ये जंग है जंगे-आज़ादी- मख़दूम मोहिउद्दीन की रचना समवेत स्वरों में ।
रेडियोवाणी पर मैंने बहुत पहले मख़दूम मोहीउद्दीन पर एक पूरी श्रृंखला की थी । मख़दूम हिंदुस्तान के अज़ीम शायर हैं । उनके बारे में इस सीरीज़ में बहुत कुछ लिखा जा चुका है । साथी चिट्ठाकार रियाज़ ने अपने चिट्ठे ढाई आखर पर मख़दूम की ये रचना प्रस्तुत की थी । उनका लिखा आप यहां पढ़ सकते हैं । आज बस आपको मख़दूम की ये क्रांतिकारी रचना सुनवानी है । मुझे ना तो इसके गायक-वृंद का पता है और ना ही इसके संगीतकार का । पर इसे पिछले हफ्ते भर से सुन रहा था और अपने ज़ेहन में उतार रहा था । अब ये आपकी नज़र है ।
ये जंगे है जंगे आज़ादी, आज़ादी के परचम के तले
हम हिंद के रहने वालों की महक़ूमों की मज़दूरों की महकूम-सताए हुए लोग
आज़ादी के मतवालों की,दहक़ानों* की मज़दूरों की *भट्टी चलाने वाले
सारा संसार हमारा है
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन
हम अफ़रंगी हम अमरीकी अफरंगी-फिरंगी
हम चीनी जावा जाने वतन
हम सुर्ख़ सिपाही ज़ुल्म शिकन जुल्म-शिकन: जुल्मों को मिटाने वाले
आहन पयकर फ़ौलाद बदन आहन-पयकर: लोहे के बदन वाले
वह जंग ही क्या वह अमन ही क्या
दुश्मन जिसमें ताराज़ न हो
वह दुनिया दुनिया क्या होगी
जिस दुनिया में स्वराज न हो
वह आज़ादी आज़ादी क्या
मज़दूर का जिसमें राज न हो
लो सुर्ख़ सवेरा आता है आज़ादी का आज़ादी का
गुलनार तराना गाता है आज़ादी का आज़ादी का
देखो परचम लहराता है आज़ादी का आज़ादी का ।।
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