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Friday, June 13, 2008

ऐ चंदा मामा आरे आवा पारे आवा: लता जी की आवाज़ ।।

अब बताईये कैसा संयोग है । मैं मध्‍यप्रदेश में पैदा हुआ और मध्‍यप्रदेश में ये गीत कुछ इस तरह से गाया जाता है: चंदामामा दूर के पूड़ी पकाएं पूर के । आप खाएं थाली में । मुन्‍ने को दें थाली में । थाली गयी टूट । मामा गए रूठ । वग़ैरह वग़ैरह ।  इसी में कहीं फुसला-बहला के बच्‍चे को खाना खिलाने की तरकीब होती है । संसार का कोई बच्‍चा शायद ऐसा नहीं होगा जिसने बड़ी सिधाई से मां के हाथ से खाना खा लिया होगा । जो बच्‍चा खाना खाने में नखरे ना करे, वो बच्‍चा ही कैसा ।

                      nyt_indian_hammock

शायद इसीलिए हमारे लोकगीतों और हमारी संस्‍कृति में इस तरह के गाने आए हैं और पीढि़यों से गाए जाते रहे हैं । भगवान जाने ये किसके दिमाग़ की उपज थे । झुर्रियों के पीछे छिपे किसी उम्रदराज़ मनोवैज्ञानिक मस्तिष्‍क की । या ममत्‍व की तरंगों में लीन किसी मां प्‍यार की ।

जब ये गीत मुझे मिला और मैंने रेडियोसखी ममता को सुनवाया तो उन्‍होंने फ़ौरन ही इस धुन और इन बोलों को पहचान लिया और बताया कि कोई ऐसा बच्‍चा नहीं जो इस गाने के बाद अपना मुंह ना खोले और 'बबुआ के मुंहवा में घुटूं' तक पहुंचते पहुंचते अपना मुंह ना खोल दे । संयोग से ये गीत हासिल हुआ है । फिल्‍म है भौजी । 

मैं बस इतना ही पता कर पाया कि इस भोजपुरी फिल्‍म में मजरूह सुल्‍तानपुरी ने गाने लिखे थे और संगीतकार थे चित्रगुप्‍त । लता जी की आवाज़ में वात्‍सल्‍य कैसा छलक-छलक पड़ता है सुनिए ।

चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा ।

सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा

बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आवाहूं उतरी आवा हमारी मुंडेर, कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।

भईल बड़ी देर हां बाबू को लागल भूख ।

ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना, रहिलै देख घड़ी बाबू के बिना

एक घड़ी हमरा को लागै सौ जून ।

ऐ चंदा मामा ।। 

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ऐ चंदा मामा आरे आवा पारे आवा: लता जी की आवाज़ ।।

अब बताईये कैसा संयोग है । मैं मध्‍यप्रदेश में पैदा हुआ और मध्‍यप्रदेश में ये गीत कुछ इस तरह से गाया जाता है: चंदामामा दूर के पूड़ी पकाएं पूर के । आप खाएं थाली में । मुन्‍ने को दें थाली में । थाली गयी टूट । मामा गए रूठ । वग़ैरह वग़ैरह ।  इसी में कहीं फुसला-बहला के बच्‍चे को खाना खिलाने की तरकीब होती है । संसार का कोई बच्‍चा शायद ऐसा नहीं होगा जिसने बड़ी सिधाई से मां के हाथ से खाना खा लिया होगा । जो बच्‍चा खाना खाने में नखरे ना करे, वो बच्‍चा ही कैसा ।

                      nyt_indian_hammock

शायद इसीलिए हमारे लोकगीतों और हमारी संस्‍कृति में इस तरह के गाने आए हैं और पीढि़यों से गाए जाते रहे हैं । भगवान जाने ये किसके दिमाग़ की उपज थे । झुर्रियों के पीछे छिपे किसी उम्रदराज़ मनोवैज्ञानिक मस्तिष्‍क की । या ममत्‍व की तरंगों में लीन किसी मां प्‍यार की ।

जब ये गीत मुझे मिला और मैंने रेडियोसखी ममता को सुनवाया तो उन्‍होंने फ़ौरन ही इस धुन और इन बोलों को पहचान लिया और बताया कि कोई ऐसा बच्‍चा नहीं जो इस गाने के बाद अपना मुंह ना खोले और 'बबुआ के मुंहवा में घुटूं' तक पहुंचते पहुंचते अपना मुंह ना खोल दे । संयोग से ये गीत हासिल हुआ है । फिल्‍म है भौजी । 

मैं बस इतना ही पता कर पाया कि इस भोजपुरी फिल्‍म में मजरूह सुल्‍तानपुरी ने गाने लिखे थे और संगीतकार थे चित्रगुप्‍त । लता जी की आवाज़ में वात्‍सल्‍य कैसा छलक-छलक पड़ता है सुनिए ।

चंदा मामा आरे आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा ।

सोना के कटोरिया में दूध भात लै लै आवा

बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आवाहूं उतरी आवा हमारी मुंडेर, कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।

भईल बड़ी देर हां बाबू को लागल भूख ।

ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना, रहिलै देख घड़ी बाबू के बिना

एक घड़ी हमरा को लागै सौ जून ।

ऐ चंदा मामा ।। 

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Thursday, May 29, 2008

ऐ दिल कहां तेरी मंजिल-फिल्‍म माया

रेडियोवाणी पर हम सलिल दा को अकसर विकलता से याद करते रहे हैं । सलिल दा हमारे आराध्‍य हैं । मुझे हमेशा से लगता रहा है कि सलिल दा जैसा प्रयोगधर्मी संगीतकार हिंदी फिल्‍म संगीत में दूसरा नहीं हुआ । आज मैं आपको जो गीत सुनवा रहा हूं वो अपनी हर पहलू के लिहाज से अनमोल है । आप पाएंगे कि लता मंगेशकर की आवाज़ का उपयोग इस गाने में केवल आलाप के लिए किया गया है । और इस आलाप की intensity देखते ही बनती है । कोरस का इस गाने में नायाब इस्‍तेमाल है ।

सलिल दा ने अपने कई गीत विदेशी ट्यून्‍स पर बनाए हैं । लेकिन आज के संगीतकारों की तरह ट्यून्‍स को कॉपी नहीं किया । उन्‍होंने इन धुनों को अपने प्रयोगों में ढाला और उनसे जो कुछ तैयार हुआ, उसमें भारतीयता भी थी और रचनात्‍मकता का चरम भी । इस गाने को मैं गिटार के चलन और बहुत ही गाढ़े कोरस के लिए याद करता हूं ।

ढलती शाम की immortal sadness का गीत है ये । मुझे लगता है कि शाम चिरन्‍तन उदासी का नाम है । और बेहद सांद्र उदासी के क्षणों में हमें एक 821401_DV_M_F कंधे की ज़रूरत पड़ती है, जिसे हम अपने आंसुओं से भिगा सकें । इस गाने के कंधे पर सिर रखकर आप अपनी सारी उदासी धो सकते हैं । वैसे भी मजरूह सुल्‍तानपुरी का ये गीत उदासी से लड़ने का ही गीत है । 1961 में आई फिल्‍म 'माया' का ये गीत अपनी रचना, संगीत-रचना और गायकी में बेमिसाल । इसे द्विजेन मुखर्जी और लता मंगेशकर ने गाया था । इसे देव आनंद और माला सिन्‍हा पर फिल्‍माया गया है । आगे चलकर मुमकिन है कि फिल्‍म 'माया' के कुछ और गीत आपको सुनवाए जाएं ।


ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।

ना कोई दीपक है, ना कोई तारा है, गुम है ज़मीं, दूर आसमां

( लता का विकल आलाप और बेहतरीन कोरस )

किसलिए मिल मिल के दिल टूटते हैं

किसलिए बन बन महल टूटते हैं

किसलिए दिल टूटते हैं

पत्‍थर से पूछा, शीशे से पूछा ख़ामोश है सबकी ज़बां ।

ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।।

ढल गये नादां वो आंचल के साए

रह गए रस्‍ते में अपने पराए

रह गए अपने पराए

आंचल भी छूटा, साथी भी छूटा, ना हमसफ़र, ना क़ारवां

ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।।

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ऐ दिल कहां तेरी मंजिल-फिल्‍म माया

रेडियोवाणी पर हम सलिल दा को अकसर विकलता से याद करते रहे हैं । सलिल दा हमारे आराध्‍य हैं । मुझे हमेशा से लगता रहा है कि सलिल दा जैसा प्रयोगधर्मी संगीतकार हिंदी फिल्‍म संगीत में दूसरा नहीं हुआ । आज मैं आपको जो गीत सुनवा रहा हूं वो अपनी हर पहलू के लिहाज से अनमोल है । आप पाएंगे कि लता मंगेशकर की आवाज़ का उपयोग इस गाने में केवल आलाप के लिए किया गया है । और इस आलाप की intensity देखते ही बनती है । कोरस का इस गाने में नायाब इस्‍तेमाल है ।

सलिल दा ने अपने कई गीत विदेशी ट्यून्‍स पर बनाए हैं । लेकिन आज के संगीतकारों की तरह ट्यून्‍स को कॉपी नहीं किया । उन्‍होंने इन धुनों को अपने प्रयोगों में ढाला और उनसे जो कुछ तैयार हुआ, उसमें भारतीयता भी थी और रचनात्‍मकता का चरम भी । इस गाने को मैं गिटार के चलन और बहुत ही गाढ़े कोरस के लिए याद करता हूं ।

ढलती शाम की immortal sadness का गीत है ये । मुझे लगता है कि शाम चिरन्‍तन उदासी का नाम है । और बेहद सांद्र उदासी के क्षणों में हमें एक 821401_DV_M_F कंधे की ज़रूरत पड़ती है, जिसे हम अपने आंसुओं से भिगा सकें । इस गाने के कंधे पर सिर रखकर आप अपनी सारी उदासी धो सकते हैं । वैसे भी मजरूह सुल्‍तानपुरी का ये गीत उदासी से लड़ने का ही गीत है । 1961 में आई फिल्‍म 'माया' का ये गीत अपनी रचना, संगीत-रचना और गायकी में बेमिसाल । इसे द्विजेन मुखर्जी और लता मंगेशकर ने गाया था । इसे देव आनंद और माला सिन्‍हा पर फिल्‍माया गया है । आगे चलकर मुमकिन है कि फिल्‍म 'माया' के कुछ और गीत आपको सुनवाए जाएं ।


ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।

ना कोई दीपक है, ना कोई तारा है, गुम है ज़मीं, दूर आसमां

( लता का विकल आलाप और बेहतरीन कोरस )

किसलिए मिल मिल के दिल टूटते हैं

किसलिए बन बन महल टूटते हैं

किसलिए दिल टूटते हैं

पत्‍थर से पूछा, शीशे से पूछा ख़ामोश है सबकी ज़बां ।

ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।।

ढल गये नादां वो आंचल के साए

रह गए रस्‍ते में अपने पराए

रह गए अपने पराए

आंचल भी छूटा, साथी भी छूटा, ना हमसफ़र, ना क़ारवां

ऐ दिल कहां तेरी मंजिल ।।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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