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Monday, October 1, 2007

फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' पर मेरी पोस्‍ट और उसके बाद हुई संदर्भों की सैर

आपको याद होगा-मैंने फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' के पचास वर्ष पूरे होने पर एक पोस्‍ट लिखी थी । जिसमें बताया था कि इस फिल्‍म की कहानी वी शांताराम के दोस्‍त जी डी माडगुळकर का जिक्र किया था । चूंकि मराठी भाषा और साहित्‍य से बहुत मामूली सा परिचय है इसलिए ना तो मैं माडगुळकर जी को जानता था और ना ही उनके नाम का सही उच्‍चारण जानता था । इसलिए ब्‍लॉग और रेडियो के ज़रिए मित्र बने भाई विकास शुक्‍ला ने मुझे तुरंत ज्ञान बिड़ी पिलाई ( नये लोग कृपया ज्ञान बिड़ी का संदर्भ समझ लें, जब भी कोई गंभीरता से ज्ञानवर्धन करे तो हम उसे टॉर्च दिखाने वाला या ज्ञान बिड़ी पिलाने वाला कहते हैं,रोज़ इलाहाबाद से ज्ञानदत्‍त जी हमें ज्ञानबिड़ी पिलाते हैं । टॉर्च दिखाने का संदर्भ परसाई जी की कहानी 'टॉर्च बेचने वाला' से हमारी जिंदगी में आया है )और ये टिप्‍पणी की ।

युनूस भाई,
आप बडे ही रोचक और दिलचस्प विषय निकाल लाते है.
ये फिल्म हमारे ही थिएटर में लगी थी और खूब चली थी. मै तब छोटा था मगर इसे रोज देखता था. इस फिल्म के सारे गीत मुझे याद हो गये थे जो अब तक याद है.इस फिल्म के कहानीकार का नाम आपने थोडा-सा गलत लिखा है. आपको मराठी साहित्य के बारे में ज्‍यादा जानकारी होना वैसे भी असंभव है. उनका नाम था " ग. दि. माडगूळकर".उन्हे मराठी का वाल्मिकी कहा जाता था. उनकी लिखी और सुधीर फडके द्वारा संगीत देकर गायी गयी "गीतरामायण " ये रामायण पर आधारित गीतों की शृंखला महाराष्ट्र मे गजब की लोकप्रिय थी और गीतरामायण के रिकार्ड का सेट अपने घरमे रखना एक प्रतिष्ठा की वस्तू मानी जाती थी.मराठी फिल्मों के इतिहास में ग.दी. माडगूळकर, राजा परांजपे और सुधीर फडके इन तीनों ने मिलके बडी लंबी इनिंग खेली है और बडी यादगार फिल्मे दी है.

इसे पढ़ते ही दिल में घंटी बजी । खासकर 'हमारे ही थियेटर में लगी थी' वाले वाक्‍य से । मैंने तुरंत विकास शुक्‍ल को संदेस भेजा । इस मामले पर प्रकाश डालें और माडगुळकर जी के बारे में ज्ञान दें । विकास भाई ने हमारा निवेदन स्‍वीकार किया और जो कुछ लिखा उसे वैसा का वैसा आपके सामने पेश कर रहा हूं । दिलचस्‍प बात ये है कि कई बार जीवन में संदर्भों की कडि़यां कहानी को कहां से कहां ले जाती हैं । मैं आज इस पोस्‍ट के साथ फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' के शेष गीत देना चाह रहा था । लेकिन विकास ने कुछ ऐसे गीतों का जिक्र किया है, जिन्‍हें मैंने जन्‍म-जिंदगी मे कभी नहीं सुना । लेकिन फिर खोजा तो मिल गये ।


युनूस भाई,
आपकी प्रतिक्रिया के बारे में धन्यवाद. चालीसगांव नाम का छोटा सा शहर है जो महाराष्ट्र के जलगांव जिले में हैं. मैं वहीं पर जन्मा, पढ़ा लिखा, बड़ा हुआ और आज भी वहीं पर रहता हूं. १९५२ में मेरे पिताजी ने,जो कि पेशे से वकील थे, यहां पर सिनेमा थिएटर शुरू किया. पहली फिल्म लगी थी 'गुळाचा गणपती'. यह फिल्म मराठी के बेजोड लेखक कै. पु.ल.देशपांडे द्वारा बनाई गई थी. लेखन, दिग्दर्शन, संगीत और अभिनय सब कुछ पु.ल. का था. वे मराठी के पी.जी.वुडहाउस माने जाने थे और बेहद लोकप्रिय रहे. आज तक वैसी लोकप्रियता कोई हासिल नही कर सका है. इस फिल्म का एक गीत ग.दि.माडगुळकरजी ने लिखा था और पं.भीमसेन जोशी जी ने गाया था जो आज तक कमाल का लोकप्रिय है. शायद आपने भी सुना हो.'इंद्रायणी काठी, देवाची आळंदी, लागली समाधी, ज्ञानेशाची.'

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मेरा जन्म १९५८ मे हुआ । उसके पहले अनारकली, नागिन आदि हिट फिल्मे हमारे ही थिएटर में प्रदर्शित हुई और री-रन होती गयी. मेरी मां जब उनकी यादें सुनाती थी तब हम बच्चे सुनते रह जाते थे. नागिन के 'मन डोले मेरा तन डोले' गीत में जब बीन बजती थी तब लोग पागल हो जाते थे और परदे पर पैसे बरसाते थे. किसी मनोरुग्ण दर्शक के शरीर में नागदेवता पधारते थे और वो नाग-सांप की तरह जमीन पर लोटने लगता था.हमारा बचपन तो बस फिल्में देखते देखते ही गुजरा. कोई भी फिल्म कम से कम ३-४ हफ्ते तो चलती ही थी. हमारे थिएटर के अलावा और २ थिएटर्स थे । हमारी वाली देखकर बोर हो गये तो वहां चले गये.

१९८६ मे अंतरधर्म विवाह के बाद मै परिवार से अलग हो गया और थिएटर से संबंध नही रहा. १९९९ मे पिताजी और छोटे भाई की मृत्यू के बाद फिर थिएटर की जिंम्मेदारी मुझ पर आ गयी. लेकिन तब तक सिंगल स्क्रीन थिएटर्स मृत्यूशैया पर पहुंच चुके थे. स्टेट बैंक की मेरी नौकरी छोडकर मैंने थिएटर का बिजनेस चलाने की कोशिश की. मगर बिजनेस डूबती नैय्या बन चुका था. सो गत वर्ष उसे हमेशा के लिये बंद कर दिया.

ग.दि.माडगुळकर जी के बारे में जी करता है आपको सामने बिठाऊं और उनकी मराठी कविताओं का रसपान करवाऊं ।
वे इन्स्टंट शायर थे. चुटकी बजाते ही गीत हाजिर कर देते थे. और वो भी कमाल की रचना. आज उनकी बस एक ही बात कहुंगा. सी. रामचंद्र जी ने एक मराठी फिल्म बनाई थी. घरकुल. जो मैन-वुमन एण्ड चाइल्ड पे आधारित थी. शेखर कपूर की मासूम भी उसी पर आधारित है. उसका संगीत भी उन्हीं ने दिया था. इस फिल्म में माडगुळकरजी की एक कविता का इस्तमाल किया गया था. कविता का नाम था 'जोगिया' (ये हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक राग है) तवायफ की महफिल खत्म हो जाने के बाद जो माहौल बचता है उसका वर्णन किया गया है इस कविता में. प्रारंभ के बोल है 'कोन्यात झोपली सतार, सरला रंग...पसरली पैंजणे सैल टाकुनी अंग ॥ दुमडला गालिचा तक्के झुकले खाली...तबकात राहिले देठ, लवंगा, साली ॥ ये गीत फैय्याज जी ने गाया है. फैय्याज उप-शास्त्रीय संगीत गाती है और नाट्य कलाकार है.) शब्दों का मतलब और कविता का भाव शायद आपकी समझ मे आ रहा होगा. ये गीत या ये पूरी कविता अगर मुझे मिली तो मै आपको जरूर सुनाऊंगा और हिंदी में मतलब समझाऊंगा. कमाल का गाना है.
सी.रामचंद्रजी ने कमाल का संगीत दिया है.


इस टिप्‍पणी को पढ़ने के बाद मुझे मडगुळकर की कविता तो मिल गयी । ये रहा अता-पता
http://gadima.com/jogia/index.php
जहां जाकर आप रीयल प्‍लेयर पर इसे सुन सकते हैं ।
लेकिन ये फैयाज़ वाला संस्‍करण नहीं है । और हां अगर आप मडगुळकर के बारे में ज्‍यादा जानना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें । या फिर यहां जायें--http://gadima.com/ ये ग डि माडगुळकर पर केंद्रित वेबसाईट है । खेद है कि हिंदी में ऐसा काम ज्‍यादा क्‍यों नहीं हो रहा है ।

दो आंखें बारह हाथ का संदर्भ जारी है । जल्‍दी ही इस फिल्‍म के बचे हुए गीत लेकर हाजिर होता हूं ।

कहानी कहां से चली और कहां पहुंच गयी । संदर्भों की सैर आपको कैसी लगी ।


इस संदर्भ की पहली पोस्‍ट--वी शांताराम की फिल्‍म दो आंखें बारह हाथ को हुए पचास साल

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फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' पर मेरी पोस्‍ट और उसके बाद हुई संदर्भों की सैर

आपको याद होगा-मैंने फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' के पचास वर्ष पूरे होने पर एक पोस्‍ट लिखी थी । जिसमें बताया था कि इस फिल्‍म की कहानी वी शांताराम के दोस्‍त जी डी माडगुळकर का जिक्र किया था । चूंकि मराठी भाषा और साहित्‍य से बहुत मामूली सा परिचय है इसलिए ना तो मैं माडगुळकर जी को जानता था और ना ही उनके नाम का सही उच्‍चारण जानता था । इसलिए ब्‍लॉग और रेडियो के ज़रिए मित्र बने भाई विकास शुक्‍ला ने मुझे तुरंत ज्ञान बिड़ी पिलाई ( नये लोग कृपया ज्ञान बिड़ी का संदर्भ समझ लें, जब भी कोई गंभीरता से ज्ञानवर्धन करे तो हम उसे टॉर्च दिखाने वाला या ज्ञान बिड़ी पिलाने वाला कहते हैं,रोज़ इलाहाबाद से ज्ञानदत्‍त जी हमें ज्ञानबिड़ी पिलाते हैं । टॉर्च दिखाने का संदर्भ परसाई जी की कहानी 'टॉर्च बेचने वाला' से हमारी जिंदगी में आया है )और ये टिप्‍पणी की ।

युनूस भाई,
आप बडे ही रोचक और दिलचस्प विषय निकाल लाते है.
ये फिल्म हमारे ही थिएटर में लगी थी और खूब चली थी. मै तब छोटा था मगर इसे रोज देखता था. इस फिल्म के सारे गीत मुझे याद हो गये थे जो अब तक याद है.इस फिल्म के कहानीकार का नाम आपने थोडा-सा गलत लिखा है. आपको मराठी साहित्य के बारे में ज्‍यादा जानकारी होना वैसे भी असंभव है. उनका नाम था " ग. दि. माडगूळकर".उन्हे मराठी का वाल्मिकी कहा जाता था. उनकी लिखी और सुधीर फडके द्वारा संगीत देकर गायी गयी "गीतरामायण " ये रामायण पर आधारित गीतों की शृंखला महाराष्ट्र मे गजब की लोकप्रिय थी और गीतरामायण के रिकार्ड का सेट अपने घरमे रखना एक प्रतिष्ठा की वस्तू मानी जाती थी.मराठी फिल्मों के इतिहास में ग.दी. माडगूळकर, राजा परांजपे और सुधीर फडके इन तीनों ने मिलके बडी लंबी इनिंग खेली है और बडी यादगार फिल्मे दी है.

इसे पढ़ते ही दिल में घंटी बजी । खासकर 'हमारे ही थियेटर में लगी थी' वाले वाक्‍य से । मैंने तुरंत विकास शुक्‍ल को संदेस भेजा । इस मामले पर प्रकाश डालें और माडगुळकर जी के बारे में ज्ञान दें । विकास भाई ने हमारा निवेदन स्‍वीकार किया और जो कुछ लिखा उसे वैसा का वैसा आपके सामने पेश कर रहा हूं । दिलचस्‍प बात ये है कि कई बार जीवन में संदर्भों की कडि़यां कहानी को कहां से कहां ले जाती हैं । मैं आज इस पोस्‍ट के साथ फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' के शेष गीत देना चाह रहा था । लेकिन विकास ने कुछ ऐसे गीतों का जिक्र किया है, जिन्‍हें मैंने जन्‍म-जिंदगी मे कभी नहीं सुना । लेकिन फिर खोजा तो मिल गये ।


युनूस भाई,
आपकी प्रतिक्रिया के बारे में धन्यवाद. चालीसगांव नाम का छोटा सा शहर है जो महाराष्ट्र के जलगांव जिले में हैं. मैं वहीं पर जन्मा, पढ़ा लिखा, बड़ा हुआ और आज भी वहीं पर रहता हूं. १९५२ में मेरे पिताजी ने,जो कि पेशे से वकील थे, यहां पर सिनेमा थिएटर शुरू किया. पहली फिल्म लगी थी 'गुळाचा गणपती'. यह फिल्म मराठी के बेजोड लेखक कै. पु.ल.देशपांडे द्वारा बनाई गई थी. लेखन, दिग्दर्शन, संगीत और अभिनय सब कुछ पु.ल. का था. वे मराठी के पी.जी.वुडहाउस माने जाने थे और बेहद लोकप्रिय रहे. आज तक वैसी लोकप्रियता कोई हासिल नही कर सका है. इस फिल्म का एक गीत ग.दि.माडगुळकरजी ने लिखा था और पं.भीमसेन जोशी जी ने गाया था जो आज तक कमाल का लोकप्रिय है. शायद आपने भी सुना हो.'इंद्रायणी काठी, देवाची आळंदी, लागली समाधी, ज्ञानेशाची.'

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मेरा जन्म १९५८ मे हुआ । उसके पहले अनारकली, नागिन आदि हिट फिल्मे हमारे ही थिएटर में प्रदर्शित हुई और री-रन होती गयी. मेरी मां जब उनकी यादें सुनाती थी तब हम बच्चे सुनते रह जाते थे. नागिन के 'मन डोले मेरा तन डोले' गीत में जब बीन बजती थी तब लोग पागल हो जाते थे और परदे पर पैसे बरसाते थे. किसी मनोरुग्ण दर्शक के शरीर में नागदेवता पधारते थे और वो नाग-सांप की तरह जमीन पर लोटने लगता था.हमारा बचपन तो बस फिल्में देखते देखते ही गुजरा. कोई भी फिल्म कम से कम ३-४ हफ्ते तो चलती ही थी. हमारे थिएटर के अलावा और २ थिएटर्स थे । हमारी वाली देखकर बोर हो गये तो वहां चले गये.

१९८६ मे अंतरधर्म विवाह के बाद मै परिवार से अलग हो गया और थिएटर से संबंध नही रहा. १९९९ मे पिताजी और छोटे भाई की मृत्यू के बाद फिर थिएटर की जिंम्मेदारी मुझ पर आ गयी. लेकिन तब तक सिंगल स्क्रीन थिएटर्स मृत्यूशैया पर पहुंच चुके थे. स्टेट बैंक की मेरी नौकरी छोडकर मैंने थिएटर का बिजनेस चलाने की कोशिश की. मगर बिजनेस डूबती नैय्या बन चुका था. सो गत वर्ष उसे हमेशा के लिये बंद कर दिया.

ग.दि.माडगुळकर जी के बारे में जी करता है आपको सामने बिठाऊं और उनकी मराठी कविताओं का रसपान करवाऊं ।
वे इन्स्टंट शायर थे. चुटकी बजाते ही गीत हाजिर कर देते थे. और वो भी कमाल की रचना. आज उनकी बस एक ही बात कहुंगा. सी. रामचंद्र जी ने एक मराठी फिल्म बनाई थी. घरकुल. जो मैन-वुमन एण्ड चाइल्ड पे आधारित थी. शेखर कपूर की मासूम भी उसी पर आधारित है. उसका संगीत भी उन्हीं ने दिया था. इस फिल्म में माडगुळकरजी की एक कविता का इस्तमाल किया गया था. कविता का नाम था 'जोगिया' (ये हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक राग है) तवायफ की महफिल खत्म हो जाने के बाद जो माहौल बचता है उसका वर्णन किया गया है इस कविता में. प्रारंभ के बोल है 'कोन्यात झोपली सतार, सरला रंग...पसरली पैंजणे सैल टाकुनी अंग ॥ दुमडला गालिचा तक्के झुकले खाली...तबकात राहिले देठ, लवंगा, साली ॥ ये गीत फैय्याज जी ने गाया है. फैय्याज उप-शास्त्रीय संगीत गाती है और नाट्य कलाकार है.) शब्दों का मतलब और कविता का भाव शायद आपकी समझ मे आ रहा होगा. ये गीत या ये पूरी कविता अगर मुझे मिली तो मै आपको जरूर सुनाऊंगा और हिंदी में मतलब समझाऊंगा. कमाल का गाना है.
सी.रामचंद्रजी ने कमाल का संगीत दिया है.


इस टिप्‍पणी को पढ़ने के बाद मुझे मडगुळकर की कविता तो मिल गयी । ये रहा अता-पता
http://gadima.com/jogia/index.php
जहां जाकर आप रीयल प्‍लेयर पर इसे सुन सकते हैं ।
लेकिन ये फैयाज़ वाला संस्‍करण नहीं है । और हां अगर आप मडगुळकर के बारे में ज्‍यादा जानना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें । या फिर यहां जायें--http://gadima.com/ ये ग डि माडगुळकर पर केंद्रित वेबसाईट है । खेद है कि हिंदी में ऐसा काम ज्‍यादा क्‍यों नहीं हो रहा है ।

दो आंखें बारह हाथ का संदर्भ जारी है । जल्‍दी ही इस फिल्‍म के बचे हुए गीत लेकर हाजिर होता हूं ।

कहानी कहां से चली और कहां पहुंच गयी । संदर्भों की सैर आपको कैसी लगी ।


इस संदर्भ की पहली पोस्‍ट--वी शांताराम की फिल्‍म दो आंखें बारह हाथ को हुए पचास साल

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Thursday, September 27, 2007

शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने पूरे किये पचास साल । रेडियोवाणी पर इस फिल्‍म की बातें और गाने ।


शांताराम वणकुद्रे यानी व्‍ही शांताराम की फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' सन 1957 में रिलीज़ हुई थी । यानी इस वर्ष इस फिल्‍म की रिलीज़ को पचास साल पूरे हो रहे हैं । थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए ये भी बता दूं कि विविध भारती की स्‍थापना भी इसी वर्ष हुई थी,यानी ये इस फिल्‍म और विविध भारती दोनों के पचास वर्ष पूरे होने का मौक़ा है । बहरहाल 'दो आंखें बारह हाथ' कई मायनों में एक कल्‍ट फिल्‍म है । एक कालजयी फिल्‍म है ।

क्‍या आपने ये फिल्‍म देखी है । अगर नहीं तो तुरंत सी.डी.या डी.वी.डी.जुगाडि़ए और फुरसत निकालकर आज ही देख डालिए ।
कहानी एक युवा प्रगतिशील और सुधारवादी विचारों वाले जेलर आदिनाथ की है, जो क़त्‍ल की सज़ा भुगत रहे पांच खूंखार कै़दियों को एक पुराने जर्जर फार्म-हाउस में ले जाकर सुधारने की अनुमति ले लेता है । और तब शुरू होता है उन्‍हें सुधारने की कोशिशों का आशा-निराशा भरा दौर ।

इतने सरल और सादे से कथानक पर बिना किसी लटके झटके के साथ एक कालजयी फिल्‍म बनाई शांताराम ने । इस फिल्‍म में युवा जेलर आदिनाथ का किरदार खुद शांताराम ने निभाया । और उनकी नायिका बनीं संध्‍या । इसके अलावा कोई ज्‍यादा मशहूर कलाकार इस फिल्‍म में नहीं था । भरत व्‍यास ने फिल्‍म के गीत लिखे और संगीत वसंत देसाई ने दिया ।

यहां आपको ये भी बता देना ज़रूरी है कि वी शांताराम ने इस फिल्‍म से पहले सन 1955 में अपनी नृत्‍य और संगीत प्रधान फिल्‍म 'झनक झनक पायल बाजे' बनाई थी और इस फिल्‍म के बाद 1959 में बनाई गीत-संगीत प्रधान अपनी एक और महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म 'नवरंग' । इस लिहाज से देखें तो भी शांताराम की सिने यात्रा काफी दिलचस्‍प लगती है । वो विषयों के मामले में काफी प्रयोग कर रहे थे । शांताराम ने वैसे भी ज्‍वलंत सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्‍मों का विषय बनाया । जैसे उनकी फिल्‍म दुनिया ना माने बेमेल विवाह पर केंद्रित थी । फिल्‍म आदमी के केंद्र में थी वेश्‍यावृत्ति । पड़ोसी सांप्रदायिक सदभाव पर केंद्रित थी और फिल्‍म दहेज का विषय तो इसके शीर्षक से ही समझा जा सकता है ।

मैंने सुना है कि जिस वक्‍त उन्‍होंने 'दो आंखें बारह हाथ' बनाई, तब उनकी उम्र सत्‍तावन साल थी और वो बहुत ही चुस्‍त-दुरूस्‍त हुआ करते थे । फिल्‍म में रोचकता और रस का समावेश करने के लिए संध्‍या को एक खिलौने बेचने वाली का किरदार दिया गया, जो जब भी खेत वाले बाड़े से गुजरती है तो उसे इंप्रेस करने की होड़ लग जाती है कडि़यल और खूंखार क़ैदियों में ।

फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ'साबित करती है कि चाहे क़ैदी हो या जल्‍लाद- हैं तो सब इंसान ही । तमाम बातों के बावजूद हम सबके भीतर एक कोमल-हृदय है । हमारे भीतर जज्‍़बात की नर्मी है । हमारे भीतर आंसू हैं, मुस्‍कानें हैं । हमारे भीतर अपराध बोध है । प्‍यार की चाहत है ।

इस फिल्‍म का सबसे बड़ा संदेश है नैतिकता का संदेश । भारतीय मानस में नैतिकता की गहरी पैठ है । वही हमारे बर्ताव पर 'वॉचफुल आई' रखती है । हमें भटकने से बचाती है । अगर हमसे कोई ग़लत क़दम उठ जाता है तो हम अपराध-बोध के तले दब जाते हैं । इस फिल्‍म में जेलर आदिनाथ अपने क़ैदियों को इसी ताक़त के सहारे सुधारता है, उनके भीतर की नैतिकता को जगाता है । यही नैतिकता उन्‍हें फरार नहीं होने देती । इसी नैतिक बल के सहारे वो कड़ी मेहनत करके शानदार फसल हासिल करते हैं । इस तरह ये फिल्‍म कहीं ना कहीं गांधीवादी विचारधारा का प्रातिनिधित्‍व करती है । मशहूर पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने 'दो आंखें बारह हाथ' से ही प्रेरित होकर दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में क़ैदियों के रिफॉर्म का कार्यक्रम शुरू किया था और सफलता हासिल की थी । आपको बता दूं‍ कि शांताराम की फिल्‍म्‍ दो आंखें बारह हाथ को 1957 में बर्लिन फिल्‍म समारोह में सिल्‍वर बेयर मिला था । इसी साल इस फिल्‍म ने राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण पदक जीता और 1958 में चार्ली चैपलिन के नेतृत्‍व वाली जूरी ने इसे 'बेस्‍ट फिल्‍म आफ द ईयर' का खिताब दिया था । मुंबई में ये फिल्‍म लगातार पैंसठ हफ्ते चली थी । कई शहरों में इसने गोल्‍डन जुबली मनाई थी ।

दरअसल इस फिल्‍म की कहानी लिखी थी जी डी मदगुलेकर ने । जो शांताराम के मित्र थे । जब मदगुलेकर ये कहानी लेकर शांताराम के पास पहुंचे तो शांताराम ने कहानी को रिजेक्‍ट कर दिया था । हालांकि कहानी का भावनात्‍मक पक्ष उन्‍हें पसंद आया था । इसलिए उन्‍होंने इस कहानी को दोबारा लिखा और फिर इस पर फिल्‍म बनाई ।

दो आंखें बारह हाथ का संगीत शांताराम की अन्‍य फिल्‍मों की तरह उत्‍कृष्‍ट था । और आज भी रेडियो स्‍टेशनों पर इसकी खूब फरमाईश की जाती है ।

तो आईये इस फिल्‍म के गीत सुन लिये जायें ।


लता मंगेशकर की गाई प्रार्थना 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' । बेहतरीन कंपोजीशन । इसके रिदम साईड पर ध्‍यान दीजिए । और कोरस पर । वसंत देसाई का अनमोल संगीत ।

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उमड़ घुमड़ के छाई रे घटा । एक बार फिर शानदार रिदम । तेज़ लय का बेहतरीन गीत । इस गीत की गीतकारी के तो कहने ही क्‍या । एक संपूर्ण गीत । बीच में सारंगी की तान सुनिए । जो फिल्‍म में संध्‍या के आने की सिगनेचर ट्यून बन गयी थी ।

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इस फिल्‍म का सबसे शरारती गीत । सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला ।
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इस फिल्‍म में कुछ और गीत भी हैं । जिनका जिक्र अगली कड़ी में किया जायेगा ।
तब तक आप इन तीनों गीतों को बार बार सुनिए और लुत्‍फ उठाईये ।

अरे कहां चले आप । अरे इन गानों के वीडियो नहीं देखेंगे क्‍या ।

ऐ मालिक तेरे बंदे हम


सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला



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“ दो आंखें बारह हाथ” ,
“ वी शांताराम” ,
” DO AANKHEN BARAH HAATH” ,
” V. shantaram” ,
”ऐ मालिक तेरे बंदे हम” ,
” उमड़ घुमड़ के छाई रे घटा” ,
”सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला”
”umad ghumad ke chayi re ghata”
”saiyan jhoothon ka bada”
”aye maalik tere bande hum”


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: दो-आंखें-बारह-हाथ, वी-शांताराम, do-aankhen-barah-haath, aye-maalik-tere-bande-hum, saiyan-jhoothon-ka-bada-sartaj, umad-ghumad-ke, chayi-re-ghata,

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शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने पूरे किये पचास साल । रेडियोवाणी पर इस फिल्‍म की बातें और गाने ।


शांताराम वणकुद्रे यानी व्‍ही शांताराम की फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' सन 1957 में रिलीज़ हुई थी । यानी इस वर्ष इस फिल्‍म की रिलीज़ को पचास साल पूरे हो रहे हैं । थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए ये भी बता दूं कि विविध भारती की स्‍थापना भी इसी वर्ष हुई थी,यानी ये इस फिल्‍म और विविध भारती दोनों के पचास वर्ष पूरे होने का मौक़ा है । बहरहाल 'दो आंखें बारह हाथ' कई मायनों में एक कल्‍ट फिल्‍म है । एक कालजयी फिल्‍म है ।

क्‍या आपने ये फिल्‍म देखी है । अगर नहीं तो तुरंत सी.डी.या डी.वी.डी.जुगाडि़ए और फुरसत निकालकर आज ही देख डालिए ।
कहानी एक युवा प्रगतिशील और सुधारवादी विचारों वाले जेलर आदिनाथ की है, जो क़त्‍ल की सज़ा भुगत रहे पांच खूंखार कै़दियों को एक पुराने जर्जर फार्म-हाउस में ले जाकर सुधारने की अनुमति ले लेता है । और तब शुरू होता है उन्‍हें सुधारने की कोशिशों का आशा-निराशा भरा दौर ।

इतने सरल और सादे से कथानक पर बिना किसी लटके झटके के साथ एक कालजयी फिल्‍म बनाई शांताराम ने । इस फिल्‍म में युवा जेलर आदिनाथ का किरदार खुद शांताराम ने निभाया । और उनकी नायिका बनीं संध्‍या । इसके अलावा कोई ज्‍यादा मशहूर कलाकार इस फिल्‍म में नहीं था । भरत व्‍यास ने फिल्‍म के गीत लिखे और संगीत वसंत देसाई ने दिया ।

यहां आपको ये भी बता देना ज़रूरी है कि वी शांताराम ने इस फिल्‍म से पहले सन 1955 में अपनी नृत्‍य और संगीत प्रधान फिल्‍म 'झनक झनक पायल बाजे' बनाई थी और इस फिल्‍म के बाद 1959 में बनाई गीत-संगीत प्रधान अपनी एक और महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म 'नवरंग' । इस लिहाज से देखें तो भी शांताराम की सिने यात्रा काफी दिलचस्‍प लगती है । वो विषयों के मामले में काफी प्रयोग कर रहे थे । शांताराम ने वैसे भी ज्‍वलंत सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्‍मों का विषय बनाया । जैसे उनकी फिल्‍म दुनिया ना माने बेमेल विवाह पर केंद्रित थी । फिल्‍म आदमी के केंद्र में थी वेश्‍यावृत्ति । पड़ोसी सांप्रदायिक सदभाव पर केंद्रित थी और फिल्‍म दहेज का विषय तो इसके शीर्षक से ही समझा जा सकता है ।

मैंने सुना है कि जिस वक्‍त उन्‍होंने 'दो आंखें बारह हाथ' बनाई, तब उनकी उम्र सत्‍तावन साल थी और वो बहुत ही चुस्‍त-दुरूस्‍त हुआ करते थे । फिल्‍म में रोचकता और रस का समावेश करने के लिए संध्‍या को एक खिलौने बेचने वाली का किरदार दिया गया, जो जब भी खेत वाले बाड़े से गुजरती है तो उसे इंप्रेस करने की होड़ लग जाती है कडि़यल और खूंखार क़ैदियों में ।

फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ'साबित करती है कि चाहे क़ैदी हो या जल्‍लाद- हैं तो सब इंसान ही । तमाम बातों के बावजूद हम सबके भीतर एक कोमल-हृदय है । हमारे भीतर जज्‍़बात की नर्मी है । हमारे भीतर आंसू हैं, मुस्‍कानें हैं । हमारे भीतर अपराध बोध है । प्‍यार की चाहत है ।

इस फिल्‍म का सबसे बड़ा संदेश है नैतिकता का संदेश । भारतीय मानस में नैतिकता की गहरी पैठ है । वही हमारे बर्ताव पर 'वॉचफुल आई' रखती है । हमें भटकने से बचाती है । अगर हमसे कोई ग़लत क़दम उठ जाता है तो हम अपराध-बोध के तले दब जाते हैं । इस फिल्‍म में जेलर आदिनाथ अपने क़ैदियों को इसी ताक़त के सहारे सुधारता है, उनके भीतर की नैतिकता को जगाता है । यही नैतिकता उन्‍हें फरार नहीं होने देती । इसी नैतिक बल के सहारे वो कड़ी मेहनत करके शानदार फसल हासिल करते हैं । इस तरह ये फिल्‍म कहीं ना कहीं गांधीवादी विचारधारा का प्रातिनिधित्‍व करती है । मशहूर पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने 'दो आंखें बारह हाथ' से ही प्रेरित होकर दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में क़ैदियों के रिफॉर्म का कार्यक्रम शुरू किया था और सफलता हासिल की थी । आपको बता दूं‍ कि शांताराम की फिल्‍म्‍ दो आंखें बारह हाथ को 1957 में बर्लिन फिल्‍म समारोह में सिल्‍वर बेयर मिला था । इसी साल इस फिल्‍म ने राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण पदक जीता और 1958 में चार्ली चैपलिन के नेतृत्‍व वाली जूरी ने इसे 'बेस्‍ट फिल्‍म आफ द ईयर' का खिताब दिया था । मुंबई में ये फिल्‍म लगातार पैंसठ हफ्ते चली थी । कई शहरों में इसने गोल्‍डन जुबली मनाई थी ।

दरअसल इस फिल्‍म की कहानी लिखी थी जी डी मदगुलेकर ने । जो शांताराम के मित्र थे । जब मदगुलेकर ये कहानी लेकर शांताराम के पास पहुंचे तो शांताराम ने कहानी को रिजेक्‍ट कर दिया था । हालांकि कहानी का भावनात्‍मक पक्ष उन्‍हें पसंद आया था । इसलिए उन्‍होंने इस कहानी को दोबारा लिखा और फिर इस पर फिल्‍म बनाई ।

दो आंखें बारह हाथ का संगीत शांताराम की अन्‍य फिल्‍मों की तरह उत्‍कृष्‍ट था । और आज भी रेडियो स्‍टेशनों पर इसकी खूब फरमाईश की जाती है ।

तो आईये इस फिल्‍म के गीत सुन लिये जायें ।


लता मंगेशकर की गाई प्रार्थना 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' । बेहतरीन कंपोजीशन । इसके रिदम साईड पर ध्‍यान दीजिए । और कोरस पर । वसंत देसाई का अनमोल संगीत ।

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उमड़ घुमड़ के छाई रे घटा । एक बार फिर शानदार रिदम । तेज़ लय का बेहतरीन गीत । इस गीत की गीतकारी के तो कहने ही क्‍या । एक संपूर्ण गीत । बीच में सारंगी की तान सुनिए । जो फिल्‍म में संध्‍या के आने की सिगनेचर ट्यून बन गयी थी ।

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इस फिल्‍म का सबसे शरारती गीत । सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला ।
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इस फिल्‍म में कुछ और गीत भी हैं । जिनका जिक्र अगली कड़ी में किया जायेगा ।
तब तक आप इन तीनों गीतों को बार बार सुनिए और लुत्‍फ उठाईये ।

अरे कहां चले आप । अरे इन गानों के वीडियो नहीं देखेंगे क्‍या ।

ऐ मालिक तेरे बंदे हम


सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला



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