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Saturday, April 26, 2008

तन जले मन जलता रहे: मधुमति फिल्‍म का एक दुर्लभ गीत ।

मुझे अकसर लगता है कि जिंदगी कई-कई तलाशों की एक यात्रा है । हम अकसर बल्कि अधिकतर कुछ ढूंढ रहे होते हैं । कुछ पाने की कोशिश कर रहे होते हैं । और शायद यही बात हमारे जीवन को सार्थक भी बनाती है । हम संगीत के शैदाईयों पर तो ये बात और अच्‍छी तरह लागू होती है । संगीत के हम जुनूनी लोग हमेशा कुछ तलाश कर रहे होते हैं । हमारी तलाश कई धाराओं में चल रही होती है ।

इन दिनों कुछ ऐसे गीत याद आए हैं जिन्‍हें मैं लंबे समय से आपको सुनवाना चाहता था । तो आईये आज मधुमति फिल्‍म का एक ऐसा गीत सुना जाए जिसकी चर्चा बहुत कम हुई है । रेडियो पर भी ये गीत बहुत सुनाई नहीं देता । लेकिन मैं इसे अकसर बजाया करता हूं । सबसे दिलचस्‍प बात ये है कि मधुमति के बाक़ी गीत तो शैलेंद्र ने लिखे पर इस गीत के नीचे गीतकार के तौर पर मजरूह सुल्‍तानपुरी का नाम है । संगीत तो आप जानते ही हैं कि सलिल चौधरी का है ।

ये एक जनगीत है । वैसा ही जैसा इप्‍टा के नाटकों और सभाओं में गाया जाता है । हमारे यहां जनगीतों की अच्‍छी और लंबी परंपरा रही है । पर cutterफिल्‍मी गीतों पर जब जब जनगीतों का असर पड़ा है उन्‍होंने गीतों की सुंदरता को बढ़ाया ही है । सलिल दा ने ऐसा अकसर किया है । इस गाने के बोल भी पढि़ये और इसे सुनिए भी । मैं अपना पुराना जुमला फिर दोहरान चाहूंगा कि ये संक्रामक गीत है । कल रात इसे जब एक बार फिर सुना तो जैसे दिलो-दिमाग़ पर छा गया । और मन में इसकी हर पंक्ति गूंज रही है--'जीवन का आरा चलता रहे' ।

ये जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारों का गाना है । महानगरों के जंगल में हम भी तो लकडि़यां ही काट रहे हैं । हम भी तो मेहनतक़श हैं । जीवन के आरे को चला रहे हैं और मस्‍ती से जी रहे हैं ।

तन जले मन जलता रहे

हां खून-पसीना ढलता रहे

जीवन का आरा चलता रहे । हो हो ।

ये है जिंदगी प्‍यारे

कांटों में दिन गुज़ारे

फिर भी ना हारे ।।

तन जले ।।

( सुनो सैंया कहानी कटी बन में, जवानी लट उलझी बिखर गयी रे ।

उमरिया सारी यूं ही गुज़र गयी रे । )

हो तुझको संभलना होगा । हाय हाय रे

मेरे संग संग चलना होगा । हाय हाय रे

जाने कब तक चलना होगा । हाय हाय रे ।

तन जले ।।

 

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अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

तन जले मन जलता रहे: मधुमति फिल्‍म का एक दुर्लभ गीत ।

मुझे अकसर लगता है कि जिंदगी कई-कई तलाशों की एक यात्रा है । हम अकसर बल्कि अधिकतर कुछ ढूंढ रहे होते हैं । कुछ पाने की कोशिश कर रहे होते हैं । और शायद यही बात हमारे जीवन को सार्थक भी बनाती है । हम संगीत के शैदाईयों पर तो ये बात और अच्‍छी तरह लागू होती है । संगीत के हम जुनूनी लोग हमेशा कुछ तलाश कर रहे होते हैं । हमारी तलाश कई धाराओं में चल रही होती है ।

इन दिनों कुछ ऐसे गीत याद आए हैं जिन्‍हें मैं लंबे समय से आपको सुनवाना चाहता था । तो आईये आज मधुमति फिल्‍म का एक ऐसा गीत सुना जाए जिसकी चर्चा बहुत कम हुई है । रेडियो पर भी ये गीत बहुत सुनाई नहीं देता । लेकिन मैं इसे अकसर बजाया करता हूं । सबसे दिलचस्‍प बात ये है कि मधुमति के बाक़ी गीत तो शैलेंद्र ने लिखे पर इस गीत के नीचे गीतकार के तौर पर मजरूह सुल्‍तानपुरी का नाम है । संगीत तो आप जानते ही हैं कि सलिल चौधरी का है ।

ये एक जनगीत है । वैसा ही जैसा इप्‍टा के नाटकों और सभाओं में गाया जाता है । हमारे यहां जनगीतों की अच्‍छी और लंबी परंपरा रही है । पर cutterफिल्‍मी गीतों पर जब जब जनगीतों का असर पड़ा है उन्‍होंने गीतों की सुंदरता को बढ़ाया ही है । सलिल दा ने ऐसा अकसर किया है । इस गाने के बोल भी पढि़ये और इसे सुनिए भी । मैं अपना पुराना जुमला फिर दोहरान चाहूंगा कि ये संक्रामक गीत है । कल रात इसे जब एक बार फिर सुना तो जैसे दिलो-दिमाग़ पर छा गया । और मन में इसकी हर पंक्ति गूंज रही है--'जीवन का आरा चलता रहे' ।

ये जंगल में लकड़ी काटने वाले लकड़हारों का गाना है । महानगरों के जंगल में हम भी तो लकडि़यां ही काट रहे हैं । हम भी तो मेहनतक़श हैं । जीवन के आरे को चला रहे हैं और मस्‍ती से जी रहे हैं ।

तन जले मन जलता रहे

हां खून-पसीना ढलता रहे

जीवन का आरा चलता रहे । हो हो ।

ये है जिंदगी प्‍यारे

कांटों में दिन गुज़ारे

फिर भी ना हारे ।।

तन जले ।।

( सुनो सैंया कहानी कटी बन में, जवानी लट उलझी बिखर गयी रे ।

उमरिया सारी यूं ही गुज़र गयी रे । )

हो तुझको संभलना होगा । हाय हाय रे

मेरे संग संग चलना होगा । हाय हाय रे

जाने कब तक चलना होगा । हाय हाय रे ।

तन जले ।।

 

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Tuesday, April 15, 2008

मधुमति की समकालीन फिल्‍में और जंगल में मोर नाचा । मधुमति पर केंद्रित श्रृंखला का दूसरा भाग

रेडियोवाणी पर फिल्‍म 'मधुमति' पर एक श्रृंखला शुरू की गयी है । दरअसल इस महीने बिमल राय की फिल्‍म मधुमति पचास साल पूरे कर रही है । मधुमति एक महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म है और इसके बारे में तफ़सील से बात करना ज़रूरी है ।

श्रृंखला के पहले भाग में मैंने आपको 'आजा रे परदेसी' सुनवाया था और 'मधुमति' से जुड़ी कुछ बातें बताईं थीं । आईये आज इस फिल्‍म से जुड़ी हस्तियों की बातें की जाएं । इस फिल्‍म की कहानी लिखी थी 'अजांत्रिक' और 'मेघे ढाका तारा' जैसी फिल्‍मों के निर्देशक ऋत्‍विक घटक ने । फिल्‍म के संवाद लेखक राजेंद्र सिंह बेदी थे । जिन्‍होंने फागुन और दस्‍तक जैसी फिल्‍में बनाईं । इस फिल्‍म के गीत शैलेंद्र ने लिखे और संगीत सलिल चौधरी का था । आपको बता दें कि इस फिल्‍म का संपादन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था । फिल्‍म का छायांकन दिलीप गुप्‍ता ने किया था । मुझे ठीक से याद नहीं है पर कुछ साल पहले जब मशहूर लेखक नबेंदु घोष से लंबी बातचीत की थी तो उन्‍होंने बताया था कि उन्‍होंने भी मधुमति के एक ड्राफ्ट पर काम किया था ।

bimalroywp

मधुमति की कहानी में अंधविश्‍वास था, भटकती आत्‍मा की फॉर्मूलेबाज़ कहानी थे ये । और ये बिमल रॉय की आलोचना का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया था । दरअसल इसे समझने के लिए बिमल रॉय की फिल्‍मोग्राफी से होकर गुज़रना ज़रूरी है । बिमल रॉय प्रतिबद्ध सिनेमा के लिए जाने जाते थे । 1944 में फिल्‍म 'उदयेर पथे' से सिनेमा पटल पर छा जाने वाले बिमल रॉय ने मधुमति से पहले हमराही, परिणिता, दो बीघा जमीन, नौकरी, बिराज बहू और देवदास जैसी फिल्‍में बनाई थीं । ज़ाहिर है कि ऐसी फिल्‍मों के बाद जब बिमल रॉय ने मधु‍मति जैसी फिल्‍म बनाई तो प्रबुद्ध दर्शकों और फिल्‍म-समीक्षकों को इससे शिकायत होनी ही थी । लेकिन इसमें हैरत की बात नहीं है कि बिमल रॉय ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ मधुमति का निर्देशन किया और एक बार फिर साबित कर दिया कि जहां तक निर्देशकीय दृष्टि और सूझबूझ का प्रश्‍न है तो उनका कोई मुक़ाबला नहीं है । मधुमति भारत के लोकप्रिय सिनेमा में मील का पत्‍थर बन गयी और आज पचास साल पूरे करने पर अगर हम श्रृंखलाबद्ध रूप से इसकी चर्चा कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि इस फिल्‍म में कुछ तो ऐसा ज़रूर रहा होगा जो इसे कालजयी बनाता है ।

मधु‍मति पर केंद्रित श्रृंखला के इस दूसरे भाग में मैं आपको बताना चाहता हूं कि मधुमति की समकालीन फिल्‍में कौन कौन सी थीं और उनके बीच मधुमति ने किस तरह अपनी पहचान कायम की । आमतौर पर हम इस बात पर ध्‍यान नहीं देते कि गुज़रे ज़माने की किसी लोकप्रिय फिल्‍म को टक्‍कर देने वाली फिल्‍में कौन सी थीं और उनके परिप्रेक्ष्‍य में इस फिल्‍म की सफलता क्‍या मायने रखती है । चलिए सन 1958 में आई मधुमति की समकालीन फिल्‍मों पर ध्‍यान दिया जाए ।

इस साल की सबसे तूफानी फिल्‍म मानी जानी चाहिए सत्‍येन बोस निर्देशित फिल्‍म-'चलती का नाम गाड़ी' । जिसमें किशोर कुमार, अनूप कुमार और अशोक कुमार एक साथ थे । साथ में थीं सजीली मधुबाला--'इक लड़की भीगी भागी सी' । नरगिस और प्रदीप कुमार के अभिनय से chaltikaसजी फिल्‍म 'अदालत' भी इसी साल आई । जिसमें मदनमोहन का संगीत था और 'यूं हसरतों के दाग़' और 'ज़मीं से हमें आसमां पर बिठाकर गिरा तो ना दोगे' जैसे मनमोहक गीत थे । इस फिल्‍म का निर्देशन कालिदास ने किया था । शायद ये कॉमेडी फिल्‍मों का साल रहा होगा । इसी साल एस डी नारंग के निर्देशन में बनी नूतन और किशोर कुमार के अभिनय वाली फिल्‍म 'दिल्‍ली का ठग' भी आई थी । नरगिस और बलराज साहनी के अभिनय वाली फिल्‍म 'घर-संसार' भी इसी साल आई थी । शक्ति सामंत इसी साल अपनी तूफानी फिल्‍म 'हावड़ा ब्रिज' लेकर आए थे । जिसका गीत 'मेरा नाम चिन चिन चू' आज भी लोकप्रिय है । जिसके कलाकार थे मधुबाला और अशोक कुमार ।

नवकेतन की फिल्‍म 'काला पानी' भी इसी साल आई जिसके निर्देशक थे राज lb_HowrahBridge खोसला । इस फिल्‍म में सचिन देव बर्मन का संगीत था और अगर आपको इस फिल्‍म का 'हम बेखुदी में तुझको पुकारे चले गए' जैसा गीत सुनना हो तो यहां आईये । इस फिल्‍म के सितारे थे देव आनंद और मधुबाला । सन 1958 की हिट फिल्‍मों का सिलसिला यहीं खत्‍म नहीं होता । रमेश सहगल के निर्देशन में आई राजकपूर और माला सिन्‍हा अभिनीत फिल्‍म 'फिर सुबह होगी' जो दोस्‍तोवस्‍की के उपन्‍यास 'क्राइम एंड पनिशमेन्‍ट' पर आधारित थी और इस फिल्‍म का संगीत ख़ैयाम ने तैयार किया था । यहां क्लिक करके सुनिए इस फिल्‍म के गीत ।

बी आर चोपड़ा की सुनील दत्‍त और वैजयंती माला के अभिनय से सजी फिल्‍म 'साधना' भी सन 1958 की ही फिल्‍म है । जिसका संगीत एन दत्‍ता ने sadhnaदिया था । इस फिल्‍म का साहिर लुधियानवी का लिखा वो गीत तो आपको याद ही होगा ना--'औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया' । जब मैंने इस बारे में खोजबीन की तो वाक़ई आश्‍चर्य हुआ कि सन 1958 में कितनी बड़ी और लोकप्रिय फिल्‍में आई थीं । देवआनंद की फिल्‍म 'सोलहवां साल' भी इसी साल रिलीज़ हुई । जिसमें वो गीत था- 'है अपना दिल तो आवारा' । इस साल रिलीज़ हुई कुछ और फिल्‍में हैं- सम्राट चंद्रगुप्‍त, जिसमें कल्‍याण जी आनंद जी का संगीत था । प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्‍म 12 ओ क्‍लॉक । जिसमें ओ पी नैयर का संगीत था । वो गाना याद कीजिए- 'कैसा जादू बलम तूने डाला, खो गया नन्‍हा सा दिल हमारा' । शाहिद लतीफ के निर्देशन में बनी फिल्‍म 'सोने की चिडि़या' भी इसी साल आई थी । जिसमें नूतन और बलराज साहनी थे । इसी तरह नौशाद के संगीत से सजी फिल्‍म 'सोहनी महिवाल' भी इसी साल की फिल्‍म है । जिसमें महेंद्र कपूर का वो जोशीला गीत था-चांद छुपा और तारे डूबे रात ग़ज़ब की आई । हुस्‍न चला है इश्क से मिलने, जुल्‍म की बदली छाई । इसी साल आई महेश कौल की फिल्‍म 'आख्रिरी दांव' को भला कौन भूल सकता है । इस फिल्‍म में मदन मोहन का संगीत था- तुझे क्‍या सुनाऊं मैं दिलरूबा तेरे सामने मेरा क्‍या हाल है' ।

इन तमाम फिल्‍मों से मुकाबला करते हुए मधुमति को ढेर सारे फिल्‍मफेयर अवॉर्ड मिले थे ।

सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार ।
सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार बिमल रॉय को ।
सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार वैजयंती माला को ।
सर्वश्रेष्‍ठ संगीतकार का पुरस्‍कार सलिल चौधरी को ।
सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का पुरस्‍कार जॉनी वॉकर को ।
सर्वश्रेष्‍ठ कला निर्देशक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार सुधेंदु रॉय को ।
सर्वश्रेष्‍ठ गायिका का पुरस्‍कार लता मंगेशकर को- 'आजा रे परदेसी'
सर्वश्रेष्‍ठ संपादक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार ऋषिकेश मुखर्जी को ।
दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार नहीं मिला ।
ऋत्‍विक घटक को सर्वश्रेष्‍ठ कहानीकार का पुरस्‍कार नहीं मिला

इन फिल्‍मों के बीच 'मधुमति' एक संपूर्ण फिल्‍म के तौर पर आई थी । जिसमें नाटकीयता भी थी और गंभीरता भी । वैजयंतीमाला का नृत्‍य भी था और दिलीप कुमार का शाही अंदाज़ भी । बिमल रॉय ने फिल्‍म मधुमति को खूब सुंदर बनाया था । और पचास साल बाद भी इस फिल्‍म की दिव्‍यता बरक़रार है । अपनी बात ख़त्‍म करते हुए आपको दिखवा और सुनवा रहा हूं ये गीत: जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा ।

जॉनी वॉकर का ट्रैक फिल्‍म की कहानी में कॉमेडी का छौंक लगाने के लिए रखा गया था और जॉनीवॉकर पर अगर गाना ना फिल्‍माया जाए तो उनके नखरे देखने लायक़ होते थे इसलिए ये गीत फिल्‍म में आया । जॉनी वॉकर की लोकप्रियता दिलीप कुमार से कम नहीं थी । मज़ेदार बात ये है कि शैलेन्‍द्र ने ये गीत लिखा है और उनकी लेखनी की जनवादिता इस गाने में भी झलकती है । बोल पढ़ें तो आप भी समझेंगे । तसल्‍ली से यूट्यूब वीडियो को स्‍ट्रीम होने दें । पहले प्‍ले दबाकर पॉज़ दबा दें और स्‍ट्रीमिंग की पट्टी को लाल होने दें फिर आराम से ये वीडियो देखें । आपको जॉनी वॉकर की अदायगी देखकर अच्‍छा लगेगा ।

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जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा
हम जो थोड़ी-सी पीके झूमे हाय रे सबने देखा ।।

गोरी की गोल गोल अंखियां शराबी
कर चुकी हैं कैसे कैसों की ख़राबी
इनका ये ज़ोर जुल्‍म किसी ने ना देखा

हम जो थोड़ी सी पी के झूमे ।।
किसी को हरे-हरे नोट का नशा
है
किसी को सूट-बूट कोट का नशा
है
यारों हमें तो नौटंकी का नशा है ।।

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मधुमति की समकालीन फिल्‍में और जंगल में मोर नाचा । मधुमति पर केंद्रित श्रृंखला का दूसरा भाग

रेडियोवाणी पर फिल्‍म 'मधुमति' पर एक श्रृंखला शुरू की गयी है । दरअसल इस महीने बिमल राय की फिल्‍म मधुमति पचास साल पूरे कर रही है । मधुमति एक महत्‍त्‍वपूर्ण फिल्‍म है और इसके बारे में तफ़सील से बात करना ज़रूरी है ।

श्रृंखला के पहले भाग में मैंने आपको 'आजा रे परदेसी' सुनवाया था और 'मधुमति' से जुड़ी कुछ बातें बताईं थीं । आईये आज इस फिल्‍म से जुड़ी हस्तियों की बातें की जाएं । इस फिल्‍म की कहानी लिखी थी 'अजांत्रिक' और 'मेघे ढाका तारा' जैसी फिल्‍मों के निर्देशक ऋत्‍विक घटक ने । फिल्‍म के संवाद लेखक राजेंद्र सिंह बेदी थे । जिन्‍होंने फागुन और दस्‍तक जैसी फिल्‍में बनाईं । इस फिल्‍म के गीत शैलेंद्र ने लिखे और संगीत सलिल चौधरी का था । आपको बता दें कि इस फिल्‍म का संपादन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था । फिल्‍म का छायांकन दिलीप गुप्‍ता ने किया था । मुझे ठीक से याद नहीं है पर कुछ साल पहले जब मशहूर लेखक नबेंदु घोष से लंबी बातचीत की थी तो उन्‍होंने बताया था कि उन्‍होंने भी मधुमति के एक ड्राफ्ट पर काम किया था ।

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मधुमति की कहानी में अंधविश्‍वास था, भटकती आत्‍मा की फॉर्मूलेबाज़ कहानी थे ये । और ये बिमल रॉय की आलोचना का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया था । दरअसल इसे समझने के लिए बिमल रॉय की फिल्‍मोग्राफी से होकर गुज़रना ज़रूरी है । बिमल रॉय प्रतिबद्ध सिनेमा के लिए जाने जाते थे । 1944 में फिल्‍म 'उदयेर पथे' से सिनेमा पटल पर छा जाने वाले बिमल रॉय ने मधुमति से पहले हमराही, परिणिता, दो बीघा जमीन, नौकरी, बिराज बहू और देवदास जैसी फिल्‍में बनाई थीं । ज़ाहिर है कि ऐसी फिल्‍मों के बाद जब बिमल रॉय ने मधु‍मति जैसी फिल्‍म बनाई तो प्रबुद्ध दर्शकों और फिल्‍म-समीक्षकों को इससे शिकायत होनी ही थी । लेकिन इसमें हैरत की बात नहीं है कि बिमल रॉय ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ मधुमति का निर्देशन किया और एक बार फिर साबित कर दिया कि जहां तक निर्देशकीय दृष्टि और सूझबूझ का प्रश्‍न है तो उनका कोई मुक़ाबला नहीं है । मधुमति भारत के लोकप्रिय सिनेमा में मील का पत्‍थर बन गयी और आज पचास साल पूरे करने पर अगर हम श्रृंखलाबद्ध रूप से इसकी चर्चा कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि इस फिल्‍म में कुछ तो ऐसा ज़रूर रहा होगा जो इसे कालजयी बनाता है ।

मधु‍मति पर केंद्रित श्रृंखला के इस दूसरे भाग में मैं आपको बताना चाहता हूं कि मधुमति की समकालीन फिल्‍में कौन कौन सी थीं और उनके बीच मधुमति ने किस तरह अपनी पहचान कायम की । आमतौर पर हम इस बात पर ध्‍यान नहीं देते कि गुज़रे ज़माने की किसी लोकप्रिय फिल्‍म को टक्‍कर देने वाली फिल्‍में कौन सी थीं और उनके परिप्रेक्ष्‍य में इस फिल्‍म की सफलता क्‍या मायने रखती है । चलिए सन 1958 में आई मधुमति की समकालीन फिल्‍मों पर ध्‍यान दिया जाए ।

इस साल की सबसे तूफानी फिल्‍म मानी जानी चाहिए सत्‍येन बोस निर्देशित फिल्‍म-'चलती का नाम गाड़ी' । जिसमें किशोर कुमार, अनूप कुमार और अशोक कुमार एक साथ थे । साथ में थीं सजीली मधुबाला--'इक लड़की भीगी भागी सी' । नरगिस और प्रदीप कुमार के अभिनय से chaltikaसजी फिल्‍म 'अदालत' भी इसी साल आई । जिसमें मदनमोहन का संगीत था और 'यूं हसरतों के दाग़' और 'ज़मीं से हमें आसमां पर बिठाकर गिरा तो ना दोगे' जैसे मनमोहक गीत थे । इस फिल्‍म का निर्देशन कालिदास ने किया था । शायद ये कॉमेडी फिल्‍मों का साल रहा होगा । इसी साल एस डी नारंग के निर्देशन में बनी नूतन और किशोर कुमार के अभिनय वाली फिल्‍म 'दिल्‍ली का ठग' भी आई थी । नरगिस और बलराज साहनी के अभिनय वाली फिल्‍म 'घर-संसार' भी इसी साल आई थी । शक्ति सामंत इसी साल अपनी तूफानी फिल्‍म 'हावड़ा ब्रिज' लेकर आए थे । जिसका गीत 'मेरा नाम चिन चिन चू' आज भी लोकप्रिय है । जिसके कलाकार थे मधुबाला और अशोक कुमार ।

नवकेतन की फिल्‍म 'काला पानी' भी इसी साल आई जिसके निर्देशक थे राज lb_HowrahBridge खोसला । इस फिल्‍म में सचिन देव बर्मन का संगीत था और अगर आपको इस फिल्‍म का 'हम बेखुदी में तुझको पुकारे चले गए' जैसा गीत सुनना हो तो यहां आईये । इस फिल्‍म के सितारे थे देव आनंद और मधुबाला । सन 1958 की हिट फिल्‍मों का सिलसिला यहीं खत्‍म नहीं होता । रमेश सहगल के निर्देशन में आई राजकपूर और माला सिन्‍हा अभिनीत फिल्‍म 'फिर सुबह होगी' जो दोस्‍तोवस्‍की के उपन्‍यास 'क्राइम एंड पनिशमेन्‍ट' पर आधारित थी और इस फिल्‍म का संगीत ख़ैयाम ने तैयार किया था । यहां क्लिक करके सुनिए इस फिल्‍म के गीत ।

बी आर चोपड़ा की सुनील दत्‍त और वैजयंती माला के अभिनय से सजी फिल्‍म 'साधना' भी सन 1958 की ही फिल्‍म है । जिसका संगीत एन दत्‍ता ने sadhnaदिया था । इस फिल्‍म का साहिर लुधियानवी का लिखा वो गीत तो आपको याद ही होगा ना--'औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया' । जब मैंने इस बारे में खोजबीन की तो वाक़ई आश्‍चर्य हुआ कि सन 1958 में कितनी बड़ी और लोकप्रिय फिल्‍में आई थीं । देवआनंद की फिल्‍म 'सोलहवां साल' भी इसी साल रिलीज़ हुई । जिसमें वो गीत था- 'है अपना दिल तो आवारा' । इस साल रिलीज़ हुई कुछ और फिल्‍में हैं- सम्राट चंद्रगुप्‍त, जिसमें कल्‍याण जी आनंद जी का संगीत था । प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्‍म 12 ओ क्‍लॉक । जिसमें ओ पी नैयर का संगीत था । वो गाना याद कीजिए- 'कैसा जादू बलम तूने डाला, खो गया नन्‍हा सा दिल हमारा' । शाहिद लतीफ के निर्देशन में बनी फिल्‍म 'सोने की चिडि़या' भी इसी साल आई थी । जिसमें नूतन और बलराज साहनी थे । इसी तरह नौशाद के संगीत से सजी फिल्‍म 'सोहनी महिवाल' भी इसी साल की फिल्‍म है । जिसमें महेंद्र कपूर का वो जोशीला गीत था-चांद छुपा और तारे डूबे रात ग़ज़ब की आई । हुस्‍न चला है इश्क से मिलने, जुल्‍म की बदली छाई । इसी साल आई महेश कौल की फिल्‍म 'आख्रिरी दांव' को भला कौन भूल सकता है । इस फिल्‍म में मदन मोहन का संगीत था- तुझे क्‍या सुनाऊं मैं दिलरूबा तेरे सामने मेरा क्‍या हाल है' ।

इन तमाम फिल्‍मों से मुकाबला करते हुए मधुमति को ढेर सारे फिल्‍मफेयर अवॉर्ड मिले थे ।

सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार ।
सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार बिमल रॉय को ।
सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार वैजयंती माला को ।
सर्वश्रेष्‍ठ संगीतकार का पुरस्‍कार सलिल चौधरी को ।
सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का पुरस्‍कार जॉनी वॉकर को ।
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सर्वश्रेष्‍ठ गायिका का पुरस्‍कार लता मंगेशकर को- 'आजा रे परदेसी'
सर्वश्रेष्‍ठ संपादक का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार ऋषिकेश मुखर्जी को ।
दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार नहीं मिला ।
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इन फिल्‍मों के बीच 'मधुमति' एक संपूर्ण फिल्‍म के तौर पर आई थी । जिसमें नाटकीयता भी थी और गंभीरता भी । वैजयंतीमाला का नृत्‍य भी था और दिलीप कुमार का शाही अंदाज़ भी । बिमल रॉय ने फिल्‍म मधुमति को खूब सुंदर बनाया था । और पचास साल बाद भी इस फिल्‍म की दिव्‍यता बरक़रार है । अपनी बात ख़त्‍म करते हुए आपको दिखवा और सुनवा रहा हूं ये गीत: जंगल में मोर नाचा किसी ने ना देखा ।

जॉनी वॉकर का ट्रैक फिल्‍म की कहानी में कॉमेडी का छौंक लगाने के लिए रखा गया था और जॉनीवॉकर पर अगर गाना ना फिल्‍माया जाए तो उनके नखरे देखने लायक़ होते थे इसलिए ये गीत फिल्‍म में आया । जॉनी वॉकर की लोकप्रियता दिलीप कुमार से कम नहीं थी । मज़ेदार बात ये है कि शैलेन्‍द्र ने ये गीत लिखा है और उनकी लेखनी की जनवादिता इस गाने में भी झलकती है । बोल पढ़ें तो आप भी समझेंगे । तसल्‍ली से यूट्यूब वीडियो को स्‍ट्रीम होने दें । पहले प्‍ले दबाकर पॉज़ दबा दें और स्‍ट्रीमिंग की पट्टी को लाल होने दें फिर आराम से ये वीडियो देखें । आपको जॉनी वॉकर की अदायगी देखकर अच्‍छा लगेगा ।

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गोरी की गोल गोल अंखियां शराबी
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इनका ये ज़ोर जुल्‍म किसी ने ना देखा

हम जो थोड़ी सी पी के झूमे ।।
किसी को हरे-हरे नोट का नशा
है
किसी को सूट-बूट कोट का नशा
है
यारों हमें तो नौटंकी का नशा है ।।

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Thursday, April 10, 2008

फिल्‍म मधुमति ने पूरे किये पचास साल : आजा रे परदेसी ।

कल रेडियोवाणी ने अपनी पहली वर्षगांठ मनाई । मैं तमाम मित्रों, सहयोगियों और शुभचिंतकों का आभार व्‍यक्‍त करता हूं जो रेडियोवाणी के इस उत्‍सव में शामिल हुए । रेडियोवाणी के लिए संगीत ही मज़हब है । संगीत जुनून है और जीवन का एक अनिवार्य हिस्‍सा है । जल्‍द ही रेडियोवाणी पर साल भर की महत्‍त्‍वूपर्ण पोस्‍टों की लिंकित सूची जारी की जाएगी ताकि यहां आकर सुनने की सहूलियत रहे ।

आज सबेरे सबेरे अख़बार ने एक सुहानी ख़बर थी । पता चला कि बिमल रॉय की फिल्‍म ' मधुमति' को पचास साल हो गये हैं । और मुंबई में इस फिल्‍म का स्‍वर्ण-जयंती समारोह आयोजित किया जा रहा है । अगर आप मुंबई में हैं तो फौरन आज के मुख्‍य अख़बारों का फिल्‍मों के विज्ञापन वाला पन्‍ना देखिए और मधु‍मति देखने की जुगाड़ फिट कर लीजिए । या फिर इस वेबसाईट पर जाईये । 

Lp-Madhumati'मधुमति' की स्‍वर्ण-जयंती कई मायनों में अहम है । इसलिए आज से मैं एक श्रृंखला की शुरूआत कर रहा हूं, जिसमें हम फिल्‍म मधुमति के विभिन्‍न गीत सुनेंगे, इसके संगीत का विश्‍लेषण करेंगे । और फिल्‍म के विविध पहलुओं पर भी बात करेंगे । और मुझे लगता है कि इस बहस को दोतरफा रखा जाना चाहिए । इसलिए अगर 'मधुमति' पर केंद्रित इस श्रृंखला में आप भी अपनी बात रखना चाहते हैं तो अगली पोस्‍टों में आपका स्‍वागत है । आगे चलकर हम बतायेंगे कि मधुमति की समकालीन फिल्‍में कौन सी थीं और इस फिल्‍म का बिमल रॉय की फिल्‍मोग्राफी में क्‍या महत्‍त्‍व है । इस फिल्‍म की यूनिट में कौन कौन शामिल थे । परदे के पीछे की घटनाएं वग़ैरह सब कुछ ।

( मधुमति फिल्‍म के रिकॉर्ड की ये तस्‍वीर http://partiessareesandmelodies.blogspot.com/ से साभार )

मधुमति की कहानी क्‍या थी, ये कल की पोस्‍ट में बताया जायेगा । हो सकता है कि आपने ये फिल्‍म देखी हो पर भूल गये हों । हो सकता है कि देखी भी हो और याद भी हो । और दोहराना भी चाहें । बहरहाल आज की कड़ी में हम मधुमति के सबसे लोकप्रिय गीत 'आजा रे परदेसी' की चर्चा करेंगे । मैंने पहले भी आपको बताया है कि लता मंगेशकर इस गाने से अपने लगभग हर कंसर्ट में फिल्‍मी गानों के सिलसिले को शुरू करती हैं । मैंने पता किया तो मालूम पड़ा कि ऐसा इसलिए क्‍योंकि इसी गीत के लिए लता जी को अपना पहला फिल्‍म-फेयर पुरस्‍कार मिला था । ये गीत लता जी के बहुत पसंदीदा गीतों में से एक है ।

लेकिन क्‍या आपको पता है कि बिमल रॉय को शैलेंद्र का लिखा और सलिल चौधरी का स्‍वरबद्ध किया ये गीत पसंद नहीं आया था । और वो इसे अपनी फिल्‍म में शामिल भी नहीं करना चाहते थे । पर सलिल दा एकदम अड़ गये और बिमल रॉय को मानना पड़ा । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सलिल चौधरी का सर्वश्रेष्‍ठ संगीत मधुमति में है ।

इस गाने को ही लीजिए....फिल्‍म की पहाड़ की पृष्‍ठभूमि की वजह से सलिल 220px-Vyjayanthimala_Madhumati दा ने इस फिल्‍म के गीतों में पहाड़ी वाद्यों का खूब प्रयोग किया है । जैसे लता जी जैसे ही मुखड़ा गाती हैं तो उसके बाद पहाड़ी बांसुरी जैसे किसी वाद्य की विकल स्‍वरलहरी है । फिर लता जी आती हैं ये कहते हुए......मैं तो कब से खड़ी इस पार ।

पहले अंतरे के बाद सलिल दा ने इंटरल्‍यूड में 'घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के' की धुन रखी है । बाद में इस तरह के प्रयोग नये संगीतकारों ने खूब किये । खासकर राजश्री प्रोडक्‍शंस की फिल्‍मों में राम लक्ष्‍मण ने और यश चोपड़ा की फिल्‍मों में उनके अलग अलग संगीतकारों ने ।

फिर सलिल दा ने एक और प्रयोग किया है ' मैं दिये की एक ही बाती' वाले अंतरे के बाद जब लता जी 'आ मिल मेरे जीवन साथी' पर आती हैं तो रिदम एकदम खामोश हो जाता है । और उसके बाद मुखड़े के साथ फिर से रिदम तरंगित हो जाता है । लता जी ने इस गाने को अतिरिक्‍त मिठास के साथ गाया है । जैसे लता जी स्‍वयं किसी परदेसी की प्रतीक्षा में पंथ निहार रही हों । मुझे लगता है कि अपनी मासूम और विकल भावनाओं में ये गीत विरह के किसी भी महत्‍त्‍वपूर्ण काव्‍य से कम नहीं है । विडंबना ये रही है कि हमारे यहां फिल्‍मी गीतों में आई 'कविता' पर उतना ध्‍यान नहीं दिया गया । मुझे पूरा विश्‍वास है कि ये गीत देर तक और दूर तक आपके ज़ेहन में गूंजता रहेगा ।

चूंकि बात 'आजा रे परदेसी' की चल रही थी तो अपने खजाने में मुझे क्‍लेरियोनेट पर मास्‍टर इब्राहीम की बजाई मधुमति फिल्‍म के गाने की धुन भी मिल गयी । जिसे रेडियोवाणी के नियमित पाठक पहले भी सुन चुके हैं । इसका भी आनंद लीजिए । इस गाने के बोल भी दिये जा रहे हैं । और साथ में यू्ट्यूब वीडियो भी ।

आजा रे परदेसी
मैं तो कब से खड़ी इस पार
ये अंखिया थक गई पंथ निहार
आजा रे परदेसी
मैं दीये की ऐसी बाती
जल न सकी जो बुझ भी न पाती
आ मिल मेरे जीवन साथी
आजा रे .....
तुम संग जनम जनम के फेरे
भूल गए क्यों साजन मेरे
तडपत हूँ मैं सांझ सवेरे
आजा रे ...
मैं नदिया फ़िर भी मैं प्यासी
भेद ये गहरा बात जरा सी
बिन तेरे हर साँस उदासी
आजा रे ...

 

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फिल्‍म मधुमति ने पूरे किये पचास साल : आजा रे परदेसी ।

कल रेडियोवाणी ने अपनी पहली वर्षगांठ मनाई । मैं तमाम मित्रों, सहयोगियों और शुभचिंतकों का आभार व्‍यक्‍त करता हूं जो रेडियोवाणी के इस उत्‍सव में शामिल हुए । रेडियोवाणी के लिए संगीत ही मज़हब है । संगीत जुनून है और जीवन का एक अनिवार्य हिस्‍सा है । जल्‍द ही रेडियोवाणी पर साल भर की महत्‍त्‍वूपर्ण पोस्‍टों की लिंकित सूची जारी की जाएगी ताकि यहां आकर सुनने की सहूलियत रहे ।

आज सबेरे सबेरे अख़बार ने एक सुहानी ख़बर थी । पता चला कि बिमल रॉय की फिल्‍म ' मधुमति' को पचास साल हो गये हैं । और मुंबई में इस फिल्‍म का स्‍वर्ण-जयंती समारोह आयोजित किया जा रहा है । अगर आप मुंबई में हैं तो फौरन आज के मुख्‍य अख़बारों का फिल्‍मों के विज्ञापन वाला पन्‍ना देखिए और मधु‍मति देखने की जुगाड़ फिट कर लीजिए । या फिर इस वेबसाईट पर जाईये । 

Lp-Madhumati'मधुमति' की स्‍वर्ण-जयंती कई मायनों में अहम है । इसलिए आज से मैं एक श्रृंखला की शुरूआत कर रहा हूं, जिसमें हम फिल्‍म मधुमति के विभिन्‍न गीत सुनेंगे, इसके संगीत का विश्‍लेषण करेंगे । और फिल्‍म के विविध पहलुओं पर भी बात करेंगे । और मुझे लगता है कि इस बहस को दोतरफा रखा जाना चाहिए । इसलिए अगर 'मधुमति' पर केंद्रित इस श्रृंखला में आप भी अपनी बात रखना चाहते हैं तो अगली पोस्‍टों में आपका स्‍वागत है । आगे चलकर हम बतायेंगे कि मधुमति की समकालीन फिल्‍में कौन सी थीं और इस फिल्‍म का बिमल रॉय की फिल्‍मोग्राफी में क्‍या महत्‍त्‍व है । इस फिल्‍म की यूनिट में कौन कौन शामिल थे । परदे के पीछे की घटनाएं वग़ैरह सब कुछ ।

( मधुमति फिल्‍म के रिकॉर्ड की ये तस्‍वीर http://partiessareesandmelodies.blogspot.com/ से साभार )

मधुमति की कहानी क्‍या थी, ये कल की पोस्‍ट में बताया जायेगा । हो सकता है कि आपने ये फिल्‍म देखी हो पर भूल गये हों । हो सकता है कि देखी भी हो और याद भी हो । और दोहराना भी चाहें । बहरहाल आज की कड़ी में हम मधुमति के सबसे लोकप्रिय गीत 'आजा रे परदेसी' की चर्चा करेंगे । मैंने पहले भी आपको बताया है कि लता मंगेशकर इस गाने से अपने लगभग हर कंसर्ट में फिल्‍मी गानों के सिलसिले को शुरू करती हैं । मैंने पता किया तो मालूम पड़ा कि ऐसा इसलिए क्‍योंकि इसी गीत के लिए लता जी को अपना पहला फिल्‍म-फेयर पुरस्‍कार मिला था । ये गीत लता जी के बहुत पसंदीदा गीतों में से एक है ।

लेकिन क्‍या आपको पता है कि बिमल रॉय को शैलेंद्र का लिखा और सलिल चौधरी का स्‍वरबद्ध किया ये गीत पसंद नहीं आया था । और वो इसे अपनी फिल्‍म में शामिल भी नहीं करना चाहते थे । पर सलिल दा एकदम अड़ गये और बिमल रॉय को मानना पड़ा । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सलिल चौधरी का सर्वश्रेष्‍ठ संगीत मधुमति में है ।

इस गाने को ही लीजिए....फिल्‍म की पहाड़ की पृष्‍ठभूमि की वजह से सलिल 220px-Vyjayanthimala_Madhumati दा ने इस फिल्‍म के गीतों में पहाड़ी वाद्यों का खूब प्रयोग किया है । जैसे लता जी जैसे ही मुखड़ा गाती हैं तो उसके बाद पहाड़ी बांसुरी जैसे किसी वाद्य की विकल स्‍वरलहरी है । फिर लता जी आती हैं ये कहते हुए......मैं तो कब से खड़ी इस पार ।

पहले अंतरे के बाद सलिल दा ने इंटरल्‍यूड में 'घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के' की धुन रखी है । बाद में इस तरह के प्रयोग नये संगीतकारों ने खूब किये । खासकर राजश्री प्रोडक्‍शंस की फिल्‍मों में राम लक्ष्‍मण ने और यश चोपड़ा की फिल्‍मों में उनके अलग अलग संगीतकारों ने ।

फिर सलिल दा ने एक और प्रयोग किया है ' मैं दिये की एक ही बाती' वाले अंतरे के बाद जब लता जी 'आ मिल मेरे जीवन साथी' पर आती हैं तो रिदम एकदम खामोश हो जाता है । और उसके बाद मुखड़े के साथ फिर से रिदम तरंगित हो जाता है । लता जी ने इस गाने को अतिरिक्‍त मिठास के साथ गाया है । जैसे लता जी स्‍वयं किसी परदेसी की प्रतीक्षा में पंथ निहार रही हों । मुझे लगता है कि अपनी मासूम और विकल भावनाओं में ये गीत विरह के किसी भी महत्‍त्‍वपूर्ण काव्‍य से कम नहीं है । विडंबना ये रही है कि हमारे यहां फिल्‍मी गीतों में आई 'कविता' पर उतना ध्‍यान नहीं दिया गया । मुझे पूरा विश्‍वास है कि ये गीत देर तक और दूर तक आपके ज़ेहन में गूंजता रहेगा ।

चूंकि बात 'आजा रे परदेसी' की चल रही थी तो अपने खजाने में मुझे क्‍लेरियोनेट पर मास्‍टर इब्राहीम की बजाई मधुमति फिल्‍म के गाने की धुन भी मिल गयी । जिसे रेडियोवाणी के नियमित पाठक पहले भी सुन चुके हैं । इसका भी आनंद लीजिए । इस गाने के बोल भी दिये जा रहे हैं । और साथ में यू्ट्यूब वीडियो भी ।

आजा रे परदेसी
मैं तो कब से खड़ी इस पार
ये अंखिया थक गई पंथ निहार
आजा रे परदेसी
मैं दीये की ऐसी बाती
जल न सकी जो बुझ भी न पाती
आ मिल मेरे जीवन साथी
आजा रे .....
तुम संग जनम जनम के फेरे
भूल गए क्यों साजन मेरे
तडपत हूँ मैं सांझ सवेरे
आजा रे ...
मैं नदिया फ़िर भी मैं प्यासी
भेद ये गहरा बात जरा सी
बिन तेरे हर साँस उदासी
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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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