ईद-विशेष--ये मस्जिद है वो बुतख़ाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो, साहिर का नग़मा
आज ईद है । ईदुल फित्र । महीने भर तक रोज़े रखने के बाद आता है आज का दिन । शीर-ख़ुरमे और सिंवईं खाने का दिन । गले मिलने और गिले-शिकवे मिटाने का दिन । वो दिन जब दुनिया भर के लिए दुआएं की जाती
हैं । मैंने अकसर देखा है कि ईद के दिन जब ईदगाह में शहर-क़ाज़ी दुआ मांगते हैं तो लोग फूट-फूटकर रोते हैं । इस साल बम-धमाकों से बेवक्त मौत की गोद में चले गए लोगों के लिए और उनके परिवार वालों के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं । देश में अमन-चैन कायम रखने के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं ।
ईद और नवरात्र की जुगलबंदी जारी है आज के दिन देश भर में । सूरत के एक मित्र ने बताया कि गुजरात के कई इलाक़ों में ऐसे मुसलमान भाई हैं जो रमज़ान में दिन भर रोज़े रखते रहे और शाम ढलने पर डांडिया-रास में गाते और बजाते नज़र आए । चूंकि साजिंदे और गायक हैं तो ये उनका पेशा भी है
रोक सकता हमें ज़िन्दाने बला क्या मजरूह ।
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं ।।
रेडियोवाणी संगीत का ऐसा ही मंच है ।
हम संगीत के हर पहलू से प्यार करते हैं । हमारे लिए संगीत एक इबादत
है । संगीत एक ज़रूरी चीज़ है जिंदगी की । हमारे लिए रोटी, कपड़ा, मकान और संगीत जिंदगी की अहम जरूरतें हैं । आज गांधी जयंती, नवरात्र और ईद के मिले-जुले अवसर पर हम एक ऐसी रचना लेकर आए हैं जिसे फिल्म-संगीत की एक दिव्य ऊंचाई माना जाना चाहिए ।
सन 1961 में फिल्म 'धर्मपुत्र' के लिए साहिर लुधियानवी ने ये क़व्वाली लिखी थी । इसे महेंद्र कपूर, बलबीर और साथियों ने गाया है और संगीतकार हैं एन दत्ता । फिल्म 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा की, निर्देशन की दुनिया में पहली कोशिश थी । उनका सिनेमा 'धर्मपुत्र' और 'धूल का फूल' जैसी फिल्मों से होते हुए कभी-कभी,
चांदनी और वीर-ज़ारा तक आया है । ये गीत मैं समर्पित कर रहा हूं बैंगलोर में रहने वाले अपने मित्र शिरीष कोयल को । शिरीष के बारे में रेडियोवाणी पर पहले भी चर्चा की गयी है । पर फिर से आपको बता दें कि शिरीष साहिर लुधियानवी के जबर्दस्त फैन
हैं । मुझे लगता है कि 'फैन' शब्द उनके जुनून के लिए छोटा है । साहिर के सभी गीत उनके पास हैं । कुछ गिने-चुने गाने नहीं हैं, जिनके लिए वो धरती-आकाश एक किए हुए हैं । अगर आप भी साहिर के दीवाने हैं तो शिरीष से ज़रूर संपर्क कीजिएगा ।
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काबे में रहो या काशी में निस्बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो या रहीम कहो मतलब तो उसी की ज़ात से है ।।
ये मस्जिद है वो बुतख़ाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
भई मक़सद तो है दिल को समझाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।
ये शेख़-ओ-बरहमन के झगड़े सब नासमझीं की बातें हैं
हमने तो है बस इतना जाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।
गर जज्बा-ए-मोहब्बत सादिक़ हो हर दर से मुरादें मिलती हैं
मंदिर से मुरादें मिलती हैं, मस्जिद से मुरादें मिलती हैं
काबे से मुरादें मिलती हैं काशी से मुरादें मिलती हैं
हर घर है उसी का काशाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।
कठिन शब्दों के अर्थ--
शेखो-बहरमन--धर्मोपदेशक
काशाना--घर
सादिक़--पक्का
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