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Monday, September 1, 2008

मुकेश के स्‍वर में रामचरित-मानस का एक अंश ।।

रामचरित-मानस हम भारतीयों की सुबह का अटूट हिस्‍सा रही है । मुझे याद है कि भोपाल में बचपन के दिनों में हम आकाशवाणी पर 'रामचरित मानस गान' सुना करते थे । ये आकाशवाणी के भोपाल केंद्र की प्रस्‍तुति थी । राम किशन चंदेश्री और साथियों की आवाज़ें हुआ करती थीं इसमें । अभी कुछ दिनों पहले आशीष गुप्‍ता नामक सज्‍जन ने ई-मेल पर इसी रामचरित मानस का ब्‍यौरा मांगा और पूछा कि क्‍या वो उपलब्‍ध हो सकता है । आशीष का बचपन भी भोपाल में बीता है और उनके बचपन के संस्‍कारों में भी रेडियो पर गूंजती 'रामचरित मानस गान' की स्‍वरलहरियां शामिल थीं ।

                                  तुलसी दास

शायद अब आकाशवाणी पर रामचरित मानस गान नहीं आता । लेकिन बचपन की वो यादें जब तक ताज़ा हो जाती हैं । संगीत के संस्‍कार जब बन रहे थे तभी हमें पता चला कि मुकेश ने 'रामचरित मानस' को पूरा का पूरा गाया है । उसके बाद हमारी खोजबीन शुरू हुई । और कुछ खास दिक्‍कत नहीं आई । आज भी मुकेश की गाई 'तुलसी रामायण' की सीडीज़ आसानी से उपलब्‍ध हैं । अगर आप इच्‍छुक हैं तो यहां हमारा सीडी पर और यहां इंडिया क्‍लब पर देखिए । या फिर अपने स्‍थानीय म्‍यूजिक स्‍टोर पर खोजिए । बहरहाल बात चल रही थी 'तुलसी रामायण' की ।

मुकेश को 'तुलसी रामायण' का सस्‍वर पाठ बहुत प्रिय था । वे हमेशा अपना हारमोनियम लेकर 'रामचरित' का गायन किया करते थे । और उनका ये प्रेम इन सीडीज़ में झलकता भी है । भजन गाने के लिए जो दीनता, विकलता और समर्पण चाहिए वो मुकेश की आवाज़ में खूब है । वरना कुछ ऐसे इन्‍स्‍टेन्‍ट गायक हैं, जो फैक्‍ट्री की तरह होते हैं । भजन भी गवाईये, पॉप भी गवाईये और प्‍यार-मुहबबत के गाने भी । ख़ैर । आज मैं आपके लिए लेकर आया हूं मुकेश के स्‍वर में 'बजरंग-बाण' । वैसे 'हनुमान-चालीसा' भी मुकेश ने गाया है । और कई अन्‍य गायकों ने भी गाया है ।  लेकिन 'बजरंग-बाण' सुनकर मन को बड़ी शांति मिलती है । आपको ये भी बता दें कि ये रचना कुल साढ़े दस मिनिट की है ।

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निश्चय प्रेम प्रतिति ते , विनय करें सन्मान ।
तेहि के कारज सकल शुभ , सिद्ध करें हनुमान ॥
जय हनुमंत संत हितकारी, सुन लीजै प्रभु विनय हमारी ।
जन के काज विलंब न कीजै , आतुर दौरि महासुख दीजै ॥
जैसे कुदि सिन्धु के पारा , सुरसा बदन पैठि विस्तारा ।
आगे जाय लंकिनी रोका , मारेहु लात गई सुरलोका ॥
जाय विभीषन को सुख दीन्हा , सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥
बाग उजारि सिन्धु मह बोरा , अति आतुर जमकातर तोरा ॥
अक्षयकुमार मारि संहारा , लूम लपेटि लंक को जारा ॥
लाह समान लंक जरि गई , जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥
अब विलम्ब केहि कारन स्वामी , किरपा करहु उर अंतरयामी ॥
जय जय लखन प्राण के दाता , आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥
जय हनुमान जयति बलसागर , सुर समुह समरथ भटनागर ॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले , बैरिहि मारु वज्र के कीले ॥
ॐ हीं हीं हीं हनुमंत कपीसा , ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा ॥
जय अंजनिकुमार बलवंता , शंकरसुवन वीर हनुमंता ॥
बदन कराल काल कुल घालक , राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥
अग्नि बेताल काल मारिमर , भूत प्रेत पिशाच निशाचर ॥
इन्हें मारु तोहि शपथ राम की , राखु नाथ मरजाद नाम की ॥
सत्य होहु हरि शपथ पाई कै , रामदुत धरु मारु धाई कै ॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा , दुख पावत जन केहि अपराधा ॥
पूजा जप तप नेम अचारा , नहि जानत कछु दास तुम्हारा ॥
बन उपवन मग गिरि ग्रह माहीं , तुम्हरें बल हौं डरपत नाहीं ॥
जनकसुता हरिदास कहावौं , ताकी सपथ विलम्ब न लावौं ॥
जय जय जय धुनि होत अकासा , सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥
चरन पकरि कर जोरि मनावौं , यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥
उठ उठ चलु तोहि राम दोहाई , पांय परौं कर जोरि मनाई ॥
ॐ चम चम चम चम चपल चलंता , ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल , ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥
अपने जन को तुरंत उबारौं , सुमिरत होय अनंद हमारौं ॥
यह बजरंग बाण जेहि मार्रै , ताहि कहौ फ़िरि कवन उबारै ॥
पाठ करै बजरंग बाण की , हनुमंत रक्षा करै प्राण की ॥
यह बजरंग बाण जो जापै , तासो भूत प्रेत सब कांपै ॥
धूप देय जो जपै हमेशा , ताके तन नहि रहे कलेशा ॥

उर प्रतिति द्रुढ सरन ह्वै , पाठ करै धरि ध्यान |
बाधा सब हर करै सब , काम सफल हनुमान ||

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मुकेश के स्‍वर में रामचरित-मानस का एक अंश ।।

रामचरित-मानस हम भारतीयों की सुबह का अटूट हिस्‍सा रही है । मुझे याद है कि भोपाल में बचपन के दिनों में हम आकाशवाणी पर 'रामचरित मानस गान' सुना करते थे । ये आकाशवाणी के भोपाल केंद्र की प्रस्‍तुति थी । राम किशन चंदेश्री और साथियों की आवाज़ें हुआ करती थीं इसमें । अभी कुछ दिनों पहले आशीष गुप्‍ता नामक सज्‍जन ने ई-मेल पर इसी रामचरित मानस का ब्‍यौरा मांगा और पूछा कि क्‍या वो उपलब्‍ध हो सकता है । आशीष का बचपन भी भोपाल में बीता है और उनके बचपन के संस्‍कारों में भी रेडियो पर गूंजती 'रामचरित मानस गान' की स्‍वरलहरियां शामिल थीं ।

                                  तुलसी दास

शायद अब आकाशवाणी पर रामचरित मानस गान नहीं आता । लेकिन बचपन की वो यादें जब तक ताज़ा हो जाती हैं । संगीत के संस्‍कार जब बन रहे थे तभी हमें पता चला कि मुकेश ने 'रामचरित मानस' को पूरा का पूरा गाया है । उसके बाद हमारी खोजबीन शुरू हुई । और कुछ खास दिक्‍कत नहीं आई । आज भी मुकेश की गाई 'तुलसी रामायण' की सीडीज़ आसानी से उपलब्‍ध हैं । अगर आप इच्‍छुक हैं तो यहां हमारा सीडी पर और यहां इंडिया क्‍लब पर देखिए । या फिर अपने स्‍थानीय म्‍यूजिक स्‍टोर पर खोजिए । बहरहाल बात चल रही थी 'तुलसी रामायण' की ।

मुकेश को 'तुलसी रामायण' का सस्‍वर पाठ बहुत प्रिय था । वे हमेशा अपना हारमोनियम लेकर 'रामचरित' का गायन किया करते थे । और उनका ये प्रेम इन सीडीज़ में झलकता भी है । भजन गाने के लिए जो दीनता, विकलता और समर्पण चाहिए वो मुकेश की आवाज़ में खूब है । वरना कुछ ऐसे इन्‍स्‍टेन्‍ट गायक हैं, जो फैक्‍ट्री की तरह होते हैं । भजन भी गवाईये, पॉप भी गवाईये और प्‍यार-मुहबबत के गाने भी । ख़ैर । आज मैं आपके लिए लेकर आया हूं मुकेश के स्‍वर में 'बजरंग-बाण' । वैसे 'हनुमान-चालीसा' भी मुकेश ने गाया है । और कई अन्‍य गायकों ने भी गाया है ।  लेकिन 'बजरंग-बाण' सुनकर मन को बड़ी शांति मिलती है । आपको ये भी बता दें कि ये रचना कुल साढ़े दस मिनिट की है ।

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निश्चय प्रेम प्रतिति ते , विनय करें सन्मान ।
तेहि के कारज सकल शुभ , सिद्ध करें हनुमान ॥
जय हनुमंत संत हितकारी, सुन लीजै प्रभु विनय हमारी ।
जन के काज विलंब न कीजै , आतुर दौरि महासुख दीजै ॥
जैसे कुदि सिन्धु के पारा , सुरसा बदन पैठि विस्तारा ।
आगे जाय लंकिनी रोका , मारेहु लात गई सुरलोका ॥
जाय विभीषन को सुख दीन्हा , सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥
बाग उजारि सिन्धु मह बोरा , अति आतुर जमकातर तोरा ॥
अक्षयकुमार मारि संहारा , लूम लपेटि लंक को जारा ॥
लाह समान लंक जरि गई , जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥
अब विलम्ब केहि कारन स्वामी , किरपा करहु उर अंतरयामी ॥
जय जय लखन प्राण के दाता , आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥
जय हनुमान जयति बलसागर , सुर समुह समरथ भटनागर ॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले , बैरिहि मारु वज्र के कीले ॥
ॐ हीं हीं हीं हनुमंत कपीसा , ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा ॥
जय अंजनिकुमार बलवंता , शंकरसुवन वीर हनुमंता ॥
बदन कराल काल कुल घालक , राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥
अग्नि बेताल काल मारिमर , भूत प्रेत पिशाच निशाचर ॥
इन्हें मारु तोहि शपथ राम की , राखु नाथ मरजाद नाम की ॥
सत्य होहु हरि शपथ पाई कै , रामदुत धरु मारु धाई कै ॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा , दुख पावत जन केहि अपराधा ॥
पूजा जप तप नेम अचारा , नहि जानत कछु दास तुम्हारा ॥
बन उपवन मग गिरि ग्रह माहीं , तुम्हरें बल हौं डरपत नाहीं ॥
जनकसुता हरिदास कहावौं , ताकी सपथ विलम्ब न लावौं ॥
जय जय जय धुनि होत अकासा , सुमिरत होय दुसह दुख नासा ॥
चरन पकरि कर जोरि मनावौं , यहि औसर अब केहि गोहरावौं ॥
उठ उठ चलु तोहि राम दोहाई , पांय परौं कर जोरि मनाई ॥
ॐ चम चम चम चम चपल चलंता , ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल , ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ॥
अपने जन को तुरंत उबारौं , सुमिरत होय अनंद हमारौं ॥
यह बजरंग बाण जेहि मार्रै , ताहि कहौ फ़िरि कवन उबारै ॥
पाठ करै बजरंग बाण की , हनुमंत रक्षा करै प्राण की ॥
यह बजरंग बाण जो जापै , तासो भूत प्रेत सब कांपै ॥
धूप देय जो जपै हमेशा , ताके तन नहि रहे कलेशा ॥

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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