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Thursday, October 2, 2008

ईद-विशेष--ये मस्जिद है वो बुतख़ाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो, साहिर का नग़मा

आज ईद है । ईदुल फित्र । महीने भर तक रोज़े रखने के बाद आता है आज का दिन । शीर-ख़ुरमे और सिंवईं खाने का दिन । गले मिलने और गिले-शिकवे मिटाने का दिन । वो दिन जब दुनिया भर के लिए दुआएं की जाती
हैं । मैंने अकसर देखा है कि ईद के दिन जब ईदगाह में शहर-क़ाज़ी दुआ मांगते हैं तो लोग फूट-फूटकर रोते हैं । इस साल बम-धमाकों से बेवक्‍त मौत की गोद में चले गए लोगों के लिए और उनके परिवार वालों के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं । देश में अमन-चैन कायम रखने के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं । 

ईद और नवरात्र की जुगलबंदी जारी है आज के दिन देश भर में । सूरत के एक मित्र ने बताया कि गुजरात के कई इलाक़ों में ऐसे मुसलमान भाई हैं जो रमज़ान में दिन भर रोज़े रखते रहे और शाम ढलने पर डांडिया-रास में गाते और बजाते नज़र आए । चूंकि साजिंदे और गायक हैं तो ये उनका पेशा भी है

जब महेंद्र कपूर नात-शरीफ़ गाते हैं या रवींद्र जैन और हरिहरन अल्‍लाह को बेक़रारी से पुकारते हैं तो हमें गायक, गीतकार या संगीतकार का धर्म नहीं याद आता
और फ़र्ज़ भी । संगीत की दुनिया में कभी धर्म और जाति का भेदभाव नहीं होता, बाक़ी सारी जगहों पर भले ही दिमाग़ तंग हो जाएं लेकिन संगीत-जगत हमेशा इससे अछूता ही रहा है । जब शकील बदायूंनी बैजू-बावरा के लिए 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' लिखते हैं, नौशाद इसे स्‍वरबद्ध करते हैं और मोहम्‍मद रफ़ी इसे गाते हैं तो सुनने वाले एक नई आध्‍यात्मिक ऊंचाई पर पहुंचते हैं । उनके मन में ये ख्‍याल ही नहीं आता कि जिन लोगों ने इस रचना को तैयार किया है--उनकी अकीदत बुत-परस्‍ती में नहीं है । इसी तरह जब महेंद्र कपूर नात-शरीफ़ गाते हैं या रवींद्र जैन और हरिहरन अल्‍लाह को बेक़रारी से पुकारते हैं तो हमें गायक, गीतकार या संगीतकार का धर्म नहीं याद आता, शायद संगीत की दुनिया के इसी सेकुलरिज्‍म के लिए मजरूह सुल्‍तानपुरी ने लिखा था-
रोक सकता हमें ज़िन्‍दाने बला क्‍या मजरूह ।
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं ।।

रेडियोवाणी संगीत का ऐसा ही मंच है ।
हम संगीत के हर पहलू से प्‍यार करते हैं । हमारे लिए संगीत एक इबादत
है । संगीत एक ज़रूरी चीज़ है जिंदगी की । हमारे लिए रोटी, कपड़ा, मकान और संगीत जिंदगी की अहम जरूरतें हैं । आज गांधी जयंती, नवरात्र और ईद के मिले-जुले अवसर पर हम एक ऐसी रचना लेकर आए हैं जिसे फिल्‍म-संगीत की एक दिव्‍य ऊंचाई माना जाना चाहिए ।

सन 1961 में फिल्‍म 'धर्मपुत्र' के लिए साहिर लुधियानवी ने ये क़व्‍वाली लिखी थी । इसे महेंद्र कपूर, बलबीर और साथियों ने गाया है और संगीतकार हैं एन दत्‍ता । फिल्‍म 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा की, निर्देशन की दुनिया में पहली कोशिश थी । उनका सिनेमा 'धर्मपुत्र' और 'धूल का फूल' जैसी फिल्‍मों से होते हुए कभी-कभी,
चांदनी और वीर-ज़ारा तक आया है । ये गीत मैं समर्पित कर रहा हूं बैंगलोर में रहने वाले अपने मित्र शिरीष कोयल को । शिरीष के बारे में रेडियोवाणी पर पहले भी चर्चा की गयी है । पर फिर से आपको बता दें कि शिरीष साहिर लुधियानवी के जबर्दस्‍त फैन 
हैं ।  मुझे लगता है कि 'फैन' शब्‍द उनके जुनून के लिए छोटा है । साहिर के सभी गीत उनके पास हैं । कुछ गिने-चुने गाने नहीं हैं, जिनके लिए वो धरती-आकाश एक किए हुए हैं । अगर आप भी साहिर के दीवाने हैं तो शिरीष से ज़रूर संपर्क कीजिएगा ।

डाउनलोड लिंक
काबे में रहो या काशी में निस्‍बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो या रहीम कहो मतलब तो उसी की ज़ात से है ।।
ये मस्जिद है वो बुतख़ाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
भई मक़सद तो है दिल को समझाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।

ये शेख़-ओ-बरहमन के झगड़े सब नासमझीं की बातें हैं
हमने तो है बस इतना जाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।
गर जज्बा-ए-मोहब्‍बत स‍ादिक़ हो हर दर से मुरादें मिलती हैं
मंदिर से मुरादें मिलती हैं, मस्जिद से मुरादें मिलती हैं
काबे से मुरादें मिलती हैं काशी से मुरादें मिलती हैं
हर घर है उसी का काशाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।

कठिन शब्‍दों के अर्थ--
शेखो-बहरमन--धर्मोपदेशक
काशाना--घर
सादिक़--पक्‍का


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ईद-विशेष--ये मस्जिद है वो बुतख़ाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो, साहिर का नग़मा

आज ईद है । ईदुल फित्र । महीने भर तक रोज़े रखने के बाद आता है आज का दिन । शीर-ख़ुरमे और सिंवईं खाने का दिन । गले मिलने और गिले-शिकवे मिटाने का दिन । वो दिन जब दुनिया भर के लिए दुआएं की जाती
हैं । मैंने अकसर देखा है कि ईद के दिन जब ईदगाह में शहर-क़ाज़ी दुआ मांगते हैं तो लोग फूट-फूटकर रोते हैं । इस साल बम-धमाकों से बेवक्‍त मौत की गोद में चले गए लोगों के लिए और उनके परिवार वालों के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं । देश में अमन-चैन कायम रखने के लिए दुआएं मांगी जा रही हैं । 

ईद और नवरात्र की जुगलबंदी जारी है आज के दिन देश भर में । सूरत के एक मित्र ने बताया कि गुजरात के कई इलाक़ों में ऐसे मुसलमान भाई हैं जो रमज़ान में दिन भर रोज़े रखते रहे और शाम ढलने पर डांडिया-रास में गाते और बजाते नज़र आए । चूंकि साजिंदे और गायक हैं तो ये उनका पेशा भी है

जब महेंद्र कपूर नात-शरीफ़ गाते हैं या रवींद्र जैन और हरिहरन अल्‍लाह को बेक़रारी से पुकारते हैं तो हमें गायक, गीतकार या संगीतकार का धर्म नहीं याद आता
और फ़र्ज़ भी । संगीत की दुनिया में कभी धर्म और जाति का भेदभाव नहीं होता, बाक़ी सारी जगहों पर भले ही दिमाग़ तंग हो जाएं लेकिन संगीत-जगत हमेशा इससे अछूता ही रहा है । जब शकील बदायूंनी बैजू-बावरा के लिए 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' लिखते हैं, नौशाद इसे स्‍वरबद्ध करते हैं और मोहम्‍मद रफ़ी इसे गाते हैं तो सुनने वाले एक नई आध्‍यात्मिक ऊंचाई पर पहुंचते हैं । उनके मन में ये ख्‍याल ही नहीं आता कि जिन लोगों ने इस रचना को तैयार किया है--उनकी अकीदत बुत-परस्‍ती में नहीं है । इसी तरह जब महेंद्र कपूर नात-शरीफ़ गाते हैं या रवींद्र जैन और हरिहरन अल्‍लाह को बेक़रारी से पुकारते हैं तो हमें गायक, गीतकार या संगीतकार का धर्म नहीं याद आता, शायद संगीत की दुनिया के इसी सेकुलरिज्‍म के लिए मजरूह सुल्‍तानपुरी ने लिखा था-
रोक सकता हमें ज़िन्‍दाने बला क्‍या मजरूह ।
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं ।।

रेडियोवाणी संगीत का ऐसा ही मंच है ।
हम संगीत के हर पहलू से प्‍यार करते हैं । हमारे लिए संगीत एक इबादत
है । संगीत एक ज़रूरी चीज़ है जिंदगी की । हमारे लिए रोटी, कपड़ा, मकान और संगीत जिंदगी की अहम जरूरतें हैं । आज गांधी जयंती, नवरात्र और ईद के मिले-जुले अवसर पर हम एक ऐसी रचना लेकर आए हैं जिसे फिल्‍म-संगीत की एक दिव्‍य ऊंचाई माना जाना चाहिए ।

सन 1961 में फिल्‍म 'धर्मपुत्र' के लिए साहिर लुधियानवी ने ये क़व्‍वाली लिखी थी । इसे महेंद्र कपूर, बलबीर और साथियों ने गाया है और संगीतकार हैं एन दत्‍ता । फिल्‍म 'धर्मपुत्र' यश चोपड़ा की, निर्देशन की दुनिया में पहली कोशिश थी । उनका सिनेमा 'धर्मपुत्र' और 'धूल का फूल' जैसी फिल्‍मों से होते हुए कभी-कभी,
चांदनी और वीर-ज़ारा तक आया है । ये गीत मैं समर्पित कर रहा हूं बैंगलोर में रहने वाले अपने मित्र शिरीष कोयल को । शिरीष के बारे में रेडियोवाणी पर पहले भी चर्चा की गयी है । पर फिर से आपको बता दें कि शिरीष साहिर लुधियानवी के जबर्दस्‍त फैन 
हैं ।  मुझे लगता है कि 'फैन' शब्‍द उनके जुनून के लिए छोटा है । साहिर के सभी गीत उनके पास हैं । कुछ गिने-चुने गाने नहीं हैं, जिनके लिए वो धरती-आकाश एक किए हुए हैं । अगर आप भी साहिर के दीवाने हैं तो शिरीष से ज़रूर संपर्क कीजिएगा ।

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काबे में रहो या काशी में निस्‍बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो या रहीम कहो मतलब तो उसी की ज़ात से है ।।
ये मस्जिद है वो बुतख़ाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
भई मक़सद तो है दिल को समझाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।

ये शेख़-ओ-बरहमन के झगड़े सब नासमझीं की बातें हैं
हमने तो है बस इतना जाना चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।
गर जज्बा-ए-मोहब्‍बत स‍ादिक़ हो हर दर से मुरादें मिलती हैं
मंदिर से मुरादें मिलती हैं, मस्जिद से मुरादें मिलती हैं
काबे से मुरादें मिलती हैं काशी से मुरादें मिलती हैं
हर घर है उसी का काशाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो ।।

कठिन शब्‍दों के अर्थ--
शेखो-बहरमन--धर्मोपदेशक
काशाना--घर
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Tuesday, July 10, 2007

साहिर लुधियानवी की नज़्म—मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे



ताजमहल को नये सात आश्‍चर्यों में शामिल कर लिया गया, बड़ा हो हल्‍ला हुआ, वोट दीजिये, एस.एम.एस कीजिये वग़ैरह । और तिजारत यानी व्‍यापार के इस दौर में ताजमहल को चंद एस.एम.एस. की बिना पर सर्टिफिकेट दे दिया गया । इस सबसे अलग ताजमहल कभी उर्दू शायरी में भी चर्चा और बहस का मुद्दा था । शकील बदायूंनी ने लिखा था- इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, दुनिया को मुहब्‍बत की निशानी दी है । और तरक्‍की पसंद तूफानी शायर साहिर से रहा नहीं गया । ये उनका जवाब था । इस नज़्म का शीर्षक है—ताजमहल........चूंकि इसमें बहुत बुलंद उर्दू के अलफ़ाज़ हैं इसलिये कुछ कठिन शब्‍दों के मायने दिये जा रहे हैं ।



ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्‍फ़त ही सही
तुझको इस वादिये रंगीं से अकीदत ही सही
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्‍या मानी
सब्‍त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्‍या मानी
मेरे मेहबूब पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा तूने
सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है
कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं
क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं
दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं
मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी
जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील
उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील
ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे ।।

कुछ कठिन शब्‍दों के मायने
मज़हर-ऐ-उल्‍फत—प्रेम का प्रतिरूप
वादिए-रंगीं—रंगीन घाटी
बज्मे शाही—शाही महफिल
सब्‍त—अंकित,
सतवते-शाही— शाहाना शानो शौक़त
पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा—प्रेम के प्रदर्शन/विज्ञापन के पीछे
मक़ाबिर—मकबरे तारीक—अंधेरे सादिक़—सच्‍चे
तशहीर का सामान—विज्ञापन की सामग्री
हिसार—किले
मुतलक-उल-हुक्‍म—पूर्ण सत्‍ताधारी
अज़्मत—महानता
सुतूं—सुतून
दामने-देहर—संसार के दामन पर
अज़दाद—पुरखे
ख़ूं—खून
सन्‍नाई—कारीगरी
शक्‍ले-जमील—सुंदर रूप
बेनामो-नुमूद—गुमनाम
चमनज़ार—बाग़
मुनक़्क़श—नक्‍काशी


शकील बदायूंनी का लिखा नग्‍मा ‘इक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताजमहल’ आप यहां सुन सकते हैं ।

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साहिर लुधियानवी की नज़्म—मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे



ताजमहल को नये सात आश्‍चर्यों में शामिल कर लिया गया, बड़ा हो हल्‍ला हुआ, वोट दीजिये, एस.एम.एस कीजिये वग़ैरह । और तिजारत यानी व्‍यापार के इस दौर में ताजमहल को चंद एस.एम.एस. की बिना पर सर्टिफिकेट दे दिया गया । इस सबसे अलग ताजमहल कभी उर्दू शायरी में भी चर्चा और बहस का मुद्दा था । शकील बदायूंनी ने लिखा था- इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, दुनिया को मुहब्‍बत की निशानी दी है । और तरक्‍की पसंद तूफानी शायर साहिर से रहा नहीं गया । ये उनका जवाब था । इस नज़्म का शीर्षक है—ताजमहल........चूंकि इसमें बहुत बुलंद उर्दू के अलफ़ाज़ हैं इसलिये कुछ कठिन शब्‍दों के मायने दिये जा रहे हैं ।



ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्‍फ़त ही सही
तुझको इस वादिये रंगीं से अकीदत ही सही
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्‍या मानी
सब्‍त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्‍या मानी
मेरे मेहबूब पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा तूने
सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है
कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं
क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं
दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं
मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी
जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील
उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील
ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे ।।

कुछ कठिन शब्‍दों के मायने
मज़हर-ऐ-उल्‍फत—प्रेम का प्रतिरूप
वादिए-रंगीं—रंगीन घाटी
बज्मे शाही—शाही महफिल
सब्‍त—अंकित,
सतवते-शाही— शाहाना शानो शौक़त
पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा—प्रेम के प्रदर्शन/विज्ञापन के पीछे
मक़ाबिर—मकबरे तारीक—अंधेरे सादिक़—सच्‍चे
तशहीर का सामान—विज्ञापन की सामग्री
हिसार—किले
मुतलक-उल-हुक्‍म—पूर्ण सत्‍ताधारी
अज़्मत—महानता
सुतूं—सुतून
दामने-देहर—संसार के दामन पर
अज़दाद—पुरखे
ख़ूं—खून
सन्‍नाई—कारीगरी
शक्‍ले-जमील—सुंदर रूप
बेनामो-नुमूद—गुमनाम
चमनज़ार—बाग़
मुनक़्क़श—नक्‍काशी


शकील बदायूंनी का लिखा नग्‍मा ‘इक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताजमहल’ आप यहां सुन सकते हैं ।

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परिचय

संगीत का ब्‍लॉग । मुख्‍य-रूप से हिंदी-संगीत । संगीत दिलों को जोड़ता है । संगीत की कोई सरहद नहीं होती ।

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