फिल्म मधुमति ने पूरे किये पचास साल : आजा रे परदेसी ।
कल रेडियोवाणी ने अपनी पहली वर्षगांठ मनाई । मैं तमाम मित्रों, सहयोगियों और शुभचिंतकों का आभार व्यक्त करता हूं जो रेडियोवाणी के इस उत्सव में शामिल हुए । रेडियोवाणी के लिए संगीत ही मज़हब है । संगीत जुनून है और जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है । जल्द ही रेडियोवाणी पर साल भर की महत्त्वूपर्ण पोस्टों की लिंकित सूची जारी की जाएगी ताकि यहां आकर सुनने की सहूलियत रहे ।
आज सबेरे सबेरे अख़बार ने एक सुहानी ख़बर थी । पता चला कि बिमल रॉय की फिल्म ' मधुमति' को पचास साल हो गये हैं । और मुंबई में इस फिल्म का स्वर्ण-जयंती समारोह आयोजित किया जा रहा है । अगर आप मुंबई में हैं तो फौरन आज के मुख्य अख़बारों का फिल्मों के विज्ञापन वाला पन्ना देखिए और मधुमति देखने की जुगाड़ फिट कर लीजिए । या फिर इस वेबसाईट पर जाईये ।
'मधुमति' की स्वर्ण-जयंती कई मायनों में अहम है । इसलिए आज से मैं एक श्रृंखला की शुरूआत कर रहा हूं, जिसमें हम फिल्म मधुमति के विभिन्न गीत सुनेंगे, इसके संगीत का विश्लेषण करेंगे । और फिल्म के विविध पहलुओं पर भी बात करेंगे । और मुझे लगता है कि इस बहस को दोतरफा रखा जाना चाहिए । इसलिए अगर 'मधुमति' पर केंद्रित इस श्रृंखला में आप भी अपनी बात रखना चाहते हैं तो अगली पोस्टों में आपका स्वागत है । आगे चलकर हम बतायेंगे कि मधुमति की समकालीन फिल्में कौन सी थीं और इस फिल्म का बिमल रॉय की फिल्मोग्राफी में क्या महत्त्व है । इस फिल्म की यूनिट में कौन कौन शामिल थे । परदे के पीछे की घटनाएं वग़ैरह सब कुछ ।
( मधुमति फिल्म के रिकॉर्ड की ये तस्वीर http://partiessareesandmelodies.blogspot.com/ से साभार )
मधुमति की कहानी क्या थी, ये कल की पोस्ट में बताया जायेगा । हो सकता है कि आपने ये फिल्म देखी हो पर भूल गये हों । हो सकता है कि देखी भी हो और याद भी हो । और दोहराना भी चाहें । बहरहाल आज की कड़ी में हम मधुमति के सबसे लोकप्रिय गीत 'आजा रे परदेसी' की चर्चा करेंगे । मैंने पहले भी आपको बताया है कि लता मंगेशकर इस गाने से अपने लगभग हर कंसर्ट में फिल्मी गानों के सिलसिले को शुरू करती हैं । मैंने पता किया तो मालूम पड़ा कि ऐसा इसलिए क्योंकि इसी गीत के लिए लता जी को अपना पहला फिल्म-फेयर पुरस्कार मिला था । ये गीत लता जी के बहुत पसंदीदा गीतों में से एक है ।
लेकिन क्या आपको पता है कि बिमल रॉय को शैलेंद्र का लिखा और सलिल चौधरी का स्वरबद्ध किया ये गीत पसंद नहीं आया था । और वो इसे अपनी फिल्म में शामिल भी नहीं करना चाहते थे । पर सलिल दा एकदम अड़ गये और बिमल रॉय को मानना पड़ा । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सलिल चौधरी का सर्वश्रेष्ठ संगीत मधुमति में है ।
इस गाने को ही लीजिए....फिल्म की पहाड़ की पृष्ठभूमि की वजह से सलिल
दा ने इस फिल्म के गीतों में पहाड़ी वाद्यों का खूब प्रयोग किया है । जैसे लता जी जैसे ही मुखड़ा गाती हैं तो उसके बाद पहाड़ी बांसुरी जैसे किसी वाद्य की विकल स्वरलहरी है । फिर लता जी आती हैं ये कहते हुए......मैं तो कब से खड़ी इस पार ।
पहले अंतरे के बाद सलिल दा ने इंटरल्यूड में 'घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के' की धुन रखी है । बाद में इस तरह के प्रयोग नये संगीतकारों ने खूब किये । खासकर राजश्री प्रोडक्शंस की फिल्मों में राम लक्ष्मण ने और यश चोपड़ा की फिल्मों में उनके अलग अलग संगीतकारों ने ।
फिर सलिल दा ने एक और प्रयोग किया है ' मैं दिये की एक ही बाती' वाले अंतरे के बाद जब लता जी 'आ मिल मेरे जीवन साथी' पर आती हैं तो रिदम एकदम खामोश हो जाता है । और उसके बाद मुखड़े के साथ फिर से रिदम तरंगित हो जाता है । लता जी ने इस गाने को अतिरिक्त मिठास के साथ गाया है । जैसे लता जी स्वयं किसी परदेसी की प्रतीक्षा में पंथ निहार रही हों । मुझे लगता है कि अपनी मासूम और विकल भावनाओं में ये गीत विरह के किसी भी महत्त्वपूर्ण काव्य से कम नहीं है । विडंबना ये रही है कि हमारे यहां फिल्मी गीतों में आई 'कविता' पर उतना ध्यान नहीं दिया गया । मुझे पूरा विश्वास है कि ये गीत देर तक और दूर तक आपके ज़ेहन में गूंजता रहेगा ।
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