके बात कर ।।
रोज़ तेरे जीने के लिए एक सुबह मुझे मिल जाती है
मुरझाती है...कोई शाम अगर तो रात कोई खिल जाती है
मैं रोज़ सुबह तक आता हूं और रोज़ शुरू करता हूं सफ़र
हाथ बढ़ा ऐ जिंदगी आंख मिला के बात कर ।।
तेरे हज़ारों चेहरों इक चेहरा है मुझसे मिलता है
आंख का रंग मिलता है आवाज़ का अंग भी मिलता है
सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं, तू शाम मेरी मैं तेरी सहर
पिछले दिनों निहारिका का संदेश आया कि जगजीत सिंह की ग़ज़ल 'ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' अगर कहीं से मिल जाए तो सुनवाईये । फौरन ज़ेहन में ये ग़ज़ल तैर गयी । याददाश्त पर ज़ोर डाला तो इतना तो याद आया कि ये किसी फिल्म में शामिल थी, पर फिल्म का नाम याद ही ना आए । आखि़रकार इंटरनेटी-छानबीन से पता चला कि इसे श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म 'मम्मो' में शामिल किया था ।
सन 1994 में आई ये फिल्म विभाजन के बहुत बरस बाद भी सरहद के दोनों तरफ मौजूद लोगों की आपस में मिलने की कसक को बयान करती है । सरहद रिश्तों के बीच आकर खड़ी हो गयी है । सरहद अपनों को अपनों से मिलने के लिए रोक रही है । लेकिन मम्मो इस सरहद को नहीं मानती । मम्मो इस सरहद से अपने ही तरीक़े से बग़ावत करती है । अगर आपने ये फिल्म अभी तक नहीं देखी है तो ज़रा यहां क्लिक कीजिए और यहां भी ।
बहरहाल....इस ग़ज़ल को सुनवाने से पहले इसकी पृष्ठभूमि बतानी ज़रूरी थी, अब आपके लिए इस ग़ज़ल का हर शेर एक गहरा दर्शन बन जाएगा । आपको बता दूं कि ये ग़ज़ल कहीं भी....जी हां कहीं भी उपलब्ध नहीं है । दिक्कत ये है कि श्याम बेनेगल अपनी फिल्मों के संगीत के लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं रहते । उनकी कई फिल्मों का संगीत रिलीज़ भी नहीं किया गया । मम्मो की ये ग़ज़ल फिल्म में भी ज़रा-सी ही इस्तेमाल की गयी है ।
.... ये कैसी सरहदें उलझी हुई हैं पैरों में........हम अपने घर की तरफ उठके बार बार चले ।
पर संगीतकार वनराज भाटिया के ख़ज़ाने से ये ग़ज़ल आप तक पहुंच रही है । हम बेहद शुक्रगुज़ार हैं उनके....जो उन्होंने ये अनमोल मोती हमें दिए । उनके चाहने वालों के लिए ये एक अनमोल नज़राना है । इंटरनेट पर मैंने देखा कि बरसों बरस से लोग इसे खोज खोजकर परेशान हैं और उन्हें ये ग़ज़ल मिल नहीं रही । बडी शिद्दत से किसी गीत को खोजते रहने की विकलता मैं समझ सकता हूं । मेरे पास ऐसे गीतों की लंबी फेहरिस्त है....जो अभी तक मिले नहीं...जिनकी खोज जारी है ।
जगजीत सिंह ने इस ग़ज़ल को बहुत ख़ूबसूरती से गाया है । ये गुलज़ार की रचना है....। आईये इस ग़ज़ल से होकर गुज़रें । इसे बार बार सुनें ।
पिछले दिनों निहारिका का संदेश आया कि जगजीत सिंह की ग़ज़ल 'ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय ना हुए' अगर कहीं से मिल जाए तो सुनवाईये । फौरन ज़ेहन में ये ग़ज़ल तैर गयी । याददाश्त पर ज़ोर डाला तो इतना तो याद आया कि ये किसी फिल्म में शामिल थी, पर फिल्म का नाम याद ही ना आए । आखि़रकार इंटरनेटी-छानबीन से पता चला कि इसे श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म 'मम्मो' में शामिल किया था ।
सन 1994 में आई ये फिल्म विभाजन के बहुत बरस बाद भी सरहद के दोनों तरफ मौजूद लोगों की आपस में मिलने की कसक को बयान करती है । सरहद रिश्तों के बीच आकर खड़ी हो गयी है । सरहद अपनों को अपनों से मिलने के लिए रोक रही है । लेकिन मम्मो इस सरहद को नहीं मानती । मम्मो इस सरहद से अपने ही तरीक़े से बग़ावत करती है । अगर आपने ये फिल्म अभी तक नहीं देखी है तो ज़रा यहां क्लिक कीजिए और यहां भी ।
बहरहाल....इस ग़ज़ल को सुनवाने से पहले इसकी पृष्ठभूमि बतानी ज़रूरी थी, अब आपके लिए इस ग़ज़ल का हर शेर एक गहरा दर्शन बन जाएगा । आपको बता दूं कि ये ग़ज़ल कहीं भी....जी हां कहीं भी उपलब्ध नहीं है । दिक्कत ये है कि श्याम बेनेगल अपनी फिल्मों के संगीत के लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं रहते । उनकी कई फिल्मों का संगीत रिलीज़ भी नहीं किया गया । मम्मो की ये ग़ज़ल फिल्म में भी ज़रा-सी ही इस्तेमाल की गयी है ।
.... ये कैसी सरहदें उलझी हुई हैं पैरों में........हम अपने घर की तरफ उठके बार बार चले ।
पर संगीतकार वनराज भाटिया के ख़ज़ाने से ये ग़ज़ल आप तक पहुंच रही है । हम बेहद शुक्रगुज़ार हैं उनके....जो उन्होंने ये अनमोल मोती हमें दिए । उनके चाहने वालों के लिए ये एक अनमोल नज़राना है । इंटरनेट पर मैंने देखा कि बरसों बरस से लोग इसे खोज खोजकर परेशान हैं और उन्हें ये ग़ज़ल मिल नहीं रही । बडी शिद्दत से किसी गीत को खोजते रहने की विकलता मैं समझ सकता हूं । मेरे पास ऐसे गीतों की लंबी फेहरिस्त है....जो अभी तक मिले नहीं...जिनकी खोज जारी है ।
जगजीत सिंह ने इस ग़ज़ल को बहुत ख़ूबसूरती से गाया है । ये गुलज़ार की रचना है....। आईये इस ग़ज़ल से होकर गुज़रें । इसे बार बार सुनें ।