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Friday, June 13, 2008

ऐ चंदा मामा आरे आवा पारे आवा: लता जी की आवाज़ ।।

अब बताईये कैसा संयोग है । मैं मध्‍यप्रदेश में पैदा हुआ और मध्‍यप्रदेश में ये गीत कुछ इस तरह से गाया जाता है: चंदामामा दूर के पूड़ी पकाएं पूर के । आप खाएं थाली में । मुन्‍ने को दें थाली में । थाली गयी टूट । मामा गए रूठ । वग़ैरह वग़ैरह ।  इसी में कहीं फुसला-बहला के बच्‍चे को खाना खिलाने की तरकीब होती है । संसार का कोई बच्‍चा शायद ऐसा नहीं होगा जिसने बड़ी सिधाई से मां के हाथ से खाना खा लिया होगा । जो बच्‍चा खाना खाने में नखरे ना करे, वो बच्‍चा ही कैसा ।

                      nyt_indian_hammock

शायद इसीलिए हमारे लोकगीतों और हमारी संस्‍कृति में इस तरह के गाने आए हैं और पीढि़यों से गाए जाते रहे हैं । भगवान जाने ये किसके दिमाग़ की उपज थे । झुर्रियों के पीछे छिपे किसी उम्रदराज़ मनोवैज्ञानिक मस्तिष्‍क की । या ममत्‍व की तरंगों में लीन किसी मां प्‍यार की ।

जब ये गीत मुझे मिला और मैंने रेडियोसखी ममता को सुनवाया तो उन्‍होंने फ़ौरन ही इस धुन और इन बोलों को पहचान लिया और बताया कि कोई ऐसा बच्‍चा नहीं जो इस गाने के बाद अपना मुंह ना खोले और 'बबुआ के मुंहवा में घुटूं' तक पहुंचते पहुंचते अपना मुंह ना खोल दे । संयोग से ये गीत हासिल हुआ है । फिल्‍म है भौजी । 

मैं बस इतना ही पता कर पाया कि इस भोजपुरी फिल्‍म में मजरूह सुल्‍तानपुरी ने गाने लिखे थे और संगीतकार थे चित्रगुप्‍त । लता जी की आवाज़ में वात्‍सल्‍य कैसा छलक-छलक पड़ता है सुनिए ।

चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा ।

सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा

बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आवाहूं उतरी आवा हमारी मुंडेर, कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।

भईल बड़ी देर हां बाबू को लागल भूख ।

ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना, रहिलै देख घड़ी बाबू के बिना

एक घड़ी हमरा को लागै सौ जून ।

ऐ चंदा मामा ।। 

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अब sms के ज़रिए पाईये ताज़ा पोस्‍ट की जानकारी

ऐ चंदा मामा आरे आवा पारे आवा: लता जी की आवाज़ ।।

अब बताईये कैसा संयोग है । मैं मध्‍यप्रदेश में पैदा हुआ और मध्‍यप्रदेश में ये गीत कुछ इस तरह से गाया जाता है: चंदामामा दूर के पूड़ी पकाएं पूर के । आप खाएं थाली में । मुन्‍ने को दें थाली में । थाली गयी टूट । मामा गए रूठ । वग़ैरह वग़ैरह ।  इसी में कहीं फुसला-बहला के बच्‍चे को खाना खिलाने की तरकीब होती है । संसार का कोई बच्‍चा शायद ऐसा नहीं होगा जिसने बड़ी सिधाई से मां के हाथ से खाना खा लिया होगा । जो बच्‍चा खाना खाने में नखरे ना करे, वो बच्‍चा ही कैसा ।

                      nyt_indian_hammock

शायद इसीलिए हमारे लोकगीतों और हमारी संस्‍कृति में इस तरह के गाने आए हैं और पीढि़यों से गाए जाते रहे हैं । भगवान जाने ये किसके दिमाग़ की उपज थे । झुर्रियों के पीछे छिपे किसी उम्रदराज़ मनोवैज्ञानिक मस्तिष्‍क की । या ममत्‍व की तरंगों में लीन किसी मां प्‍यार की ।

जब ये गीत मुझे मिला और मैंने रेडियोसखी ममता को सुनवाया तो उन्‍होंने फ़ौरन ही इस धुन और इन बोलों को पहचान लिया और बताया कि कोई ऐसा बच्‍चा नहीं जो इस गाने के बाद अपना मुंह ना खोले और 'बबुआ के मुंहवा में घुटूं' तक पहुंचते पहुंचते अपना मुंह ना खोल दे । संयोग से ये गीत हासिल हुआ है । फिल्‍म है भौजी । 

मैं बस इतना ही पता कर पाया कि इस भोजपुरी फिल्‍म में मजरूह सुल्‍तानपुरी ने गाने लिखे थे और संगीतकार थे चित्रगुप्‍त । लता जी की आवाज़ में वात्‍सल्‍य कैसा छलक-छलक पड़ता है सुनिए ।

चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा ।

सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा

बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आवाहूं उतरी आवा हमारी मुंडेर, कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।

भईल बड़ी देर हां बाबू को लागल भूख ।

ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना, रहिलै देख घड़ी बाबू के बिना

एक घड़ी हमरा को लागै सौ जून ।

ऐ चंदा मामा ।। 

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Sunday, March 9, 2008

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी-जगजीत सिंह और लता मंगेशकर की आवाज़, अलबम 'सजदा'

 

जगजीत सिंह हमेशा अपने इंटरव्‍यू में कहते थे कि उनकी तमन्‍ना है सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ गाने की । एक दो गीत नहीं पूरा अलबम वो लता जी के साथ करना चाहते हैं । मुझे याद है कि ग़ज़लों का एक पूरा दौर था वो जब हम लोग बड़े हो रहे थे । हमारे आसपास जाने कितने लोग ग़ज़लें सुनते मिल जाते थे । कठिन उर्दू शब्‍दों के अर्थ खोजते मिल जाते थे । भोपाल चूंकि शेरो-शायरी का गढ़ था इसलिए यहां के तिनके तिनके में शायरी का इल्‍म छिपा था । पान की दुकान पर कत्‍था और चूना का इंस्‍ट्रक्‍शन देते हुए बड़े मियां भी आसपास खड़े....ठिए के अपने साथियों से दाद /तारीफ़ पाने की तमन्‍ना में 'शेरों' की पुडि़या छोड़ते रहते थे । उसी दौर का एक शेर सुनिए जो अपन ने बचपन में ऐसे ही किसी बड़े मियां से सुना था...पर समझ में ज़रा बाद में ही आया---अर्ज़ किया है कि

उसकी क़ब्र पर पहुंचकर ऐ क़ासिद मुंह से निकली ये आवाज़

ऐ मरने वाले उठ....तेरे ख़त का जवाब आया है ।

ठेठ भोपाली शेर है । गुलशन नंदाई फिल्‍मों की मिसाल अगर आप समझते हैं तो ठेठ भोपाली शेर का मतलब भी समझ जाएंगे । भोपाली शेर यानी कलाबाज़ी । यानी चौंकाने का माद्दा । ओह वो बचपन का भोपाल । बहरहाल......वापस आते हैं । तो मुद्दा ये है कि जगजीत सिंह, भूपिंदर, पंकज उधास, तलत अज़ीज, चंदन दास से लेकर मेहदी हसन, गुलाम अली , नूरजहां,

.... पान की दुकान पर कत्‍था और चूना का इंस्‍ट्रक्‍शन देते हुए बड़े मियां भी आसपास खड़े....ठिए के अपने साथियों से दाद /तारीफ़ पाने की तमन्‍ना में 'शेरों' की पुडि़या छोड़ते रहते थे ।

मलिका पुखराज, बेगम अख्‍तर जैसे ना जाने कितने नामचीन गायकों की आवाज़ों में उम्‍दा शायरों के अशआर हमारे कान में घुले । शायद हमारे संस्‍कारों में, हमारे लहू में उतर गये । अपने जेबख़र्च से पैसे बचा बचाकर हमने जगजीत के कैसेट ख़रीदे । मेहदी हसन के कैसेट जमा किये । कॉपी भी किए । उसी ज़माने के आखि़री दौर में आया अलबम 'सजदा' । जिसमें जगजीत सिंह ने लता मंगेशकर के साथ कुछ ग़ज़लें  गायी थीं । जबकि कुछ ग़ज़लें दोनों ने अलग-अलग गायी थीं । कई मायनों में ये एक अनमोल अलबम था । जिसे हम एक ख़ज़ाने की तरह संभालकर रखते रहे । आज भी ये अलबम हमारे संग्रह में है । चलिए इसी एलबम की एक ग़ज़ल सुनी जाए । लता जी और जगजीत का नायाब संयोग है इस ग़ज़ल में । शायर हैं शाहिद कबीर । जिनकी अन्‍य ग़ज़लें आप यहां पढ़ सकते हैं ।

गम का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी ।।

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना

राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

मैं तुझको और तू मुझको समझाए क्‍या

दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

शहर में गलियों में जिसका चर्चा है

वो अफ़साना तेरा भी है मेरा भी

मैख़ाने की बात ना कर मुझसे वाइज़

आना जाना तेरा भी है मेरा भी

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी ।।

ये रहा इस गाने का वीडियो ।।

यहां इसे सुना जा सकता है ।

 

और ये कलाबाज़ी मुझे इंटरनेट पर भटकते हुए मिली ।

Lata Mangeshkar on 6Lyrics.com

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ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी-जगजीत सिंह और लता मंगेशकर की आवाज़, अलबम 'सजदा'

 

जगजीत सिंह हमेशा अपने इंटरव्‍यू में कहते थे कि उनकी तमन्‍ना है सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ गाने की । एक दो गीत नहीं पूरा अलबम वो लता जी के साथ करना चाहते हैं । मुझे याद है कि ग़ज़लों का एक पूरा दौर था वो जब हम लोग बड़े हो रहे थे । हमारे आसपास जाने कितने लोग ग़ज़लें सुनते मिल जाते थे । कठिन उर्दू शब्‍दों के अर्थ खोजते मिल जाते थे । भोपाल चूंकि शेरो-शायरी का गढ़ था इसलिए यहां के तिनके तिनके में शायरी का इल्‍म छिपा था । पान की दुकान पर कत्‍था और चूना का इंस्‍ट्रक्‍शन देते हुए बड़े मियां भी आसपास खड़े....ठिए के अपने साथियों से दाद /तारीफ़ पाने की तमन्‍ना में 'शेरों' की पुडि़या छोड़ते रहते थे । उसी दौर का एक शेर सुनिए जो अपन ने बचपन में ऐसे ही किसी बड़े मियां से सुना था...पर समझ में ज़रा बाद में ही आया---अर्ज़ किया है कि

उसकी क़ब्र पर पहुंचकर ऐ क़ासिद मुंह से निकली ये आवाज़

ऐ मरने वाले उठ....तेरे ख़त का जवाब आया है ।

ठेठ भोपाली शेर है । गुलशन नंदाई फिल्‍मों की मिसाल अगर आप समझते हैं तो ठेठ भोपाली शेर का मतलब भी समझ जाएंगे । भोपाली शेर यानी कलाबाज़ी । यानी चौंकाने का माद्दा । ओह वो बचपन का भोपाल । बहरहाल......वापस आते हैं । तो मुद्दा ये है कि जगजीत सिंह, भूपिंदर, पंकज उधास, तलत अज़ीज, चंदन दास से लेकर मेहदी हसन, गुलाम अली , नूरजहां,

.... पान की दुकान पर कत्‍था और चूना का इंस्‍ट्रक्‍शन देते हुए बड़े मियां भी आसपास खड़े....ठिए के अपने साथियों से दाद /तारीफ़ पाने की तमन्‍ना में 'शेरों' की पुडि़या छोड़ते रहते थे ।

मलिका पुखराज, बेगम अख्‍तर जैसे ना जाने कितने नामचीन गायकों की आवाज़ों में उम्‍दा शायरों के अशआर हमारे कान में घुले । शायद हमारे संस्‍कारों में, हमारे लहू में उतर गये । अपने जेबख़र्च से पैसे बचा बचाकर हमने जगजीत के कैसेट ख़रीदे । मेहदी हसन के कैसेट जमा किये । कॉपी भी किए । उसी ज़माने के आखि़री दौर में आया अलबम 'सजदा' । जिसमें जगजीत सिंह ने लता मंगेशकर के साथ कुछ ग़ज़लें  गायी थीं । जबकि कुछ ग़ज़लें दोनों ने अलग-अलग गायी थीं । कई मायनों में ये एक अनमोल अलबम था । जिसे हम एक ख़ज़ाने की तरह संभालकर रखते रहे । आज भी ये अलबम हमारे संग्रह में है । चलिए इसी एलबम की एक ग़ज़ल सुनी जाए । लता जी और जगजीत का नायाब संयोग है इस ग़ज़ल में । शायर हैं शाहिद कबीर । जिनकी अन्‍य ग़ज़लें आप यहां पढ़ सकते हैं ।

गम का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी ।।

अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना

राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

मैं तुझको और तू मुझको समझाए क्‍या

दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

शहर में गलियों में जिसका चर्चा है

वो अफ़साना तेरा भी है मेरा भी

मैख़ाने की बात ना कर मुझसे वाइज़

आना जाना तेरा भी है मेरा भी

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी ।।

ये रहा इस गाने का वीडियो ।।

यहां इसे सुना जा सकता है ।

 

और ये कलाबाज़ी मुझे इंटरनेट पर भटकते हुए मिली ।

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Friday, September 28, 2007

लता दीदी के जन्मदिन पर उनके कंसर्ट के कुछ वीडियोज़


आज सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जन्‍मदिन है ।
हर्ष की बात ये है कि रेडियो सखी ममता सिंह की लता जी से आधे घंटे तक फोन पर बात हुई है और उसमें लता जी ने बड़े स्‍नेह से अपने बारे में कई बातें बताई हैं । संभवत: इस बातचीत का प्रसारण तीन अक्‍तूबर को दिन में ढाई बजे किया जायेगा । बहरहाल मेरी भी कुछ महीने पहले लता जी से मुलाक़ात हुई थी और उनसे संक्षिप्‍त बातें करने का मौक़ा भी मिला था । लेकिन उस बातचीत का दूसरा भाग अब तक मुमकिन नहीं हो पाया है । देखें ये अभियान कब पूरा हो पाता है ।

बहरहाल आज लता मंगेशकर के जन्‍मदिन पर मैं आपके लिए वो वीडियोज़ लाया हूं जो उनके पहले और अन्‍य कंसर्टस के हैं ।

आपको बता दें कि लता जी का पहला विदेशी कंसर्ट 1974 में लंदन के रॉयल एल्‍बर्ट हॉल में हुआ था । जिसमें दिलीप कुमार ने लता मंगेशकर का परिचय दिया था । मुमकिन हुआ तो जल्‍दी ही मैं इस भाषण को आपके लिए खोजकर लाऊंगा । इस कंसर्ट में लगभग अठारह हज़ार दर्शक मौजूद थे । नेहरू मेमोरियल ट्रस्‍ट के इस कामयाब आयोजन के लिए लता जी ने अपने गानों की फेहरिस्‍त बड़ी सावधानी से तैयार की थी । कंसर्ट के आग़ाज़ में जैसे ही लता जी ने अपनी तान छेड़ी--आ आ । बस तालियों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी । फिर लता जी ने गीता का एक श्‍लोक गाया । जो वो हमेशा गाती हैं । इसके बाद फिल्‍मी गीतों का सिलसिला शुरू हुआ ।

मैं अपनी एक अनमोल याद आपसे बांटना चाहूंगा । सन 1998 की बात है शायद । बरसों बाद लता जी का कंसर्ट भारत में हो रहा था और वो भी मुंबई में । टिकिटों की क़ीमतें बड़ी ज्‍यादा थीं । मैं मुंबई में तब नया ही था । साल दो साल हुए थे । पैसे भी कम ही मिलते थे । लेकिन सोच लिया था कि लता जी का कंसर्ट तो छोड़ना नहीं है । दफ्तर से लौटते हुए एक टिकिट खरीद लिया । बड़ा सुंदर सा टिकिट था । आकार में भी बड़ा । कीमत में भी । तब सुनील मेरा रूप पार्टनर था । सुनील से मेरी गहरी छनती थी लेकिन उसे लग रहा था कि लता जी के कंसर्ट के लिए इतने पैसे क्‍यों खर्च किये जायें । इसलिए उसने ज्‍यादा रूचि नहीं दिखाई । मैंने टिकिट संभालकर अपनी फाईल में रख दिया और इंतज़ार करने लगा कि कब वो दिन आयेगा जब मैं कंसर्ट में जाऊंगा । इसके बाद बड़ा मज़ा आया । रोज़ मैं टिकिट निकालकर देखता और सुनील को छेड़ता । याद नहीं पर शायद उस दिन सुनील मेरे बाद लौटा और फिर उसने एक बड़ा सा टिकिट मेरे सामने रख दिया । मैंने कहा-क्‍यों, क्‍या हुआ । तुम तो नहीं जाने वाले थे । सुनील बोला, अरे यार पता नहीं ऐसा सौभाग्‍य जिंदगी में फिर कब मिले । फिर
तू भी तो रोज़ छेड़ता था, मैंने सोचा अभी इतना परेशान कर रहा है कंसर्ट के बाद क्‍या होगा । सोचा चलो साथ साथ इस कंसर्ट का लुत्‍फ उठायेंगे । और हम मुंबई के स्‍पोर्टस कॉम्‍पलेक्‍स में गये । वहां लोग इतनी दूर दूर से कंसर्ट देखने आये थे कि विश्‍वास ही नहीं हुआ । एक बुजुर्ग जोड़ा शायद लातूर से आया था । जब लता जी ने कोई पुराना प्रेमगीत गाया तो इस जोड़े की आंखें छलक आईं । ये उनके ज़माने का गाना था और बरसों बरस रिकॉर्ड या रेडियो पर सुनने के बाद आज वो लता जी को अपने सामने गाते हुए देख रहे थे । ग़ज़ब का माहौल था ।

बहरहाल चलिये लता जी के कंसर्ट के कुछ वीडियो देखे जाएं ।

ये है महल फिल्‍म का गीत--आयेगा आने वाला, लता जी का पहला हिट गीत । संभवत: ये उनके दूसरे कंसर्ट का वीडियो है जो 1976 में हुआ था



अब देखिए--कहीं दीप जले कहीं दिल । फिल्‍म बीस साल बाद । इस कंसर्ट में लता जी ने मोटा सा चश्‍मा पहन रखा था ।
ये पहले कंसर्ट का वीडियो है ।



लता जी अपने कंसर्ट में मधु‍मति का गीत-आजा रे परदेसी जरूर गाती हैं । अगर मेरी याददाश्‍त धोखा नहीं दे रही है तो लता जी को पहला फिल्‍म फेयर इसी गीत के लिए मिला था ।



कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है । पता नहीं ये किस कंसर्ट का वीडियो है । ना ही इसमें पुरूष गायक पहचान पा रहा हूं । ये मुकेश तो नहीं हैं ।



इन वीडियोज़ को देखना अपने आप में एक दिव्‍य अनुभव है । रेडियोवाणी के ज़रिए हम लता जी को जन्‍मदिन की असंख्‍य शुभकामनाएं दे रहे हैं ।


लता-मंगेशकर, lata-mangeshkar, lata-in-concert,



Technorati tags:
“ lata mangehskar live” ,
“ लता मंगेशकर”

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लता दीदी के जन्मदिन पर उनके कंसर्ट के कुछ वीडियोज़


आज सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जन्‍मदिन है ।
हर्ष की बात ये है कि रेडियो सखी ममता सिंह की लता जी से आधे घंटे तक फोन पर बात हुई है और उसमें लता जी ने बड़े स्‍नेह से अपने बारे में कई बातें बताई हैं । संभवत: इस बातचीत का प्रसारण तीन अक्‍तूबर को दिन में ढाई बजे किया जायेगा । बहरहाल मेरी भी कुछ महीने पहले लता जी से मुलाक़ात हुई थी और उनसे संक्षिप्‍त बातें करने का मौक़ा भी मिला था । लेकिन उस बातचीत का दूसरा भाग अब तक मुमकिन नहीं हो पाया है । देखें ये अभियान कब पूरा हो पाता है ।

बहरहाल आज लता मंगेशकर के जन्‍मदिन पर मैं आपके लिए वो वीडियोज़ लाया हूं जो उनके पहले और अन्‍य कंसर्टस के हैं ।

आपको बता दें कि लता जी का पहला विदेशी कंसर्ट 1974 में लंदन के रॉयल एल्‍बर्ट हॉल में हुआ था । जिसमें दिलीप कुमार ने लता मंगेशकर का परिचय दिया था । मुमकिन हुआ तो जल्‍दी ही मैं इस भाषण को आपके लिए खोजकर लाऊंगा । इस कंसर्ट में लगभग अठारह हज़ार दर्शक मौजूद थे । नेहरू मेमोरियल ट्रस्‍ट के इस कामयाब आयोजन के लिए लता जी ने अपने गानों की फेहरिस्‍त बड़ी सावधानी से तैयार की थी । कंसर्ट के आग़ाज़ में जैसे ही लता जी ने अपनी तान छेड़ी--आ आ । बस तालियों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी । फिर लता जी ने गीता का एक श्‍लोक गाया । जो वो हमेशा गाती हैं । इसके बाद फिल्‍मी गीतों का सिलसिला शुरू हुआ ।

मैं अपनी एक अनमोल याद आपसे बांटना चाहूंगा । सन 1998 की बात है शायद । बरसों बाद लता जी का कंसर्ट भारत में हो रहा था और वो भी मुंबई में । टिकिटों की क़ीमतें बड़ी ज्‍यादा थीं । मैं मुंबई में तब नया ही था । साल दो साल हुए थे । पैसे भी कम ही मिलते थे । लेकिन सोच लिया था कि लता जी का कंसर्ट तो छोड़ना नहीं है । दफ्तर से लौटते हुए एक टिकिट खरीद लिया । बड़ा सुंदर सा टिकिट था । आकार में भी बड़ा । कीमत में भी । तब सुनील मेरा रूप पार्टनर था । सुनील से मेरी गहरी छनती थी लेकिन उसे लग रहा था कि लता जी के कंसर्ट के लिए इतने पैसे क्‍यों खर्च किये जायें । इसलिए उसने ज्‍यादा रूचि नहीं दिखाई । मैंने टिकिट संभालकर अपनी फाईल में रख दिया और इंतज़ार करने लगा कि कब वो दिन आयेगा जब मैं कंसर्ट में जाऊंगा । इसके बाद बड़ा मज़ा आया । रोज़ मैं टिकिट निकालकर देखता और सुनील को छेड़ता । याद नहीं पर शायद उस दिन सुनील मेरे बाद लौटा और फिर उसने एक बड़ा सा टिकिट मेरे सामने रख दिया । मैंने कहा-क्‍यों, क्‍या हुआ । तुम तो नहीं जाने वाले थे । सुनील बोला, अरे यार पता नहीं ऐसा सौभाग्‍य जिंदगी में फिर कब मिले । फिर
तू भी तो रोज़ छेड़ता था, मैंने सोचा अभी इतना परेशान कर रहा है कंसर्ट के बाद क्‍या होगा । सोचा चलो साथ साथ इस कंसर्ट का लुत्‍फ उठायेंगे । और हम मुंबई के स्‍पोर्टस कॉम्‍पलेक्‍स में गये । वहां लोग इतनी दूर दूर से कंसर्ट देखने आये थे कि विश्‍वास ही नहीं हुआ । एक बुजुर्ग जोड़ा शायद लातूर से आया था । जब लता जी ने कोई पुराना प्रेमगीत गाया तो इस जोड़े की आंखें छलक आईं । ये उनके ज़माने का गाना था और बरसों बरस रिकॉर्ड या रेडियो पर सुनने के बाद आज वो लता जी को अपने सामने गाते हुए देख रहे थे । ग़ज़ब का माहौल था ।

बहरहाल चलिये लता जी के कंसर्ट के कुछ वीडियो देखे जाएं ।

ये है महल फिल्‍म का गीत--आयेगा आने वाला, लता जी का पहला हिट गीत । संभवत: ये उनके दूसरे कंसर्ट का वीडियो है जो 1976 में हुआ था



अब देखिए--कहीं दीप जले कहीं दिल । फिल्‍म बीस साल बाद । इस कंसर्ट में लता जी ने मोटा सा चश्‍मा पहन रखा था ।
ये पहले कंसर्ट का वीडियो है ।



लता जी अपने कंसर्ट में मधु‍मति का गीत-आजा रे परदेसी जरूर गाती हैं । अगर मेरी याददाश्‍त धोखा नहीं दे रही है तो लता जी को पहला फिल्‍म फेयर इसी गीत के लिए मिला था ।



कभी कभी मेरे दिल में ख्‍याल आता है । पता नहीं ये किस कंसर्ट का वीडियो है । ना ही इसमें पुरूष गायक पहचान पा रहा हूं । ये मुकेश तो नहीं हैं ।



इन वीडियोज़ को देखना अपने आप में एक दिव्‍य अनुभव है । रेडियोवाणी के ज़रिए हम लता जी को जन्‍मदिन की असंख्‍य शुभकामनाएं दे रहे हैं ।


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संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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