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Thursday, September 27, 2007

शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने पूरे किये पचास साल । रेडियोवाणी पर इस फिल्‍म की बातें और गाने ।


शांताराम वणकुद्रे यानी व्‍ही शांताराम की फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' सन 1957 में रिलीज़ हुई थी । यानी इस वर्ष इस फिल्‍म की रिलीज़ को पचास साल पूरे हो रहे हैं । थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए ये भी बता दूं कि विविध भारती की स्‍थापना भी इसी वर्ष हुई थी,यानी ये इस फिल्‍म और विविध भारती दोनों के पचास वर्ष पूरे होने का मौक़ा है । बहरहाल 'दो आंखें बारह हाथ' कई मायनों में एक कल्‍ट फिल्‍म है । एक कालजयी फिल्‍म है ।

क्‍या आपने ये फिल्‍म देखी है । अगर नहीं तो तुरंत सी.डी.या डी.वी.डी.जुगाडि़ए और फुरसत निकालकर आज ही देख डालिए ।
कहानी एक युवा प्रगतिशील और सुधारवादी विचारों वाले जेलर आदिनाथ की है, जो क़त्‍ल की सज़ा भुगत रहे पांच खूंखार कै़दियों को एक पुराने जर्जर फार्म-हाउस में ले जाकर सुधारने की अनुमति ले लेता है । और तब शुरू होता है उन्‍हें सुधारने की कोशिशों का आशा-निराशा भरा दौर ।

इतने सरल और सादे से कथानक पर बिना किसी लटके झटके के साथ एक कालजयी फिल्‍म बनाई शांताराम ने । इस फिल्‍म में युवा जेलर आदिनाथ का किरदार खुद शांताराम ने निभाया । और उनकी नायिका बनीं संध्‍या । इसके अलावा कोई ज्‍यादा मशहूर कलाकार इस फिल्‍म में नहीं था । भरत व्‍यास ने फिल्‍म के गीत लिखे और संगीत वसंत देसाई ने दिया ।

यहां आपको ये भी बता देना ज़रूरी है कि वी शांताराम ने इस फिल्‍म से पहले सन 1955 में अपनी नृत्‍य और संगीत प्रधान फिल्‍म 'झनक झनक पायल बाजे' बनाई थी और इस फिल्‍म के बाद 1959 में बनाई गीत-संगीत प्रधान अपनी एक और महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म 'नवरंग' । इस लिहाज से देखें तो भी शांताराम की सिने यात्रा काफी दिलचस्‍प लगती है । वो विषयों के मामले में काफी प्रयोग कर रहे थे । शांताराम ने वैसे भी ज्‍वलंत सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्‍मों का विषय बनाया । जैसे उनकी फिल्‍म दुनिया ना माने बेमेल विवाह पर केंद्रित थी । फिल्‍म आदमी के केंद्र में थी वेश्‍यावृत्ति । पड़ोसी सांप्रदायिक सदभाव पर केंद्रित थी और फिल्‍म दहेज का विषय तो इसके शीर्षक से ही समझा जा सकता है ।

मैंने सुना है कि जिस वक्‍त उन्‍होंने 'दो आंखें बारह हाथ' बनाई, तब उनकी उम्र सत्‍तावन साल थी और वो बहुत ही चुस्‍त-दुरूस्‍त हुआ करते थे । फिल्‍म में रोचकता और रस का समावेश करने के लिए संध्‍या को एक खिलौने बेचने वाली का किरदार दिया गया, जो जब भी खेत वाले बाड़े से गुजरती है तो उसे इंप्रेस करने की होड़ लग जाती है कडि़यल और खूंखार क़ैदियों में ।

फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ'साबित करती है कि चाहे क़ैदी हो या जल्‍लाद- हैं तो सब इंसान ही । तमाम बातों के बावजूद हम सबके भीतर एक कोमल-हृदय है । हमारे भीतर जज्‍़बात की नर्मी है । हमारे भीतर आंसू हैं, मुस्‍कानें हैं । हमारे भीतर अपराध बोध है । प्‍यार की चाहत है ।

इस फिल्‍म का सबसे बड़ा संदेश है नैतिकता का संदेश । भारतीय मानस में नैतिकता की गहरी पैठ है । वही हमारे बर्ताव पर 'वॉचफुल आई' रखती है । हमें भटकने से बचाती है । अगर हमसे कोई ग़लत क़दम उठ जाता है तो हम अपराध-बोध के तले दब जाते हैं । इस फिल्‍म में जेलर आदिनाथ अपने क़ैदियों को इसी ताक़त के सहारे सुधारता है, उनके भीतर की नैतिकता को जगाता है । यही नैतिकता उन्‍हें फरार नहीं होने देती । इसी नैतिक बल के सहारे वो कड़ी मेहनत करके शानदार फसल हासिल करते हैं । इस तरह ये फिल्‍म कहीं ना कहीं गांधीवादी विचारधारा का प्रातिनिधित्‍व करती है । मशहूर पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने 'दो आंखें बारह हाथ' से ही प्रेरित होकर दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में क़ैदियों के रिफॉर्म का कार्यक्रम शुरू किया था और सफलता हासिल की थी । आपको बता दूं‍ कि शांताराम की फिल्‍म्‍ दो आंखें बारह हाथ को 1957 में बर्लिन फिल्‍म समारोह में सिल्‍वर बेयर मिला था । इसी साल इस फिल्‍म ने राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण पदक जीता और 1958 में चार्ली चैपलिन के नेतृत्‍व वाली जूरी ने इसे 'बेस्‍ट फिल्‍म आफ द ईयर' का खिताब दिया था । मुंबई में ये फिल्‍म लगातार पैंसठ हफ्ते चली थी । कई शहरों में इसने गोल्‍डन जुबली मनाई थी ।

दरअसल इस फिल्‍म की कहानी लिखी थी जी डी मदगुलेकर ने । जो शांताराम के मित्र थे । जब मदगुलेकर ये कहानी लेकर शांताराम के पास पहुंचे तो शांताराम ने कहानी को रिजेक्‍ट कर दिया था । हालांकि कहानी का भावनात्‍मक पक्ष उन्‍हें पसंद आया था । इसलिए उन्‍होंने इस कहानी को दोबारा लिखा और फिर इस पर फिल्‍म बनाई ।

दो आंखें बारह हाथ का संगीत शांताराम की अन्‍य फिल्‍मों की तरह उत्‍कृष्‍ट था । और आज भी रेडियो स्‍टेशनों पर इसकी खूब फरमाईश की जाती है ।

तो आईये इस फिल्‍म के गीत सुन लिये जायें ।


लता मंगेशकर की गाई प्रार्थना 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' । बेहतरीन कंपोजीशन । इसके रिदम साईड पर ध्‍यान दीजिए । और कोरस पर । वसंत देसाई का अनमोल संगीत ।

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उमड़ घुमड़ के छाई रे घटा । एक बार फिर शानदार रिदम । तेज़ लय का बेहतरीन गीत । इस गीत की गीतकारी के तो कहने ही क्‍या । एक संपूर्ण गीत । बीच में सारंगी की तान सुनिए । जो फिल्‍म में संध्‍या के आने की सिगनेचर ट्यून बन गयी थी ।

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इस फिल्‍म का सबसे शरारती गीत । सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला ।
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इस फिल्‍म में कुछ और गीत भी हैं । जिनका जिक्र अगली कड़ी में किया जायेगा ।
तब तक आप इन तीनों गीतों को बार बार सुनिए और लुत्‍फ उठाईये ।

अरे कहां चले आप । अरे इन गानों के वीडियो नहीं देखेंगे क्‍या ।

ऐ मालिक तेरे बंदे हम


सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला



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“ दो आंखें बारह हाथ” ,
“ वी शांताराम” ,
” DO AANKHEN BARAH HAATH” ,
” V. shantaram” ,
”ऐ मालिक तेरे बंदे हम” ,
” उमड़ घुमड़ के छाई रे घटा” ,
”सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला”
”umad ghumad ke chayi re ghata”
”saiyan jhoothon ka bada”
”aye maalik tere bande hum”


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: दो-आंखें-बारह-हाथ, वी-शांताराम, do-aankhen-barah-haath, aye-maalik-tere-bande-hum, saiyan-jhoothon-ka-bada-sartaj, umad-ghumad-ke, chayi-re-ghata,

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शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने पूरे किये पचास साल । रेडियोवाणी पर इस फिल्‍म की बातें और गाने ।


शांताराम वणकुद्रे यानी व्‍ही शांताराम की फिल्‍म 'दो आंखें बारह हाथ' सन 1957 में रिलीज़ हुई थी । यानी इस वर्ष इस फिल्‍म की रिलीज़ को पचास साल पूरे हो रहे हैं । थोड़ा-सा विषयांतर करते हुए ये भी बता दूं कि विविध भारती की स्‍थापना भी इसी वर्ष हुई थी,यानी ये इस फिल्‍म और विविध भारती दोनों के पचास वर्ष पूरे होने का मौक़ा है । बहरहाल 'दो आंखें बारह हाथ' कई मायनों में एक कल्‍ट फिल्‍म है । एक कालजयी फिल्‍म है ।

क्‍या आपने ये फिल्‍म देखी है । अगर नहीं तो तुरंत सी.डी.या डी.वी.डी.जुगाडि़ए और फुरसत निकालकर आज ही देख डालिए ।
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यहां आपको ये भी बता देना ज़रूरी है कि वी शांताराम ने इस फिल्‍म से पहले सन 1955 में अपनी नृत्‍य और संगीत प्रधान फिल्‍म 'झनक झनक पायल बाजे' बनाई थी और इस फिल्‍म के बाद 1959 में बनाई गीत-संगीत प्रधान अपनी एक और महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म 'नवरंग' । इस लिहाज से देखें तो भी शांताराम की सिने यात्रा काफी दिलचस्‍प लगती है । वो विषयों के मामले में काफी प्रयोग कर रहे थे । शांताराम ने वैसे भी ज्‍वलंत सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्‍मों का विषय बनाया । जैसे उनकी फिल्‍म दुनिया ना माने बेमेल विवाह पर केंद्रित थी । फिल्‍म आदमी के केंद्र में थी वेश्‍यावृत्ति । पड़ोसी सांप्रदायिक सदभाव पर केंद्रित थी और फिल्‍म दहेज का विषय तो इसके शीर्षक से ही समझा जा सकता है ।

मैंने सुना है कि जिस वक्‍त उन्‍होंने 'दो आंखें बारह हाथ' बनाई, तब उनकी उम्र सत्‍तावन साल थी और वो बहुत ही चुस्‍त-दुरूस्‍त हुआ करते थे । फिल्‍म में रोचकता और रस का समावेश करने के लिए संध्‍या को एक खिलौने बेचने वाली का किरदार दिया गया, जो जब भी खेत वाले बाड़े से गुजरती है तो उसे इंप्रेस करने की होड़ लग जाती है कडि़यल और खूंखार क़ैदियों में ।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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